विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: इटली का सिनेमा और नवयथार्थवाद
जब भी नवयथार्थवादी फिल्मों की बात चलती है, बात केवल विटोरियो डि सिका की 1949 में बनी ‘बाइसिकिल थीफ़्स’ (अमेरिका में ‘बाइसिकिल थीफ़) पर ही जा कर ठहर जाती है। वैसे इस दौर में ‘मिरकल इन मिलान, ‘ओब्सेसन’, ‘ओपेन सिटी’, ‘दि अर्थ ट्रेम्बल्स’ तथा इस तरह की कुछ अन्य फिल्में बनीं।
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द्वितीय विश्व युद्ध यूरोप की एक बहुत बड़ी घटना थी, जिसने पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया। जब-जब सत्ता के अहंकार ने बढ़ कर मनुष्य के जीवन का संहार किया तब-तब जिजीविषा की तलाश ने सृजन की राह अपनाई है। मनुष्य ने विध्वंस और उन्माद के कारणों का अपने ढंग से हमेशा प्रतिकार करने का प्रयास किया है।
इस महायुद्ध से इटली भी अछूता न रहा। इटली के फाससिस्ट मुसोलिनी काल में जीवन की जकड़न का फिल्मकारों ने अपने ढंग से विरोध किया। इन्होंने फिल्म के द्वारा अपना प्रतिरोध जाहिर किया। ये फिल्में नवयथार्थवादी फिल्में कहलाई। इटली का नवयथार्थवाद और उससे प्रभावित फिल्में क्रांति अथवा राजनैतिक आधारित फिल्में न हो कर आदमी के जीवन की सामान्य समस्याओं पर केंद्रित होती फिल्में हैं। वैसे इटली में इस तरह की फिल्मों का जीवन मात्र नौ साल (1942-1951) रहा।
जब भी नवयथार्थवादी फिल्मों की बात चलती है, बात केवल विटोरियो डि सिका की 1949 में बनी ‘बाइसिकिल थीफ़्स’ (अमेरिका में ‘बाइसिकिल थीफ़) पर ही जा कर ठहर जाती है। वैसे इस दौर में ‘मिरकल इन मिलान, ‘ओब्सेसन’, ‘ओपेन सिटी’, ‘दि अर्थ ट्रेम्बल्स’ तथा इस तरह की कुछ अन्य फिल्में बनीं। प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक मार्टिन स्कोरसेस के अनुसार फ़िल्म इतिहास में यह (फ़िल्म नवयथार्थवाद) सर्वाधिक बहुमूल्य पल है।
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इस छोटी-सी अवधि में इटली में नवयथार्थवाद की भाषा में बनी कई फिल्मों ने विश्वभर के फ़िल्म निर्देशकों को कई कालजयी फ़िल्में बनाने की प्रेरणा दी। नवयथार्थवादी फिल्में कम बजट में सामान्य लोकेशन पर अक्सर गैर-पेशेवर अभिनेताओं को ले कर बनाई जाती है (कभी-कदा पेशेवर अभिनेता भी लिए जाते हैं), इससे इनमें यथार्थ का पुट रहता है। इनकी एक विशेषता है कि ये राजनीति से अधिक आर्थिक कठिनाइयों और नैतिक स्थितियों का चित्रण करती हैं। अधिकांशत: इनमें रोजमर्रा जीवन की गरीबी, अत्याचार, दमन, शोषण, हताशा-निराशा, संघर्ष आदि को दिखाया जाता है।
इटली का प्रारंभिक सिने-काल
भारत के फ़िल्म निर्देशक भी इससे अछूते न रहे। चलिए इससे पहले बात करते हैं इटली के प्रारंभिक सिने-काल की। कई अन्य देशों की भांति इटली में भी पहले पहल डॉक्यूमेंट्री फिल्में ही बनीं। आज की डॉक्यूमेंट्री की भांति लंबी न हो कर मात्र कुछ सैकेंड की होती थीं। फ़िल्मांकन सामान्य कैमरे द्वारा किया जाता था।
विषय-वस्तु अपने समय के प्रमुख व्यक्तियों अथवा खबरों पर केंद्रित हुआ करती थी। उन दिनों सम्राट, उनकी पत्नियां और पोप ही प्रमुख व्यक्ति होते थे और उनसे जुड़ी बातें खबरें हुआ करती थीं। 1896 में ऐसी ही एक डॉक्यूमेंट्री ‘किंग एंड क्वीन इन फ़्लोरेंस’ नाम से बनी, यह फ़िल्म आज उपलब्ध नहीं है। एक अन्य डॉक्यूमेंट्री के कुछ अंश मिलते हैं जिसमें पोप लियो तेरहवां वतिकान के बाग में प्रार्थना करने जा रहा है और वह कैमरे की ओर मुड़ कर आशीर्वाद देता है।
इटली सिनेमा का जन्म 1903-1909 के बीच माना जाता है जो अपने चरम पर 1914 में पहुंचा। धीरे-धीरे फिल्म की लंबाई बढ़ने लगी अब वह 10-15 मिनट की होने लगी। इस समय फ़्लोरेंस तथा टुरिन फिल्म निर्माण के प्रमुख केंद्र थे।
टुरिन में पांच प्रोडक्शन कंपनी थीं, इसी तरह उस समय रोम में ‘सिने प्रोडक्शन्स’, ‘ग्लैडियेटर फ़िल्म’, ‘मेडुसा फ़िल्म’ तथा ‘फ़िल्म रेनेसां’ नाम से कंपनियां थीं। मिलान का लुका कमेरिओ की कंपनी के पास फ़िल्म निर्माण के सर्वोत्तम उपकरण थे आज यह कंपनी ‘मिलानो फ़िल्म’ के नाम से जानी जाती है।
कुछ समय बाद नेपल्स में कई अन्य कंपनी आ गईं। इटली में भी पहले फ़िल्म नाटक परम्परा पर आधारित होती थी। इटली की ‘हिस्टोरिकल कोस्ट्यूम’ फ़िल्में दुनिया भर में भेजी जाती और वे खूब सफ़ल होती थीं। फ़िलोटेओ एलबेरिनी की बनाई 15 मिनट की ‘द फ़ाल ऑफ़ रोम’, एनरिको गौज़ोनी की ‘को वाडिस?’ तथा ‘द जेरुसेलम डेलिवर्ड’ ऐसी ही फ़िल्में थी।
1913 में विजुअल इफ़ैक्ट से ‘द लास्ट डेज ऑफ पोम्पेई’ में ज्वालामुखी फटने के दृश्य ने उस समय के सारे रिकॉर्ड्स तोड़े। इसे देख कर दर्शक और वातावरण भय से कांपता था। इसे ‘प्रलयंकर शैली’ का जनक माना जाता है। 1908 में प्रारंभ हुए फ़्रांस के ‘कला सिनेमा’ को भी इटली के सिनेमा ने अपनाया। इस शैली के अंतर्गत वहां 1910 में ‘द फ़ाल ऑफ़ ट्रॉय’ तथा 1911 में ‘हेल’ एवं ‘वेलर्टी’ जैसी फ़िल्में बनीं। पर कमाल किया गिवानी पैस्ट्रोन ने, उसने 1914 में ‘कैबिरिआ’ नाम से ऑपेरा की तर्ज पर ढ़ाई घंटे की फ़िल्म बनाई।
उसने एक साथ कई कैमरों का प्रयोग किया और एक सीन को विभिन्न कोण से दिखाया। जाहिर-सी बात है दर्शकों ने इसे हाथों-हाथ लिया। इस फ़िल्म की सफलता ने सिनेमा को सदा के लिए बदल दिया। इससे अमेरिकन फ़िल्म के प्रसिद्ध निर्देशक डेविड डब्ल्यू ग्रिफ़िथ भी प्रभावित हुए।
फीचर फिल्मों में इटली के निर्देशकों की भूमिका
आज जिसे हम फ़ीचर फिल्म कहते हैं उसके लिए सिने-संसार इटली के स्क्रीन राइटर और निर्देशकों का सदा आभारी रहेगा। सिने जगत की कई बातों में अग्रणी इटली में ही ‘सोशल ड्रामा’ तथा ‘दीवा-फ़िल्म’ का प्रारंभ हुआ। ‘दीवा-फ़िल्म का मतलब है, सिने-स्टार के ग्लैमर पर आधारित फ़िल्म। ये फ़िल्में नई अभिनेत्रियों के लिए नाम कमाने का साधन बनीं। इसी के कारण लिडा बोरेली, फ़्रान्सिस्का बेरटिनी, लीना कैवालेरी को आज भी याद किया जाता है। इन फिल्मों का प्रमुख कथानक प्रेम के इर्द-गिर्द बुना जाता था। सब कुछ बढ़ा-चढ़ा कर दिखाया जाता था।
ऐसी फ़िल्मों में न केवल अभिनेत्रियों को स्टार बनाया जाता वरन अभिनेता भी इस सीढ़ी से ऊपर चढ़ाए जाते थे। परदे के अलावा रेडियो, न्यूजपेपर यानी मीडिया द्वारा इनका प्रचार-प्रसार किया जाता। यह सिस्टम यह आज भी कायम है। इस समय की इटली की प्रसिद्ध दीवा एलेओनोरा डस थी। वह नोबेल पुरस्कृत ग्राज़िया डेलेडा की किताब पर आधारित फ़िल्म ‘चेनरी’ में काम करने के लिए जानी जाती है। इसी काल में इटली में प्रथम महिला कमेडियन लिआ गिउन्ची का आगमन हुआ।
इटली से आने वाले सिनेमा में ‘टू वीमेन’, ‘द कन्फ़र्मिस्ट’, ‘ब्लैक संडे’, ‘स्पार्कटस’, ‘जुलियस सीजर’, ‘बेन-हर’, ‘टी विथ मुसोलिनी’, ‘द ग्रेट वार’, ‘द पोस्टमैन’, ‘ग्लैडियेटर’, ‘मुसोलिनी एंड आई’, ‘कैसोनोवा’, ‘बिटर राइस’, ‘नॉस्टाल्जिया’, ‘द नेम ऑफ़ द रोज’, ‘कापो’, ‘द गॉड फ़ादर‘, ‘द पर्फ़ेक्ट स्ट्रेन्जर्स’, कुछ प्रमुख नाम हैं।
इक्कीसवीं सदी की बात करें तो ‘द बेस्ट यूथ’, ‘कॉल मी बाई योर नेम’, ‘द बेस्ट ऑफ़र’, ‘द ग्रेट ब्यूटी’, ‘पार्फ़ेक्ट स्ट्रेंजर्स’, ‘वन हंड्रेड स्टेप्स’, ‘ट्वाइस बोर्न’, ‘आई’एम नॉट स्कैयर्ड’, ‘फ़ेसिंग विन्डोज’, ‘आई एम लव’, ‘आई कैन क्विट व्हेनवर आई वान्ट’, ‘मिड-अगस्ट लंच’ जैसी फ़िल्में इटली में बनी हैं। इनमें से कुछ आपने अवश्य देखी होंगी। कुछ और देख लीजिए।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।