विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: बीना पॉल- कई पदों को सुशोभित करती संपादक
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
पुणे के एफटीआईआई से एडिटिंग का प्रशिक्षण (1983) प्राप्त बीना पॉल न केवल एडिटर हैं, वरन वे डॉक्यूमेंट्री निर्देशक, केरल के इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल की आर्टिस्टिक डॉयरेक्टर तथा केरल स्टेट चलचित्र अकादमी की वाइस चेयरपर्सन भी हैं। उन्होंने अभी तक 29 फिल्मों का संपादन किया है। वे सेंटर फॉर डेवेलपिंग ऑफ इमेजिंग टेक्नॉलॉजी में सिनियर एडिटर रह चुकी हैं। उन्होंने एल. वी. प्रसाद फिल्म अकादमी (तिरुवनंतपुरम कैम्पस में प्रिंसिपल का पद भी संभाला है।), 2017 में फिल्म उद्योग में स्त्रियों के लिए समान अवसर एवं अस्मिता हेतु भारत के पहले संगठन ‘वीमेन इन सिनेमा कलेक्टिव’ की सह-संस्थापक हैं। इस संस्था ने हाल की हेमा रिपोर्ट में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
बीना के पति ने भी पुणे एफटीआईआई से सिनेमाटोग्राफी का कोर्स किया है। अपने सहपाठी वेणुगोपाल से बीना ने 1983 में शादी की। दोनों की मालविका नाम की एक बेटी है, बेटी एक म्युजियम की मैनेजर है। मलयाली पिता और कन्नडिगा मां की इस संतान बीना पॉल की परवरिश दिल्ली में हुई। बीना ने अपने संपादन जीवन का प्रारंभ जिद्दु कृष्णमूर्ति पर बनी एक डॉक्यूमेंट्री ‘द शीयर हू वॉक्स अलोन’ (1985) से की। डॉक्यूमेंट्री के निर्देशक जाने-माने गी अरविंदन हैं।
फिल्म निर्माण में एडिटर की भूमिका
फिल्म एडिटर का काम सृजनात्मक होता है उसे आकृति, कहानी, संवाद, संगीत, गति के साथ-साथ अभिनेताओं के कार्य को प्रभावपूर्ण तरीके से ‘रि-इमेजिन’ करना होता है, एक तरह से फिल्म को दोबारा लिखना होता है, ताकि अंश-अंश जुड़कर संपूर्ण हो सके। यह कार्य जितना कलात्मक है, उतना ही तकनीकि भी। फिल्म निर्माण में एडिटर की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है, वह फिल्म को बना सकता है, तो बिगाड़ने का श्रेय भी कई बार उसी को जाता है।
बीना पॉल में एक एडिटर के गुण जैसे निर्देशक से संवाद कर पाना, उसकी बात सुनना-समझना, उसके विजन को पचा पाना, पूरी टीम के साथ काम करने की क्षमता, आवश्यकता पड़ने पर समस्या समाधान-सुझाव देना देना, सृजनात्मकता, बारीकियों पर ध्यान देना, समय का पाबंद, धैर्य, काम के प्रति समर्पण आदि भरपूर हैं, इसीलिए उनका कार्य उत्तम होता है और उन्हें पुरस्कार प्राप्त होते हैं।
29 फिल्मों के साथ बीना ने करीब 40 डॉक्यूमेट्री का संपादन किया है। अरविंदन के अलावा उन्होंने राजीव विजय रागवन, जॉन अब्राहम आदि निर्देशकों के साथ डॉक्यमेंट्री पर काम किया है।
साल 1986 की राजीव विजय राघवन की डॉक्यूमेंट्री ‘सिस्टर अल्फोंसा ऑफ भरणंङानम’ की एडिटिंग बीना ने की और इस फिल्म को 34वें नेशनल फिल्म अवार्ड्स का सर्वोत्तम बायोपिक के लिए रजत कमल प्राप्त हुआ। फीचर फिल्म के संपादन का कार्य बीना ने जॉन अब्राहम की फिल्म ‘अम्मा अरियन’ (1986) से प्रारंभ किया।
इस मलयालम फिल्म को 1987 का सर्वोत्तम सिनेमाटोग्राफी का रजत कमल प्राप्त हुआ। चूंकि सिनेमाटोग्राफर वेणुगोपाल थे तो 1987 का साल इस परिवार केलिए दोहरी खुशी का रहा।
‘सिस्टर अल्फांसो ऑफ भरणंगानम’ एवं ‘अम्मा अरियन’ के अलावा बीना पॉल ने ‘पडिपुरा’, ‘जन्मदिनं’, ‘अग्निसाक्षी’ का संपादन किया है। बीना ने रेवती, सुमा जोसन, पामेला रूक्स तथा शबनम विरमानी जैसी स्त्री सिने-निर्देशकों के साथ भी काम किया है। रेवती की फिल्म ‘मित्र, माई फ्रेंड’ का पूरा निर्माण कार्य स्त्रियों ने संभाला, जाहिर-सी बात है बीना ने इस फिल्म का संपादन किया। फिल्म को दो राष्ट्रीय रजत पुरस्कार प्राप्त हुए।
एक सर्वोतम अभिनेत्री के रूप में शोभना तथा दूसरा सर्वोत्तम एडिटर के रूप में बीना पॉल की झोली में आया और फिर अगले साल उन्हें नॉन-फीचर फिल्म ‘उन्नी’ हेतु दूसरा नेशनल पुरस्कार प्राप्त हुआ (इस पुरस्कार का सत्र मुझे कहीं नहीं मिला)। बीना पॉल ने टेलीविजन के लिए भी कार्य किया है और उन्हें, ‘सायं’ 2000 तथा ‘बायोस्कोप’ 2008 के लिए सर्वोत्तम एडिटर का केरल स्टेट एवॉर्ड प्राप्त हुआ है। बीना पॉल ने अपने साथी वेणुगोपाल की फिल्मों यथा ‘दया’, एवं ‘कार्बन’ का भी संपादन किया है।
एम.टी. वासुदेवन नायर की कहानी पर बनी फिल्म ‘दया’ मध्य-पूर्व में इस्लाम पूर्व की कथा है। दया नामक बहुत बहादुर एवं बुद्धिमान गुलाम लड़की अपने मालिक के बेटे की मुसीबत में सहायता करती है। लड़का अपनी जीवन शैली के कारण अपनी तमाम सम्पत्ति खो चुका है। मंजु वारियर, नेडुमुडि वेणु तथा केपीएसी ललिता ने इस फिल्म में भूमिकाए की हैं।
फिल्म ‘दया’ के लिए मिला सर्वोत्तम एडिटर पुरस्कार
1998 की वेणुगोपाल निर्देशित फिल्म ‘दया’ हेतु बीना को सर्वोत्तम एडिटर का केरल राज्य का पुरस्कार प्राप्त हुआ। वेणुगोपाल निर्देशित फिल्म 2014 की ‘मुन्नरियिप्पु’ केलिए उन्हें एशियानेट का सर्वोत्तम संपादन का पुरस्कार मिला। इस दो घंटे फिल्म में फ्रीलान्स जर्नलिस्ट अंजलि की मुलाकात एक कैदी सी. के. राघवन से होती है। राघवन ने जो अपराध नहीं किया है, उसकी सजा वह भोग रहा है। उसके विचार दूसरों से बहुत भिन्न हैं और यही अंजलि के आकर्षण का कारण बनता है, वह उसकी प्रसन्नता और जिंदगी का दस्तावेजीकरण करती है।
‘हेडमास्टर’, ‘समटाइम’, ‘कय्योप्पु’ (हस्ताक्षर), ‘मेघमल्हार’, ‘स्थिति’, ‘मार्गम’, ‘कामिल’, ‘द डिजायार’, ‘कर्मयोगी’ आदि उनके द्वारा संपादित कुछ अन्य फिल्मों के नाम हैं। तम्बाकू, वृद्धों की रेखभाल, मधुमेह रोग के मैनेजमेंट जैसे सामाजिक उत्थान कार्यों से जुड़ी फिल्म कैम्पेन में संलघ्न बीना पॉल से अभी फिल्म जगत को काफी उम्मीदें हैं।
----------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।