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दूसरा पहलू: दो तलवारों से बनी थी पहली कैंची, बड़ा रोचक है इतिहास
Tue, 23 Jun 2026 07:23 AM IST
निर्मल कांत
नितिन यादव
नितिन यादव
Published by: निर्मल कांत
Updated Tue, 23 Jun 2026 07:23 AM IST
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कैंची
- फोटो :
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विस्तार
मेरठ के नाम के साथ ही कैंची की तेज धार की पहचान भी जुड़ी है। कैंची का इतिहास बड़ा रोचक है। बताया जाता है कि मुगलकाल में लगभग 1645 के आसपास एक लोहार ने कैंची का आविष्कार किया। दरअसल, अखुंजी नाम के इस लोहार को चमड़ा काटना था। इसके लिए दो तलवारों को मिलाकर एक कील से जोड़कर चमड़ा काटने का जुगाड़ किया गया। इस तरह पहली कैंची दो तलवारों के आकार की बनी। इसके बाद अखुंजी के वंशजों ने कैंची बनाने का काम शुरू कर दिया। धीरे-धीरे आकार छोटा होता गया और पीतल एवं तांबे से कैंचियां बनने लगीं। धार की धमक ऐसी हुई कि देश ही नहीं, दुनिया के 30 देशों में इसका निर्यात होता है।आज भी मेरठ के छोटे-छोटे मोहल्लों में 125 इकाइयों में यह कैंची बनती है। इसको 2015 में जीआई टैग मिल चुका है और यह पहचान मजबूत हो गई कि कोई और मेरठ की कैंची को अपनी नहीं बता सकता। एक छोटी-सी कैंची को बनाने में मशीनों के साथ-साथ हाथ की कारीगरी की भी बड़ी भूमिका होती है। अखुंजी के परिवार से जुड़े शरीफ अहमद बताते हैं कि एक कैंची को बनाने में 17 कारीगर लगते हैं। हर कारीगर अलग-अलग काम करता है और एक कैंची को बनने में दो से तीन दिन लगते हैं। मेरठ की कैंची की धार को ऐसा बनाया जाता है कि यह लंबे समय तक चले। मशीनों के बजाय कारीगर का तर्जुबा ही इसका घुमाव और धार तय करता है।
ऐसा कोई फ्रेम नहीं होता, जिसमें कैंची की बनावट को फिट करके एक जैसे पीस बनाए जा सकें। चीन, जापान और इटली जैसे देशों में कैंची का उत्पादन तो खूब होता है, लेकिन वे मशीन से बनती हैं। उनमें मेरठ की कैंची की तरह दोबारा से धार नहीं लग सकती है। शरीफ अहमद बताते हैं कि कोरोना काल में जब विदेशों से कैंची आनी बंद हो गई, तो घरेलू कारोबार सालाना एक हजार करोड़ रुपये का हो गया था। अब कारीगरों की तैयारी है कि पुराने पैटर्न को बदलकर नए ट्रेंड की कैंची बनाई जाए, जिससे कि विदेशों से आने वाली कैंचियों को टक्कर दी जा सके। हालांकि, टक्कर की बात से कारीगर थोड़ा नाराज से दिखते हैं, वह कहते हैं-मेरठ की कैंची एक कला है, कारीगरी का हुनर है, किसी मशीन से बना उत्पाद नहीं। इसलिए, इसकी किसी से टक्कर हो ही नहीं सकती है।