फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   History Of Opium And Its Uses In Drugs and Medicine

अफीम की खेती: नशे का अभिश्राप भी और प्रकृति का वरदान भी

Wed, 12 Jul 2023 02:25 PM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Wed, 12 Jul 2023 02:25 PM IST
सार

भारत उन कुछ देशों में से एक है, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निर्यात के लिए अफीम पोस्ता की खेती करने की अनुमति है। लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी बेहद हानिकारक है। इससे बने मार्फीन, कोडीन और हीराइन जैसी जीवन रक्षक दवाओं के दुरुपयोग से युवा पीढ़ी बर्बाद भी हो रही है।

विज्ञापन
History Of Opium And Its Uses In Drugs and Medicine
अफीम का स्राेत्र पॉपी औषधीय उपयोग के लिए दर्ज सबसे शुरुआती पौधों में से एक माना जाता है। - फोटो : Istock

विस्तार

अफीम अपने अद्वितीय चिकित्सीय गुणों के कारण प्रकृति का चमत्कार और दुनिया को भारत का उपहार है और चिकित्सा जगत में अपरिहार्य है। अफीम एक अवसादरोधी दवा है, जो कि आपके मस्तिष्क और शरीर के बीच संचार को धीमा कर बहुत तीव्र दर्द से आराम दिलाती है। यह पोस्ता (पापावर सोम्निफेरम एल.) से प्राप्त होती है।

विज्ञापन


अफीम का स्राेत्र पॉपी औषधीय उपयोग के लिए दर्ज सबसे शुरुआती पौधों में से एक माना जाता है। ऐलोपैथी के साथ ही इसका होम्योपैथी और आयुर्वेद या स्वदेशी दवाओं की यूनानी प्रणालियों में भी जीवन रक्षक के तौर पर उपयोग होता है।
विज्ञापन


भारत उन कुछ देशों में से एक है, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निर्यात के लिए अफीम पोस्ता की खेती करने की अनुमति है। लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी बेहद हानिकारक है। इससे बने मार्फीन, कोडीन और हीराइन जैसी जीवनरक्षक दवाओं के दुरुपयोग से युवा पीढ़ी बर्बाद भी हो रही है। अफीम की पोस्त से ही खसखस बीज निकलते हैं, जो कि भारतीय किचन के कुछ अहम इंग्रीडिएंट्स में से एक हैं और ये सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में खाने के एक अहम हिस्से के तौर पर देखी जाती है।

विज्ञापन
विज्ञापन

अफीम नशे से कहीं बढ़ कर जीवनरक्षक दवा है

अफीम भले ही नशेड़ियों के लिए अनिष्टकर हो मगर कैंसर जैसी गंभीर बीमारी में यह जीवनरक्षक और असहनीय दर्द में राहत देने वाली दवाओं का स्रोत भी है। इसमें मार्फिन, नर्कोटीन, कोडीन, एपोमॉर्फीन, आपिओनियन, पापावरीन आदि क्षारतत्त्व (एल्केलाइड) तथा लेक्टिक एसिड, राल, ग्लूकोज, चर्बी व हल्के पीले रंग का निर्गन्ध तेल होता है। अफीम से बनी सबसे शक्तिशाली दर्द निवारक ओपिओइड है। दर्द में यह बहुत प्रभावी माना जाता है।


ओपिओइड का ब्राण्ड नाम ऑक्सीकॉन्टिन (ऑक्सीकोडोन) विकोडिन, नार्को और लोर्टैब (एसिटामिनोफेन के साथ हाइड्रोकोडोन) पर्कोसेट (एसिटामिनोफेन के साथ ऑक्सीकोडोन) हैं।

ऑपरेशन से पहले ट्रैंकुलाइजर और बाद के दर्द को कम करने और रोगियों को आराम दिलाने के लिए अक्सर सर्जिकल प्रक्रियाओं के बाद ओपिओइड का प्रयोग किया जाता है। कीमोथेरेपी, विकिरण चिकित्सा या अन्य कैंसर उपचारों से जुड़े दर्द को नियंत्रित करने के लिए रोगियों में अक्सर अफीम से निर्मित दवाओं का उपयोग किया जाता है। पुरानी लाइलाज बीमारियों में दर्द को कम करने के लिए इन दवाओं का उपयोग किया जाता है। कभी-कभी खांसी को दबाने के लिए एक एंटीट्यूसिव के रूप में यह उपयोग की जाती है।

इधर, लोपरामाइड का उपयोग मल त्याग को धीमा करके दस्त के इलाज के लिए भी किया जा सकता है। लेकिन यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि लत, दुष्प्रभाव और अन्य जोखिमों की संभावना के कारण इनका उपयोग निर्धारित खुराक और अवधि के अनुसार और चिकित्सकीय देखरेख में ही किया जाना चाहिए।
 

मुगलों के बाद अंग्रेजों ने भी अफीम से कमाई की मुगल साम्राज्य के दौरान, अफीम बड़े पैमाने पर उगाया जाता था और यह चीन और अन्य पूर्वी देशों के साथ व्यापार की एक महत्वपूर्ण वस्तु थी। 16वीं शताब्दी के उत्तरार्ध के दौरान, अफीम को एक राज्य के एकाधिकार के तहत लाया गया था। हालांकि, मुगल साम्राज्य के अंतिम वर्षों के दौरान राज्य ने अपनी पकड़ खो दी और अफीम के उत्पादन और बिक्री पर नियंत्रण पटना में व्यापारियों के एक गुट द्वारा विनियोजित किया गया। सन् 1757 में प्लासी के युद्ध के बाद अफीम की खेती का एकाधिकार ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथों में चला गया। 


1873 में तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड वारेन हेस्टिंग्स ने अफीम के पूरे व्यापार को सरकार के नियंत्रण में ले लिया। औषधीय और वैज्ञानिक प्रयोजन के अलावा अफीम के अत्यंत खतरनाक दुष्प्रभाव को लेकर विश्व समुदाय की चिंताओं को ध्यान में रखते हुए भारत में ब्रिटिश काल में ही अफीम की खेती को सीमित करने की प्रकृया शुरू हो गई थी।

सन् 1909 में अफीम की खेती पर अंकुश लगाने के लिए हुई अंतर्राष्ट्रीय संधि पर भारत सरकार ने भी हस्ताक्षर किए थे। ब्रिटिश काल में ही सन् 1910 में बिहार में अफीम की खेती पर पूर्ण प्रतिबंध लग गया था। उत्तर प्रदेश में भी अफीम की खेती को चरणबद्ध तरीके से घटाने की प्रक्रिया शुरू हो गई थी।

History Of Opium And Its Uses In Drugs and Medicine
भारत सरकार हर साल अफीम पोस्त की खेती के लिए लाइसेंसिंग नीति की घोषणा करती है। - फोटो : Istock

1947 में भारत को स्वतंत्रता मिलने के बाद अफीम की खेती और निर्माण पर नियंत्रण 1 अप्रैल, 1950 से केंद्र सरकार की जिम्मेदारी बन गया। अफीम और राजस्व कानून (आवेदन का विस्तार) अधिनियम 1950 के आधार पर केंद्र सरकार के तीन अधिनियम, अफीम अधिनियम 1857, अफीम अधिनियम 1878 और खतरनाक औषधि अधिनियम 1930 बनाए जो कि भारतीय संघ के सभी राज्यों में समान रूप से लागू हो गए। पिछले कुछ वर्षों में अफीम के नियंत्रण, उत्पादन, वितरण, बिक्री और कब्जे के तरीकों में कुछ बदलाव हुए और एकाधिकार पूरी तरह से भारत सरकार के हाथों में ही रहा।

जनजाति क्षेत्रों में अफीम उत्पादन की छूट रही

जनजाति क्षेत्रों में ब्रिटिश कानून भी सदैव शिथिल रहे। जनजातियों को जहां अपने उपभोग के लिए शराब बनाने की छूट रही, वहीं अफीम उत्पादन में भी शिथिलता बरती गई। मसलन उत्तराखंड के जनजातीय जौनसार बावर क्षेत्र में प्राचीन काल से मसाले आदि के लिए अफीम की खेती होती रही।

भारत का संविधान लागू होने से पूर्व जौनसार बावर परगना अनुसूचित क्षेत्र होने के कारण यहां अफीम अधिनियम 1857 तथा अनिष्टकर मादक द्रव्य अधिनियम, 1930 लागू नहीं होता था।

सन् 1950 में अफीम और राजस्व विधि (लागू होना विस्तारण) अधिनियम, 1950 के लागू होने के बाद 18 अप्रैल 1950 से इस क्षेत्र में भी अफीम अधिनियम 1857 और अनिष्टकर मादक द्रव्य अधिनियम, 1930 भी लागू हो गए।

चूंकि 30 सितम्बर 1962 को लाइसेंसिंग की अवधि समाप्त होने से 1 अक्टूबर 1962 से अफीम की खेती पर पूर्ण प्रतिबंध लग गया था और इसका व्यापक प्रचार-प्रसार भी किया गया फिर भी केन्द्र सरकार को अफीम की अवैध खेती की सूचनाएं मिलीं। वर्ष 1961-62 में केवल 17 हेक्टेअर के लिए लाइसेंस दिए गए थे लेकिन वास्तव में 25 हेक्टेअर में अफीम की खेती की सूचना मिली।

इस प्रकार 1 अक्तूबर 1963 से जौनसार बावर परगने में अफीम की खेती पर सम्पूर्ण प्रतिबंध लग गया। अब इस क्षेत्र में सरकार के नियंत्रण में अफीम की खेती की मांग की जा रही है।

सरकारी देखरेख में होती है अफीम की खेती

भारत सरकार हर साल अफीम पोस्त की खेती के लिए लाइसेंसिंग नीति की घोषणा करती है, अन्य बातों के साथ, लाइसेंस जारी करने या नवीनीकरण के लिए न्यूनतम योग्यता उपज, अधिकतम क्षेत्र जो एक व्यक्तिगत किसान द्वारा खेती की जा सकती है। अधिकतम लाभ जिसकी अनुमति दी जा सकती है प्राकृतिक कारणों आदि के कारण होने वाले नुकसान के लिए एक किसान को।

अफीम पोस्त की खेती केवल उन्हीं क्षेत्रों में की जा सकती है जो सरकार द्वारा अधिसूचित हैं। वर्तमान में ये क्षेत्र तीन राज्यों, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश तक ही सीमित हैं। मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले और राजस्थान के चित्तौड़गढ़ और झालावाड़ जिले में अफीम उत्पादक कुल क्षेत्रफल का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा है।

सरकार के नियंत्रण में चलते हैं अफीम कारखाने

नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सबस्टेंस एक्ट 1985 और नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस रूल्स, 1985 के तहत वर्तमान में नारकोटिक्स कमिश्नर अधीनस्थों के साथ अफीम पोस्त की खेती और अफीम के उत्पादन के अधीक्षण से संबंधित सभी शक्तियों का प्रयोग करता है और सभी कार्य करता है।

भारत में दो सरकारी अफीम और अल्कलॉइड कारखाने हैं पर बेहतर नियंत्रण और प्रबंधन करने के लिए वर्ष 1976 में मुख्य कारखानों के नियंत्रक के संगठन की स्थापना की गई थी। ये कारखाने मध्य प्रदेश के नीमच और उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में हैं।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकताु, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed