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हिंदी दिवस विशेष: हिंदी में बहिष्कार का नहीं, समन्वय का भाव है

Bhawna Masiwalभावना मासीवाल Updated Sat, 14 Sep 2019 03:02 PM IST
हिंदी में बहिष्कार का भाव नहीं है बल्कि वह तो सब को साथ लेकर समन्वय करती हुई आगे बढ़ती है।
हिंदी में बहिष्कार का भाव नहीं है बल्कि वह तो सब को साथ लेकर समन्वय करती हुई आगे बढ़ती है। - फोटो : अमर उजाला
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भाषा और हिंदी का सवाल आज का नहीं है। आज़ादी से पूर्व ब्रिटिश राजसत्ता के दौरान भी यह प्रश्न मौजूद था । उस समय देश के उत्थान व अंग्रेजी हुकूमत से मुक्ति के लिए खड़ी बोली हिंदी को केंद्रीय भाषा के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया गया । भारतेंदु हरिश्चंद्र ने लिखा भी है-
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“निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल
 बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सुल”


सबको साथ लेकर समन्वय करती आगे बढ़ती है हिंदी
भारत एक बहुभाषी देश है । इस कारण एक ऐसी भाषा की मांग बढ़ी जिसके माध्यम से आमजन के मध्य सम्पर्क साधा जा सके। यह काम हिंदी ने किया। हिंदी, उर्दू और संस्कृत की करीबी है। इसके साथ ही यह दक्षिण भारत की क्षेत्रीय बोलियों व उनके शब्द भण्डार को भी अपने शब्दकोष में शामिल करती है। हिंदी में बहिष्कार का भाव नहीं है बल्कि वह तो सब को साथ लेकर समन्वय करती हुई आगे बढ़ती है।

इतना ही नहीं वह फ़ारसी, तुर्की, अंग्रेजी, पुर्तगाली और अन्य भाषाओं के शब्दों को भी खुद में समाहित करती आगे बढ़ती है । इसी कारण हिंदी भारत की राष्ट्र भाषा के रूप में स्थान तो पाती है, लेकिन आधिकारिक तौर पर अभी तक हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं मिल पाया। दरअसल, हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देने का जो संघर्ष आजादी के पूर्व किया गया। वह संघर्ष अब समाप्त हो गया है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी 1918 में आयोजित हिंदी साहित्य सम्मेलन में हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए कहा था। देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू भी हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के समर्थन में थे। लेकिन लंबे विचार-विमर्श के बाद 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा में हिंदी को राज भाषा बनाने का फैसला लिया गया। 

 

 
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