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विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: सत्यजित राय की लेखन शैली

Tue, 16 Jul 2024 06:50 PM IST
Dr. Vijay Sharma डॉ. विजय शर्मा
Updated Tue, 16 Jul 2024 06:50 PM IST
सार

हाल ही में सत्यजित राय के बेटे द्वारा संपादित एक किताब आई है ‘सत्यजित राय मिसलेनी’। इसमें एक खंड खासतौर पर उनके स्क्रेनप्ले लेखन पर है। इसमें वे बताते हैं कि बहुत कम सिने-निर्देशक अपनी स्क्रिप्ट स्वयं लिखते हैं। जो लिखते हैं उनमें से वे बर्गमैन, फेलिनी, एन्टोनिओनी आदि का नाम लेते हैं।

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history of world cinema Satyajit Ray Indian director and screenwrite
विश्व सिनेमा - फोटो : istock

विस्तार

सत्यजित राय से कौन भारतीय सिने-प्रेमी परिचित नहीं है। अधिकांशत: उनके निर्देशक रूप एवं उनकी फिल्मों की चर्चा होती है। उनकी पहली फिल्म ‘पथेर पांचाली’ ने भारतीय फिल्मों को दुनिया के सिने-मानचित्र पर अंकित कर दिया। शायद यह बहुत कम लोगों को ज्ञात होगा कि उन्होंने तकरीबन अपनी सब फिल्मों का स्क्रीनप्ले लिखा। इतना ही नहीं, अक्सर वे संवाद भी खुद लिखते और सिनेरिओ भी तैयार करते थे।

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वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे उन्होंने कहानियां लिखी, फिल्मों का संगीत बनाया, अपनी और दुनिया के कई अन्य निर्देशकों की फिल्म कला पर लेखन किया। उन्होंने बहुत तरह का लेखन किया मगर यहां उनके स्क्रिप्ट लेखन के विचार को ही लिया गया है।
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उन्होंने अपनी फिल्म बनाने की प्रक्रिया पर कई स्थानों पर लिखा और कई स्थानों पर उससे संबंधित बात की है। हाल ही में उनके बेटे के द्वारा संपादित एक किताब आई है ‘सत्यजित राय मिसलेनी’। इसमें एक खंड खासतौर पर उनके स्क्रेनप्ले लेखन पर है। इसमें वे बताते हैं कि बहुत कम सिने-निर्देशक अपनी स्क्रिप्ट स्वयं लिखते हैं। जो लिखते हैं उनमें से वे बर्गमैन, फेलिनी, एन्टोनिओनी आदि का नाम लेते हैं।
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उनके अनुसार अधिकतर निर्देशक संवाद लिखने के लिए भी लेखकों को रखते हैं। उनका विचार है, निर्देशक को स्वयं स्क्रिप्ट लिखनी चाहिए। मेरा मानना है कि सबके पास सब तरह की कुशलता नहीं होती है, यदि आवश्यकता हो तो दूसरों से सहायता लेनी चाहिए।

सत्यजित राय जबसे फिल्म बनाने लगे अपना सिनेरिओ स्वयं लिखने लगे, बल्कि वे फिल्म बनाने के पहले से स्क्रीनप्ले लिख रहे थे। सबसे पहले उन्होंने रेने क्लैयर की स्क्रिप्ट देखी थी, फिल्म का नाम था, ‘द घोस्ट गोज वेस्ट’। यहीं से उन्हें समय काटने केलिए स्क्रीनप्ले लिखने का विचार मिला। यह काम वे समय काटने केलिए और अपने शगल केलिए करने लगे।

जिस साहित्यिक कृति पर फिल्म बनाए जाने की घोषणा होती उस पर लेखन करते और जब वह फिल्म देखते तो अपने लिखे से उसकी तुलना करते। यह कार्य उन्हें काफी रचनात्मक लगता परंतु जब उन्होंने अपनी पहली फिल्म ‘पथेर पांचाली’ बनाई तो कोई लिखित स्क्रिप्ट नहीं थी लेकिन सारा कुछ उनके दिमाग में स्पष्ट था। वे कहते हैं सिनेमा रीडिंग केलिए फिल्म देखते हुए अंधेरे में नोट्स लेते रहते थे। वे यह विभिन्न निर्देशकों की खासकर अमेरिकन निर्देशकों जैसे फोर्ड, काप्रा, हुस्टन की फिल्म देखते हुए करते थे।
 

स्क्रिप्टराइटिंग-फिल्मों को लेकर एकाग्रता का भाव

शुरू में अक्सर स्क्रिप्टराइटिंग के लिए वे घर से दूर कहीं एकांत में चले जाते, पत्नी और बेटे को भी संग न ले जाते। वे किसी समुद्र किनारे होटल जैसे गोपालपुर, पुरी आदि स्थान में बैठ कर यह काम करते। किसी की सहायता न लेते और दिन में सोलह-सत्रह घंटे काम करते। ऐसा करते हुए वे कम समय में काफी काम समाप्त कर लेते थे। हालांकि जब वे लौट कर फिल्म बनाते तो सारा कुछ उनके दिमाग में होता। उन्हें अधिक-से-अधिक दस दिन लगते थे सिनेरिओ बनाने में। वैसे अंत तक संवाद में परिवर्तन और इम्प्रोवाइजेशन चलता रहता। बाद में उन्हें पता चला आवाज से बचना मुश्किल है अत: वे हल्ला-गुल्ला के बीच में लिखने के आदि हो गए।

वे स्क्रिप्ट लिख रखने के फायदे बताते हैं, इसका सबसे बड़ा फ़ायदा है पैसों की बचत यदि स्क्रिप्ट नहीं है तो अक्सर शूटिंग के दौरान काफ़ी कुछ दोबारा शूट करना पड़ता है जिससे बजट असंतुलित हो जाता है। उन्हें सबसे कम शूटिंग ‘कंचनजंघा’ फिल्म के दौरान करनी पड़ी। यह फिल्म रंगीन थी, अत: मंहगी थी, इसलिए भी वे अधिक सावधानी से, अधिक अनुशासन के साथ शूटिंग कर रहे थे।

इस फिल्म के साथ एक और बात थी, उनके पास कुशल-अनुभवी अभिनेता छबि बिश्वास थे, वे सत्यजित राय के काम करने के तरीके से भली-भांति परिचित थे। अभिनेता पहले से तैयारी करके आते अत: इस फिल्म की शूटिंग में कम समय और कम खर्च लगा। नए अभिनेता भी अच्छे थे जल्द सीख रहे थे। मगर पहली ‘पथेर पांचाली’ का केस भिन्न था। उसके बनाते समय कई बार सही परिणाम पाने के लिए उन्हें सही पल पकड़ने के लिए उन्हें एक दर्जन टेक लेने पड़े।

'दर्शकों को अनदेखा नहीं किया जा सकता'

फिल्म का सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटक दर्शक है, उन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता है। स्क्रिप्ट दर्शक को ध्यान में रखकर लिखनी होती है। सत्यजित राय के अनुसार उन्हें कई बात का ध्यान रखना पड़ता है क्योंकि वे एक सीमित बाजार में काम करते हैं। उनके दर्शक खास प्रकार के हैं। उनके अनुसार उनके संभावित दर्शक बहुत सीमित मात्रा में हैं क्योंकि वे बहुत अलग तरह की फिल्म बनाते हैं ये फिल्में चालू फिल्मों से बहुत भिन्न होती हैं।

सत्यजित राय के दर्शक शहरों और कस्बों में हैं। उनका ध्यान ऐसी फिल्में बनाने की होता है जो ये दर्शक नापसंद न करें साथ ही फिल्में वेनिस कान एवं बर्लिन मतलब यूरोप में भी स्वीकृत हों। उनका मानना है ये विदेशी दर्शक बहुत परिष्कृत रुचि के होते हैं। हालांकि मैं उनके विचार से सहमत नहीं हूं, मेरी दृष्टि में भारतीय दर्शक की रुचि भी परिष्कृत है।

आगे वे कहते हैं यदि वे दोनों तरह के दर्शकों को अनदेखा कर दें तो शायद अधिक स्वतंत्र हो सकेंगे। अगर वे यहां के दर्शकों को भूल कर केवल पश्चिम के लिए फिल्म बनाएं, उनके लिए जितनी सूक्ष्म हो सके उतनी सूक्ष्म फिल्म बनाएं, कठिन-जटिल विषय लें, अधिक वयस्क, अधिक खरी फिल्म बनाएं तब वे दूसरी तरह की कहानियां लेकर, भिन्न किस्म की फिल्म बनाएंगे। पार वे ऐसा नहीं कर सकते।घर-बाहर दोनों का ध्यान रखना है।

स्क्रिप्ट लिखते समय वे सिनेमायी छूट लेते थे, ‘आवर फिल्म, देयर फिल्म’ में वे लिखते हैं, जब उन्होंने परषुराम की दस पन्नों की कहानी पार स्क्रिप्ट बना कर उन्हें दिखाई तो लेखक ने इसका अनुमोदन किया। यही उन्होंने प्रेमेंद्र मित्र (कापुरुष) तथा नरेंद्र मित्र (महानगर) के साथ किया।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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