विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: उस्मान सम्बेन- स्वतंत्र अफ्रीका की आवाज
सिने-निर्देशक जो दिखाना चाहता है, दर्शक वही देखता है, वह जो विचार दर्शकों तक पहुंचाना चाहता है, वही हम फिल्म में पाते हैं। सिनेमा, निर्देशक की कठपुतली है, वह जैसा चाहे उसे नचाता है। बिना निर्देशकों के सिनेमा संभव नहीं है और बिना उनके सिनेमा के इतिहास पर बात नहीं हो सकती है। इसी तरह जब हम सेनेगॉल के सिनेमा की बात करते हैं, तो बिना उस्मान सम्बेन की बात किए हो ही नहीं सकती है।
सम्बेन बहुत सामान्य पृष्ठभूमि से आए, मगर उन्होंने विश्व के सिने-इतिहास में अपना स्थान बनाया। वे उस वर्ग से आते हैं जिसके परिवार का लिखने-पढ़ने से कोई संबंध न था। उत्तरोपनिवेश काल में वे अफ्रीका की प्रमुख आवाज हैं। उन्होंने अफ्रीका को सिने-विश्व में पहचान दिलाई।
अफ्रीका सिने-जनक उस्मान सम्बेन
मछुआरे के बेटे उस्मान सम्बेन (1 जनवरी1923-9 जून 2007) को न केवल सेनेगॉल बल्कि अफ्रीका का सिने-जनक माना जाता है। बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न उस्मान सम्बेन एक साथ लेखक, निर्देशक, अभिनेता और प्रड्यूसर थे। उन्हें सेनेगॉल के अग्रणी निर्देशक का दर्जा प्राप्त है। उन्होंने अपनी कई कहानियों को फिल्म में रूपांतरित किया। सामान्य पृष्ठभूमि के इस व्यक्ति ने 22 पुरस्कार जीते और करीब एक दर्जन नामांकन उन्हें प्राप्त हुए। जीत में कान तथा बर्लिन फिल्म समारोह के पुरस्कार भी शामिल हैं।
वे सिनेमा को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम मानते थे और इसके द्वारा वृहतर समाज तक पहुंचना चाहते थे। इस साल (2023) उनकी शताब्दी पर उनकी चिंतनशील निगाह, मुंह में सिगार और ट्रेडमार्क पग्गड़ के साथ एक भव्य प्रतिमा स्थापित की गई है। इसके साथ ही पैन-अफ्रीकन फिल्म एंड टेलीविजन समारोह का आयोजन किया गया है।
निर्देशक बनने के पूर्व उन्होंने विभिन्न तरह के काम किए, जिसमें मैकेनिक तथा राजमिस्त्री का काम भी शामिल है। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय, 1942 में फ्री फ्रेंच फोर्स में शामिल हुए और उन्होंने अफ्रीका तथा फ्रांस के लिए काम किया। 1946 में डैकर लौट कर उन्होंने 1947 की रेलवे महा-हड़ताल में भाग लिया। अगले साल वे फ्रांस लौट गए, दस साल उन्होंने कई तरह के काम किए। वे लिख रहे थे और ट्रेड यूनियन के सक्रिय कार्यकर्त्ता थे।
उनका पहला उपन्यास ‘ले डोकर नॉयर’ 1956 में प्रकाशित हुआ और जिसे समीक्षकों की सराहना मिली। लिखना जारी रखते हुए वे जल्द ही विश्व साहित्य में समाहित हो गए। शीघ्र उन्हें ज्ञात हुआ कि शब्दों से अधिक दूर तक सिनेमा की पहुंच है, यह ज्यादा कारगर माध्यम है।
फिल्म अध्ययन के लिए वे 1961 में मास्को गए और उसके बाद उन्होंने गोर्की स्टूडियोज में काम भी किया। सेनेगल लौट कर वे सिनेमा बनाने लगे। फिल्म बनाने हेतु उन्हें न्यूयॉर्क फिल्म्स का आर्थिक सहयोग प्राप्त था। 1963 में उन्होंने 20 मिनट की अपनी पहली लघु फिल्म बैरोम सारेट (The Wagoner) बनाई। इसमें वे कामगर के जीवन द्वारा सेनेगल की गरीबी को दिखाते हैं।
कदाचित किसी अश्वेत अफ्रीकी द्वारा बनाई गई यह पहली फिल्म है। अगले साल अपने ही उपन्यास पर बनाई 35 मिनट की फिल्म ‘निआये’ (Niaye) में वे दिखाते हैं कि एक लड़की के गर्भवती होने पर समुदाय कैसे इसे एक स्कैंडल बना देता है।
फिल्म ‘ब्लैक गर्ल’ रही काफी चर्चित
दो लघु फिल्मों के बाद 1966 में उस्मान सम्बेन ने अपनी ही कहानी पर पहली फीचर फिल्म ‘ब्लैक गर्ल’ बनाई। 60 मिनट की इस फिल्म ने सेनेगॉल की ओर अंतरराष्ट्रीय ध्यान खींचा। इसे कई पुरस्कार भी मिले। शायद फ्रेंच न्यू वेव सिनेमा से प्रेरित हो इस फिल्म को उन्होंने सरल, अर्ध-डॉक्यूमेंट्री शैली में बनाया।
फिल्म ‘ब्लैक गर्ल’ एक सेनेगॉल स्त्री की त्रासद कहानी है। यह स्त्री एक सम्पन्न फ्रेंच परिवार में नौकरानी का काम कर रही है। वह अपने लोगों से दूर होने के कारण अजनबीपन का शिकार है और धीरे-धीरे हताशा की ओर बढ़ रही है। आज भले ही उसका देश उपनिवेश से निकल कर स्वतंत्र हो गया है मगर वह तो अभी भी एक उपनिवेश है, कोलोनाइजर की दुनिया में उसका कोई अस्तित्व नहीं है।
पहले वे फ्रेंच भाषा में फिल्म बना रहे थे, बाद में उन्होंने अपनी मातृभाषा वोलोफ तथा बोलियों में फिल्म बनानी शुरू की। ‘द मनी ओर्डर’ (Mandabi) ऐसी ही फिल्म है। 1968 में इसे उन्होंने फ्रेंच तथा वोलोफ दोनों भाषाओं में बनाया। यह रंगीन फिल्म उन्होंने अपने ही इसी नाम के उपन्यास पर बनाई। यह प्रखर फिल्म नव बूर्जुआ पर तंज है। प्राचीन पितृसत्ता परम्परा तथा बेपरवाह, लालची और अयोग्य ब्यूरोक्रेसी के बीच खींचतान फिल्म का मुख्य स्वर है।
फिल्म ‘गॉड ऑफ थंडर’
‘गॉड ऑफ थंडर’ (Emitai) सेनेगॉला के उस क्षेत्र के लोगों का संघर्ष दिखाती है, जहां उस्मान सम्बेन का बचपन बीता था। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान इन लोगों का फ्रेंच अधिकारियों से संघर्ष हुआ था। 1971 की इस फिल्म में भी उन्होंने फ्रेंच तथा स्थानीय बोली डाओला दोनों को रखा है। फिल्म एक प्राचीन आदिवासी संस्कृति के प्रति आदर भाव प्रकट करती है, साथ ही दमनकारी औपनिवेशिक संघर्ष में स्त्रियों की भूमिका को रेखांकित करती है।
उनकी 1975 की फिल्म ‘द कर्स’ (Xala) एक बार फिर अपने समाज के बूर्जुआ को सामने लाती है। यह व्यक्ति धनी, पश्चिमी फैशन का मुस्लिम व्यापारी है। कमेडी फिल्म ‘द कर्स’ में 100 टन चावल का गबन करने वाले एक भ्रष्ट पोलिटिशियन को बेऔलाद रहने का शाप मिलता है। यह शाप उसे अपनी तीसरी शादी की रात मिलता है। उसकी तीसरी पत्नी उम्र में उससे बहुत छोटी है। इस फिल्म के लिए निर्देशक को कैर्लोवी वैरी इंटरनेशनल फिल्म समारोह में स्पेशल ज्यूरी पुरस्कार मिला था।
मजबूत स्त्री पात्र रचने वाले, 27वें बर्लिन इंटरनेशनल फिल्म समारोह (1977) के ज्यूरी मेम्बर रहे सम्बेन अपनी फिल्म ‘मूलाडे’ (Moolaade) में औरत के खतना पर बात उठाते हैं और इस मुद्दे की ओर पूरी दुनिया का ध्यान खींचते हैं। इस फिल्म को छ: पुरस्कार प्राप्त हुए।
फिल्म ‘आउटसाइडर्स’ में जबरदस्ती धर्म परिवर्तन और उसके विरोध की बात दिखाई गई है। जबरन इस्लाम में शामिल करने के विरोध में आउटसाइडार्स राजा डेम्बा वार की बेटी मतलब राजकुमारी डिओर यासिन का अपहरण कर उसके एवज में अपना क्रोध जाहिर करते हैं। इस फिल्म को बर्लिन फिल्म समारोह का पुरस्कार प्राप्त हुआ था।
1977 की फिल्म ‘आउटसाइडर्स’ (Ceddo) को उनका मास्टरपीस माना जाता है। इसमें वे अपने यथार्थवादी विचार से निकल कर पिछली सदी के संघर्ष की बात करते हैं। वे अनाम समुदाय के विरुद्ध इस्लाम की घुसपैठ तथा यूरोपियन उपनिवेशवाद का चित्रण करते हैं। यहां भी उनका स्त्री पात्र बहुत मजबूत है। फिल्म ‘आउटसाइडर्स’ अफ्रीकन अनुभव का स्मरण कराने वाली फिल्म है।
वे मानते थे कि कई आधुनिक फिल्में बेकार की बातों के चक्कर में कहानी के लिए स्थान ही नहीं छोड़ती हैं। कई लोग मानते हैं कि उनकी मृत्यु के साथ सेनेगॉल की फिल्म बनाने की समृद्ध संस्कृति समाप्त हो गई। उस्मान सम्बेन के महत्व को इसी बात से आंका जा सकता है।
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