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हिंदी दिवस विशेष: स्वाधीन भारत में हिंदी की दशा और दिशा

Abhishek gupta अभिषेक कुमार गुप्ता
Updated Sat, 14 Sep 2019 03:02 PM IST
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Hindi Diwas 2019: Special Condition of Hindi in independent India
हर साल 14 सितंबर को सरकारी विभागों में राजभाषा हिंदी के प्रचार-प्रसार के प्रति संकल्प को दुहराते हुए हिंदी दिवस समारोह का आयोजन किया जाता है।

हर साल 14 सितंबर को सरकारी विभागों में राजभाषा हिंदी के प्रचार-प्रसार के प्रति संकल्प को दुहराते हुए हिंदी दिवस समारोह का आयोजन किया जाता है। जितना इस समारोह और उत्सव में भविष्य के लिए संकल्प का महत्व है उतना ही इसका भी महत्व है कि हिंदी के प्रचार-प्रसार और सरकारी काम-काज में हिंदी के अधिकाधिक प्रोत्साहन हेतु किए गए प्रयासों का सिंहावलोकन किया जाय ताकि जो भी अवरोध परिलक्षित हुए हैं उन्हें दूर करने की दिशा में एक सार्थक रणनीतिक पहल हो सके। 

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ऐसा नहीं है कि अवरोध और विरोध पहले नहीं थे। संविधान सभा में भाषा के मुद्दे पर हुई बहस को यदि देखा जाए तो यह सहज ही समझा जा सकता है कि जब हिंदी को सरकार कामकाज की अथवा शासन की भाषा के रूप में अंगीकार करने का प्रस्ताव प्रस्तुत हुआ तो किस प्रकार इसका विरोध हुआ।
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रोचक तथ्य यह है कि जो लोग अपने ही देश के लगभग 60 से 65 प्रतिशत आबादी द्वारा बोली जाने वाली भाषा का विरोध कर रहे थे वहीं लोग अंग्रेजी को, जो एक विदेशी भाषा थी उसको स्वीकार करने के लिए सहर्ष तत्पर थे। हिंदी विरोध के साथ दक्षिण भारत के राज्यों में विशेष रूप से तमिलनाडु में द्रविण आन्दोलन इस तथ्य का परिचायक है कि भाषायी विरोध के नाम पर एक ऐसे आंदोलन केा जन्म दिया गया जो अपने ही देश की एक समृद्ध तथा प्रसिद्ध भाषा के प्रति नफरत के भाव से भरा था।
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आखिर मूल प्रश्न यह भी है कि हिंदी ही शासन की भाषा क्यों हो?

Hindi Diwas 2019: Special Condition of Hindi in independent India
अंग्रेजी आज भी सरकारी कामकाज में मौलिक भाषा है। जबकि हिंदी सहचरी है और अनुवाद की भाषा है। - फोटो : अमर उजाला

शासन की भाषा कुछ भी हो इससे क्या बहुत फर्क पड़ता है ? इस प्रश्न का उत्तर भी संविधान सभा के बहस में ही मिलता है। जिस भाषा को आम जन सहजता से समझ सके, अपने को व्यक्त कर सके और जो बोधगम्य हो, वही शासन की भाषा होनी चाहिए। सरकार का कामकाज उसी भाषा में होना चाहिए, जिस भाषा को समझने में कोई अवरोध न हो।

जिले के कलेक्टर , एसपी या केाई अन्य अधिकारी जिसे लोगों को समझाना है, यदि ऐसी भाषा में बात करे जो लोग समझ ही न पाए तो आखिर वो अपनी बात आमजन तक कैसे पहुंचा सकता है। लोग कैसे समझ पाएंगे कि उनके लिए सरकार की क्या योजनाएं हैं और उन योजनाओं का लाभ उन्हें कैसे प्राप्त होगा? क्या इस देश में मात्र 2.5 से 3 प्रतिशत अंग्रेजी की समझ रखने वाले लोग, देश में कानून का शासन चला पाएंगे ? यह संभव नहीं है। 

जो भी देश विदेशी गुलामी से आजाद हुआ उसने अपने स्वाधीन देश की शासन की भाषा वो नहीं रखी जो परत्रंता के दौरान थी। आखिरकार वह गुलामी का प्रतीक है। प्रतीकात्मक ही सही क्या इसे बदलना जरूरी नहीं हैं ? संविधान सभा में मुखर विरोध के बावजूद हिंदी को शासकीय भाषा का दर्जा तो मिला लेकिन अंग्रेजी को सहचरी भाषा के पद पर कुछ दिनों के लिए बनाए रखना भी स्वीकार करना पड़ा।

लेकिन प्रश्न यह उठता है कि क्या आज के समय में अंग्रेजी सहचरी है या शासन की मूल भाषा है? हिंदी सरकारी कार्यालयों में अनुवाद की भाषा बनकर रख गई है। आजादी के सात दशक के उपरांत भी हिंदी को इसका गौरव नहीं मिल पाया तो उसके पीछे यही भावना काम कर रही है कि हिंदी में काम करना संभव नहीं है। शासन चलाना संभव नहीं है, कानून की भाषा हिंदी नहीं हो सकती। इसलिए अंग्रेजी आज भी सरकारी कामकाज में मौलिक भाषा है। जबकि हिंदी सहचरी है और अनुवाद की भाषा है।

 

Hindi Diwas 2019: Special Condition of Hindi in independent India
ऐसा नहीं है कि हिंदी को मात्र राजभाषा का दर्जा प्रदान कर रस्म अदायगी भर की गई।

ऐसा नहीं है कि हिंदी को मात्र राजभाषा का दर्जा प्रदान कर रस्म अदायगी भर की गई। इसके लिए सरकारी स्तर पर ठोस प्रयास हुए और गंभीर कोशिश की गई। संसदीय राजभाषा समिति इसका ज्वलंत प्रमाण है। इसकी तीनों उप समितियां देश भर में फैले केंद्र सरकार के प्रशासनाधीन समस्त कार्यालयों में राजभाषा हिंदी के प्रगामी प्रयोग की स्थिति का जायजा लेने के लिए निरीक्षण करती रहती है।

संसदीय राजभाषा समिति की सिफारिशों पर राष्ट्रपति जी के आदेश जारी हुए हैं ताकि हिंदी को सरकारी काम काज में प्रतिष्ठित स्थान दिलाया जा सके। राजभाषा अधिनियम 1963 में हिंदी के प्रयोग को बढावा देने के लिए विस्तृत निर्देश दिए गए हैं तथा इसके अधीन नियम 3 की उप धारा-3 में यह वर्णित है कि जो भी कागजात संसद में प्रस्तुत किए जाएंगे वे द्विभाषी ही होंगे। यह एक गंभीर प्रयास था ताकि उच्चतर स्तर पर हिंदी के प्रयोग को बाध्यकारी बनाया जा सके। 

एक दूसरी भी समस्या है जो ज्यादा ही बड़ी दिखती है। चूंकि हिंदी में मौलिक टिप्पणी या प्रारूपण नहीं होता है अतः अनुवाद के दौरान भाषा की सपाटता और निरसता भी झलकती है। यह भी कहना गलत नहीं होगा कि चूंकि मौलिक विचार अंग्रेजी में व्यक्त किया गया होता है, अतः अनुवाद के दौरान वह मौलिकता का भाव नहीं रहता है। शब्द चयन भी कठिन होता है। शब्दकोष में जो अंग्रेजी शब्दों के हिंदी पर्याय उपलब्ध होते हैं वे सहज बोधगम्य नहीं होते।

वे भाव को व्यक्त नहीं करते ओर अनुवाद के दौरान अनुवादको के पास उतनी आजादी नहीं होती है कि वह मूल पाठ से इतर होकर भाषायी दृष्टि से सहज बोधगम्य बनाने हेतु प्रयास कर सकें। एक प्रयास यह भी होना चाहिए कानून की भाषा सरल हो। आखिर कानून बनता किसके लिए है? आम जनता के लिए संसद कानून बनाती है तो फिर आम जनता जिस भाषा में समझ सकती है उसी में कानून बनाया जाए तो यह सार्थक प्रयास होगा। 

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राजभाषा नियम 1976 में जितने भी लक्ष्य राजभाषा विभाग ने केन्द्र सरकार के कार्यालयों के लिए निर्धारित किए हैं - फोटो : अमर उजाला

राजभाषा नियम 1976 में जितने भी लक्ष्य राजभाषा विभाग ने केन्द्र सरकार के कार्यालयों के लिए निर्धारित किए हैं वे स्वप्रेरणा के  अभाव में पूर्णरूपेण लागू नहीं हो पा रहे हैं। सभी मंत्रालयों में मंत्री के स्तर पर हिन्दी सलाहकार समितियों का गठन इस प्रयोजन से किया गया है कि वह राजभाषा हिन्दी के प्रगामी प्रयोग को सुनिश्चित करने के लिए सुझाव दे। समितियां तो बनी हैं लेकिन प्रायः यह देखा जाता है कि इनकी नियमित बैठकें आयेाजित नहीं की जाती हैं तथा मंत्रालय और विभाग इनकी सिफारिशों पर तत्परता से अमल भी नहीं करते। शीर्ष स्तर पर गठित इस समिति का जो फायदा मिलना चाहिए था वह नहीं मिल पा रहा है। क्येांकि यह समिति और इसकी सिफारिशें कागजों में सिमट कर रह गई हैं। इस समिति को यह अधिकार मिलना चाहिए कि वह संबंधित मंत्रालयों के प्रशासनाधीन उपक्रमों के कार्यालयों में राजभाषा हिन्दी की प्रगति की सभीक्षा करे तथा जहां कहीं खामियां नजर आए उसको दुरूस्त करने के संबंध में सार्थक प्रयास करने का सुझाव दे। समितियों का गठन कर देने से ही समस्याएं नहीं सुलझ सकती हैं। उन समितियों की क्षमता का भी सम्यक उपयोग होना चाहिए। 

भारत सरकार का राजभाषा विभाग देश के विभिन्न भागों में अवस्थित केन्द्र सरकार के कार्यालयों के लिए कार्यालयीन काम हिन्दी में करने हेतु वर्ष दर वर्ष लक्ष्य निर्धारित करता रहता है। हर वर्ष इस लक्ष्य को ऊंचा कर दिया जाता है। लेकिन यह भी समीक्षा करना आवश्यक है कि पूर्व में जो लक्ष्य इन कार्यालयों के लिए निर्धारित किए गए थे उसे उन कार्यालयों ने हासिल किए या नहीं। निर्धारित लक्ष्यों को हासिल करने में कार्यालयों को क्षमतासम्पन्न बनाना भी आवश्यक है। यह देखना भी जरूरी है कि सभी कर्मचारी हिन्दी का कार्यसाधक ज्ञान रखते हैं अथवा नहीं। अधिकारियों/कर्मचारियों को अपने कार्य में निपुणता प्राप्त करने के लिए हर संभव प्रयास किए जाने चाहिए ताकि समस्त अधिकारी/कर्मचारी अपना कार्यालयीन कार्य मौलिक रूप से हिन्दी में ही करें और हिन्दी अनुवाद पर निर्भर न रहें। यह सरल नहीं है क्योंकि जब पढ़ाई-लिखाई ही अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में होगी तो हिन्दी में काम करने में सुगमता और सरलता कहां से आएगी। पठन-पाठन में भी हिन्दी को अनिवार्यतः शामिल करना पड़ेगा तभी हिन्दी में कार्य की सहजता आ पाएगी। 

प्रयास हो कि हिन्दी अनुवाद की भाषा न रहे, प्रयास यह भी हो कि हिन्दी को सरकारी कार्यालयीन कार्यो में प्रमुखता दी जाए, प्रयास यह भी हो कि हिन्दी में काम करने वाले अधिकारियों/कर्मचारियों को गौरव का बोध हो और सबसे महत्वपूर्ण यह है कि प्रयास यह भी हो कि हिन्दी को सरकारी काम में गरिमामयी स्थिति मिले। जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक हिन्दी, अनुवाद तक ही सीमित रहेगी। तब तक हर वर्ष सरकारी कार्यालयों में 14 सितम्बर को मनाया जाने वाला हिन्दी दिवस मात्र रस्म अदायगी भर ही रहेगा और हिन्दी को सरकारी कामकाज में प्रमुखता और प्रतिष्ठा हासिल नहीं हो सकेगी।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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