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हिंदी दिवस विशेष: भविष्य में विश्व-भाषा बनने के पथ पर अग्रसर है हिंदी

Hari Govind Vishwakarma हरगोविंद विश्वकर्मा
Updated Sat, 14 Sep 2019 03:09 PM IST
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Hindi Diwas 2019 Special History Slogans and Quotes
सबसे बड़ी बात यह कि हिंदी भाषा जैसे लिखी जाती है, वैसे बोली भी जाती है।

हिंदी दुनिया में सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में से एक है। यह अपने आप में पूर्ण रूप से समर्थ और सक्षम भाषा है। सबसे बड़ी बात यह कि हिंदी भाषा जैसे लिखी जाती है, वैसे बोली भी जाती है। दूसरी भाषाओं में कई अक्षर साइलेंट होते हैं और उनके उच्चारण भी लोग अलग-अलग करते हैं, लेकिन हिंदी के साथ ऐसा नहीं होता। इसलिए हिंदी को बहुत सरल भाषा कहा जाता है। हिंदी को कोई भी बहुत आसानी से सीख सकता है। हिंदी अति उदार, समझ में आने वाली सहिष्णु भाषा होने के साथ भारत की राष्ट्रीय चेतना की संवाहिका भी है।

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पूरब से पश्चिम या उत्तर से दक्षिण, आप देश के किसी कोने में चले जाइए, दो अलग-अलग भाषा के लोग जब एक दूसरे से बात करेंगे तो केवल हिंदी में ही। महाराष्ट्र का उदाहरण ले सकते हैं, जब यहां कोई गुजराती व्यक्ति किसी मराठी व्यक्ति से मिलता है, तो दोनों हिंदी में बातचीत करते हैं। इसी तरह जब कोई दक्षिण भारतीय को किसी मराठी, गुजराती या बंगाली से कुछ कहना चाहता है तो वह भी केवल हिंदी का ही सहारा लेता है।
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आप चेन्नई या तमिलनाडु के किसी दूसरे इलाक़े में चले जाइए। राजनीतिक रूप से हिंदी का विरोध करने के बावजूद वहां लोग धड़ल्ले से हिंदी बोलते हैं। जो तमिलनाडु की जनता को हिंदी विरोधी जनता मानते हैं, उन्हें भी वहां तमिल लोगों को हिंदी बोलते देखकर हैरानी होगी कि हिंदी का सबसे ज़्यादा विरोध करने वाले तमिलनाडु में भी दूसरी भाषा के लोग आमतौर पर हिंदी में ही बात करते हैं। यही हाल केरल का है। सीमांध्र-तेलंगाना और कर्नाटक में तो हिंदी रच बस गई है।

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अमेरिका के कई प्रमुख लोग भी कहते हैं भविष्य में हिंदी सीखे बिना काम नहीं चलेगा। - फोटो : अमर उजाला

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी मानते हैं कि भारत में हिंदी सर्वमान्य भाषा है। बचपन का अनुभव शेयर करते हुए प्रधानमंत्री कहते हैं, “गुजरात के वड़नगर रेलवे स्टेशन, जहां मैं पैदा हुआ था, पर चाय बेचते समय जब भी मझसे कोई गैर-गुजराती भाषी रेल यात्री मिलता, तो वह केवल हिंदी में ही बोलता था, उससे टूटी-फूटी हिंदी बोलते-बोलते मैं भी हिंदी सीख गया।” यानी जो बात हमारे देश के प्रधानमंत्री कह रहे हैं, उसमें कोई बात तो ज़रूर होगी।

हिंदी भविष्य में विश्व-भाषा बनने के पथ पर अग्रसर है। विश्व के सर्वाधिक शक्तिशाली राष्ट्र अमेरिका के कई प्रमुख लोग भी कहते हैं भविष्य में हिंदी सीखे बिना काम नहीं चलेगा। पूर्व राष्ट्रपति बरॉक ओबामा ने तो कई अवसरों पर अमेरिकी नागरिको को हिंदी सीखने की सलाह दी थी। वह यह सलाह अकारण ही नहीं थी। भारत उभरती हुई विश्व-शक्ति के रूप में पूरे विश्व में जाना जा रहा है। यहां संस्कृत और भाषा हिंदी को ध्वनि-विज्ञान और दूर संचारी तरंगों के माध्यम से अंतरिक्ष में अन्य सभ्यताओं को संदेश भेजे जाने के नज़रिए से सर्वाधिक सही पाया गया है।

अगर हिंदी भाषा के इतिहास की बात करें तो यह भाषा लगभग एक हज़ार साल पुरानी मानी जाती है। सामान्यतः प्राकृत की अंतिम अपभ्रंश अवस्था से ही हिंदी साहित्य का आविर्भाव स्वीकार किया जाता है। उस समय अपभ्रंश के कई रूप थे और उनमें सातवीं-आठवीं सदी से ही 'पद्म' रचना प्रारंभ हो गई थी। हिंदी भाषा और साहित्य के जानकार अपभ्रंश की अंतिम अवस्था 'अवहट्ठ' से हिंदी का उद्भव मानते हैं। चंद्रधर शर्मा 'गुलेरी' ने इसी अवहट्ठ को 'पुरानी हिंदी' नाम दिया।

चीनी के बाद हिंदी दुनिया में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। हिंदी और इसकी सहायक बोलियां उत्तर एवं मध्य-भारत के विभिन्न राज्यों में बोली जाती हैं। विदेशों में भी लोग हिंदी बोलते, पढ़ते और लिखते हैं। फ़िजी, मॉरीशस, गुयाना, सूरीनाम और नेपाल की जनता भी हिंदी बोलती है। एक अनुमान के अनुसार भारत में 42.2 करोड़ लोगों की आम भाषा हिंदी है। वैसे इस देश में क़रीब एक अरब लोग हिंदी बोलते और समझते हैं।

 

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14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने लंबी बहस के बाद एक मत से निर्णय लिया था कि हिंदी ही भारत की राजभाषा होगी।  - फोटो : अमर उजाला

इसी तरह हिंदी साहित्य का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। भाषा वैज्ञानिक डॉ हरदेव बाहरी के शब्दों में, 'हिंदी साहित्य का इतिहास वस्तुतः वैदिक काल से शुरू होता है। साहित्य की दृष्टि से आरंभ में पद्यबद्ध रचनाएं मिलती हैं। वे सभी दोहा के रूप में ही हैं और उनके विषय धर्म, नीति और उपदेश होते हैं। राजाश्रित कवि और चारण नीति, श्रृंगार, शौर्य, पराक्रम आदि के वर्णन से अपनी साहित्य-रुचि का परिचय दिया करते थे।

यह रचना-परंपरा आगे चलकर शैरसेनी अपभ्रंश या प्राकृताभास हिंदी में कई वर्षों तक चलती रही। पुरानी अपभ्रंश भाषा और बोलचाल की देशी भाषा का प्रयोग निरंतर बढ़ता गया। हिंदी को कवि विद्यापति ने देसी भाषा कहा है, किंतु यह निर्णय करना सरल नहीं है कि हिंदी शब्द का प्रयोग इस भाषा के लिए कब शुरू हुआ। इतना ज़रूर कहा जाता है कि शुरू में हिंदी शब्द का प्रयोग मुस्लिम आक्रांताओं ने किया था। इस शब्द से उनका तात्पर्य 'भारतीय भाषा' का था।

दरअसल, हिंदी को हर क्षेत्र में प्रचारित-प्रसारित करने के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के अनुरोध पर ही सन् 1953 से संपूर्ण भारत में 14 सितंबर को हर साल हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। देश के संविधान के 17 वें अध्याय की धारा 343/एक में वर्णित है: भारतीय संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी। भारतीय संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप अंतर्राष्ट्रीय रूप होगा। 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने लंबी बहस के बाद एक मत से निर्णय लिया था कि हिंदी ही भारत की राजभाषा होगी। 

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संविधान सभा की भाषा संबंधी बहस लगभग 278 पृष्ठों में छपी है। - फोटो : अमर उजाला

बहस में देश के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने भी भाग लिया था। संविधान सभा में 13 सितंबर, 1949 को पं. नेहरू ने तीन प्रमुख बातें कही थीं, पहली बात- किसी विदेशी भाषा से कोई राष्ट्र महान नहीं हो सकता। दूसरी बात- कोई भी विदेशी भाषा आम लोगों की भाषा नहीं हो सकती और तीसरी बात- भारत के हित में, भारत को एक शक्तिशाली राष्ट्र बनाने के हित में, ऐसा राष्ट्र बनाने के हित में जो अपनी आत्मा को पहचाने, जिसे आत्मविश्वास हो, जो संसार के साथ सहयोग कर सके, हमें हिंदी को अपनाना ही होगा।

संविधान सभा की भाषा संबंधी बहस लगभग 278 पृष्ठों में छपी है। इस संबंध में डॉ. कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी और गोपाल स्वामी आयंगार की अहम भूमिका रही। बहस में सहमति बनी कि भारत की भाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी। हालांकि देवनागरी में लिखे जाने वाले अंकों तथा अंग्रेज़ी को 15 वर्ष या उससे अधिक अवधि तक प्रयोग करने के मुद्दे पर तीखी बहस हुई। अंतत: आयंगर-मुंशी का फ़ार्मूला भारी बहुमत से स्वीकार कर लिया गया। वास्तव में अंकों को छोड़कर संघ की राजभाषा के सवाल पर अधिकतर सदस्य सहमत हो गए। अंकों के बारे में भी यह स्पष्ट था कि अंतर्राष्ट्रीय अंक भारतीय अंकों का ही एक नया संस्करण है।

कुछ सदस्यों ने रोमन लिपि के पक्ष में प्रस्ताव रखा, लेकिन देवनागरी को ही अधिकतर सदस्यों ने स्वीकार किया। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने के लिए काका कालेलकर, मैथिलीशरण गुप्त, रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, सेठ गोविंददास और राजेन्द्र सिंह जैसे लोगों ने बहुत प्रयास किए। जिसके चलते इन्होंने दक्षिण भारत की कई यात्राएं भी की।

भारत में भले ही अंग्रेज़ी बोलना सम्मान की बात मानी जाती हो, पर विश्व के बहुसंख्यक देशों में अंग्रेज़ी का इतना महत्त्व नहीं है। हिंदी बोलने में हिचक का एकमात्र कारण पूर्व प्राथमिक शिक्षा के समय अंग्रेज़ी माध्यम का चयन करना है। आज भी भारत में अधिकतर लोग बच्चों का दाख़िला ऐसे अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूलों में करवाना चाहते हैं। जबकि मनोवैज्ञानिकों के अनुसार शिशु सर्वाधिक आसानी से अपनी मातृभाषा को ही ग्रहण करता है और मातृभाषा में किसी भी बात को भली-भांति समझ सकता है। अंग्रेज़ी भारतीयों की मातृभाषा नहीं है। अत: भारत में बच्चों की शिक्षा का सर्वाधिक उपयुक्त माध्यम हिंदी ही है।
 

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देश की मौजूदा शिक्षा पद्धति में बालकों को पूर्व प्राथमिक स्कूल में ही अंग्रेज़ी के गीत रटाए जाते हैं। - फोटो : अमर उजाला

देश की मौजूदा शिक्षा पद्धति में बालकों को पूर्व प्राथमिक स्कूल में ही अंग्रेज़ी के गीत रटाए जाते हैं। घर में बालक बिना अर्थ जाने ही अतिथियों को अंग्रेज़ी में कविता सुना दे तो माता-पिता का मस्तक गर्व से ऊंचा हो जाता है। कई अंग्रेज़ी भाषी विद्यालयों में तो किसी विद्यार्थी के हिंदी बोलने पर ही मनाही होती है।

हिंदी के लिए कई जगह अपमानजनक वाक्य लिखकर तख़्ती लगा दी जाती है। अतः बच्चों को अंग्रेज़ी समझने की बजाय रटना पड़ता है, जो अवैज्ञानिक है। ऐसे अधिकांश बच्चे उच्च शिक्षा में माध्यम बदलते हैं और भाषिक कमज़ोरी के कारण ख़ुद को समुचित तरीक़े से अभिव्यक्त नहीं कर पाते हैं और पिछड़ जाते हैं। इस मानसिकता में शिक्षित बच्चा माध्यमिक और उच्च्तर माध्यमिक में मजबूरी में हिंदी पढ़ता है, फिर विषयों का चुनाव कर लेने पर व्यावसायिक शिक्षा का दबाव हिंदी छुड़वा ही देता है।

हिंदी की शब्द सामर्थ्य पर अमूमन अकारण तथा जानकारी के अभाव में प्रश्न चिह्न लगाया जाता है। वैज्ञानिक विषयों, प्रक्रियाओं, नियमों और घटनाओं की अभिव्यक्ति हिंदी में कठिन मानी जाती है, किंतु वास्तव में ऐसा नहीं है। हिंदी की शब्द संपदा अपार है। हिंदी में से लगातार कई शब्द बाहर तो कई शब्द प्रविष्ट होते रहे हैं। हिंदी के अनेक रूप आंचलिक या स्थानीय भाषाओं और बोलियों के रूप में प्रचलित हैं। इस कारण भाषिक नियमों, क्रिया-कारक के रूपों, कहीं-कहीं शब्दों के अर्थों में अंतर स्वाभाविक है, किंतु हिंदी को वैज्ञानिक विषयों की अभिव्यक्ति में सक्षम विश्व भाषा बनाने के लिए इस अंतर को पाटकर क्रमशः मानक रूप लेना होगा। अनेक क्षेत्रों में हिंदी की मानक शब्दावली है, जहां नहीं है, वहां क्रमशः आकार ले रही है।

जन सामान्य भाषा के जिस देशज रूप का प्रयोग करता है, वह कही गई बात का आशय संप्रेषित करता है, किंतु वह पूरी तरह शुद्ध नहीं होता। ज्ञान-विज्ञान में भाषा का उपयोग तभी संभव है, जब शब्द से एक सुनिश्चित अर्थ निकले। इस दिशा में हिंदी का प्रयोग न होने को दो कारण हैं। पहला, इच्छा शक्ति की कमी और दूसरा, भाषिक एवं शाब्दिक नियमों और उनके अर्थ की स्पष्टता न होना है। हिंदी को समक्ष बनाने में सबसे बड़ी समस्या विश्व की अन्य भाषाओं के साहित्य को आत्मसात कर हिंदी में अभिव्यक्त करने तथा ज्ञान-विज्ञान की हर शाखा की विषयवस्तु को हिंदी में अभिव्यक्त करने की है। हिंदी शब्दकोष का पुनर्निर्माण ज़रूरी है। इसमें पारंपरिक शब्दों के साथ विविध बोलियों, भारतीय भाषाओं, विदेशी भाषाओं, विविध विषयों और विज्ञान की शाखाओं के परिभाषिक शब्दों को जोड़ा जाना बहुत ज़रूरी है।

तकनीकी विषयों और गतिविधियों को हिंदी भाषा के माध्यम से संचालित करने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि उनकी पहुंच असंख्य लोगों तक हो सकेगी। हिंदी में तकनीकी शब्दों के विशिष्ट अर्थ सुनिश्चित करने की भी ज़रूरत है। तकनीकी विषयों के रचनाकारों को हिंदी का प्रामाणिक शब्दकोश और व्याकरण की पुस्तकें अपने साथ रखकर जब और जैसे समय मिले, पढ़ने की आदत डालनी होगी। हिंदी की शुद्धता से आशय उर्दू, अंग्रेज़ी यानी किसी भाषा, बोली के शब्दों का बहिष्कार नहीं, अपितु भाषा के संस्कार, प्रवृत्ति, रवानगी, प्रवाह तथा अर्थवत्ता को बनाए रखना है। चूंकि इनके बिना कोई भाषा जीवंत नहीं होती।

 

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हिंदी के प्रचार-प्रसार में हिंदी सिनेमा की सबसे ज़्यादा भूमिका रही है। - फोटो : अमर उजाला

हिंदी भाषा की चर्चा बॉलीवुड यानी हिंदी सिनेमा की चर्चा किए बिना अधूरी मानी जाएगी। हिंदी के प्रचार-प्रसार में हिंदी सिनेमा की सबसे ज़्यादा भूमिका रही है। हिंदी फ़िल्में शुरू से देश दुनिया में हिंदी का अलख जगाती रही हैं। यही वजह है कि जितने लोकप्रिय हिंदी फ़िल्मों में काम करने वाले अभिनेता-अभिनेत्री हुए, उतने लोगप्रिय दूसरी भाषा के कलाकार नहीं हो पाए। आजकल तमाम चैनलों पर प्रसारित हिंदी सीरियल हिंदी का वैश्वीकरण कर रहे हैं। हिंदी की चर्चा पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी के ज़िक्र के बिना पूरी हो ही नहीं सकती, क्योंकि दुनिया में हिंदी का परिचय बतौर विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने ही कराया था।

जहां भारतीय नेता विदेशों में हिंदी बोलने में संकोच करते थे, वहीं अजल ने चार अक्टूबर 1977 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिंदी में भाषण दिया। उन्होंने इसे अपने जीवन का सबसे सुखद क्षण बताया था। यहां, यह कहने में कोई गुरेज नहीं कि सभी भारतीय भाषाओं की हिंदी बड़ी बहन है। बड़ी बहन अपनी सभी छोटी बहनों का ख़याल रखती है।

 जब से नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हुए हैं, वह विदेश में अधिकतर हिंदी ही बोलते हैं। यहां तक कि हाल ही में रूस में जी-7 देशों की बैठक में विशेष रूप से आंमत्रित किए जाने पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप ने मजाकिया लहजे में कहा कि नरेंद्र मोदी अच्छी अंग्रेज़ी बोल लेते हैं, लेकिन उनकी बात मैं समझ न पाऊं इसीलिए कश्मीर मुद्दे पर हिंदी बोल रहे हैं। इसके बाद दोनों के हाथ मिलाने का दृश्य पूरी दुनिया में वाइरल हो गया था। कहने का मतलब प्रधानमंत्री हिंदी को विश्वभाषा बनाने पर ज़ोर दे रहे हैं। ऐसे में यह उम्मीद की जानी चाहिए कि हिंदी को अपने देश में आधिकारिक रूप से वही सम्मान मिल जाएगा जो चीनी को चीन में, जापानी को जापान में मिला हुआ है। इतिहास गवाह है कि एक संपर्क भाषा के रूप में हिंदी का विकास अपने आप हुआ है और भविष्य में भी इसका विकास होता रहेगा।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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