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हिंदी दिवस विशेष: रोमन में हिंदी लिखने का चलन बढ़ा, लोग भूल रहे हैं देवनागरी लिपि

Thu, 14 Sep 2023 10:42 AM IST
Bhawna Masiwal भावना मासीवाल
Updated Thu, 14 Sep 2023 10:42 AM IST
सार

भाषा कोई भी कठिन व सरल नहीं होती है। यह हमारी मानसिकता है जिसने इसे दो खेमों में विभाजित किया है। इसी ने अंग्रेजी को उपयोगी व सरल बताया और हिंदी को दुरुहता की श्रेणी में डाल दिया।

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Hindi Diwas 2023 Roman Hindi Writing In Trend Youth Avoided Devanagari Lipi
आज हिंदी वैश्विक बाजार की भाषा बन कर उभर रही है। मगर यह भाषा ‘हिंग्लिश’ है। - फोटो : istock

विस्तार

भाषा को मजबूत बनाने में लिपि का महत्वपूर्ण योगदान होता है। आज हिंदी का अपना बाजार है। यह बाजार सिनेमा, विज्ञापन और प्रौद्योगिकी का है। किसी भी भाषा का बाजार पर अपनी मजबूत पकड़ बनाना सरल नहीं होता है। भाषा का आर्थिक, सामाजिक व भाषिक व्यवहार ही उसे बाजार की भाषा बनाता है। आज हिंदी वैश्विक बाजार की भाषा बन कर उभर रही है। मगर यह भाषा ‘हिंग्लिश’ है। बाजार की इस चकाचौंध में हिंदी का व्यवहारिक पक्ष तो मजबूत हुआ है लेकिन उसका भाषिक पक्ष कमजोर हुआ है। आज हिंदी को बोलने और समझने वाले लोगों की सर्वाधिक संख्या है। यही कारण भी है कि विविधताओं से भरे हमारे देश में जहां हर चार कोस में बोली-भाषा का स्वरूप बदल जाता है, वहां बहुत सी भाषा और बोलियों के मध्य ‘हिंदी’ ने अपना स्थान बनाया है। वह संप्रेषण और रोजगार की भाषा बनी है। हिंदी की इस मजबूत स्थिति के साथ उसका कमजोर पक्ष भी उभरा है। यह पक्ष हिंदी की लिपि का है। 

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आज जब हम बाजार की चकाचौंध में चमकती हिंदी का गुणगान करते हैं तो उसके व्यावहारिक पक्ष को तो देखते हैं लेकिन भाषिक पक्ष को अनदेखा कर देते हैं। बाजार, सिनेमा और विज्ञापन में हिंदी और उसकी लिपि के प्रति भेदभाव की मानसिकता को नहीं देख पा रहे हैं। हिंदी की देवनागरी लिपि के प्रयोग की अपेक्षा रोमन लिपि में लिखने का चलन बड़ा है। यह चलन हिंदी के भाषिक पक्ष को कमजोर बनाता है। 

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अक्सर प्रश्न किया जाता है कि ‘हिंदी’ चूँकि संस्कृत के अधिक निकट है इस कारण भाषिक व्यवहार में कठिन शब्दों के प्रयोग के कारण युवाओं को उसे सीखने में समस्या आ रही है। दूसरा सोशल मीडिया से लेकर कंप्यूटर तक की भाषा अंग्रेजी है। इसका कारण भाषा की संप्रेषणीयता है। वहीं अंग्रेजी के प्रति इस तरह की धारणा सुनने को नहीं मिलती है। चूँकि वह भाषा हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में अधिक सक्षम है तो हम हिंदी भाषी होने के बावजूद अन्य भाषा को सीखकर उस पर पूर्णत: अधिकार प्राप्त कर लेते हैं और वह हमारे विद्यालयी पाठ्यक्रम में अनिवार्य भाषा के रूप में पढ़ी-पढाई जा रही है। 

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वहीं हम ‘हिंदी’ के प्रति संस्कृत से उसकी निकटता के कारण कठिनाई का आरोप-प्रत्यारोप लगाते रहे हैं। भाषा कोई भी कठिन व सरल नहीं होती है। यह हमारी मानसिकता है जिसने इसे दो खेमों में विभाजित किया है। इसी ने अंग्रेजी को उपयोगी व सरल बताया और हिंदी को दुरुहता की श्रेणी में डाल दिया। देवनागरी लिपि की ही बात करें तो यह जितनी सरल और वैज्ञानिक सम्मत है, वह वैज्ञानिकता अन्य भाषाओं की लिपियों में नहीं मिलती है। हिंदी की देवनागरी लिपि में एक ध्वनि के लिए एक ही चिन्ह का प्रयोग होता है जो रोमन लिपि में नहीं है। 


यहां एक ही ध्वनि ‘क’ के लिए ‘सी’,‘के’,‘क्यू’ का प्रयोग होता है। इस कारण अंग्रेजी भाषा की रोमन लिपि को सीखते समय उसके उच्चारण क्रम में एक ही वर्ण के प्रयोग के साथ शब्दों के अलग-अलग उच्चारण क्रम को भी सीखना पड़ता है। लेकिन अंग्रेजी भाषा के प्रति प्रेम व सीखने की ललक उस लिपि के प्रत्येक पक्ष को सीखने में सहायक बनता है। 


मेरा संदर्भ यहाँ किसी भाषा को श्रेष्ठ व कमत्तर बताना नहीं है बल्कि हिंदी भाषा के प्रति हमारी संकुचित दृष्टि को जानना है। आज हिंदी की देवनागरी लिपि की उपेक्षा हो रही है और रोमन लिपि में हिंदी लिखने का चलन बढ़ा है। हिंदी सिनेमा, टी.वी सीरियल्स से लेकर विज्ञापन तक में काम करने वाले लोगो में यदि सर्वे करवाया जाए तो बहुत कम लोग मिलेंगे जो पढ़ते व लिखते समय हिंदी की देवनागरी लिपि का प्रयोग करते हैं।

Hindi Diwas 2023 Roman Hindi Writing In Trend Youth Avoided Devanagari Lipi
हिंदी दिवस 2023 - फोटो : amar ujala

भाषा के विकास में प्रयोगात्मक पक्ष अनिवार्य

भाषा के विकास में केवल उसका व्यवहारिक पक्ष ही कारगर नहीं होता है बल्कि उसका भाषिक प्रयोगात्मक पक्ष भी अनिवार्य होता है। आप एक को लेकर दूसरे को छोड़ नहीं सकते हैं। हिंदी के भाषिक प्रयोग के लिए देवनागरी लिपि की अपेक्षा रोमन लिपि के बढ़ते चलन ने एक वर्ग को भारतीय भाषाओं के साहित्य से दूर कर दिया है। 

आज भारतीय साहित्य हिंदी की अपेक्षा अंग्रेजी भाषा में अधिक पढ़ा जा रहा है। कुछ भारतीय दिमाग में अंग्रेजी सोच रखने वाले लोग हिंदी को देवनागरी लिपि में लिखने की अपेक्षा रोमन लिपि में लिखने की वक़ालत करते रहे हैं। लिपि जो भाषा की प्राणतत्व है जो भाषा को स्थायीत्व व संग्रहणीय बनाती है, यह कैसे हो सकता है कि आप उसके एक पक्ष को अपनाए और दूसरे को छोड़ दे। आज हिंदी भाषा की मूल समस्या उसके व्यवहारिक प्रयोग की नहीं है। बावजूद इसके हिंदी की सबसे बड़ी समस्या उसके लिपिगत प्रयोग से है। किसी भाषा की मूल लिपि के प्रयोग की अपेक्षा सरलता के क्रम में रोमन लिपि का बढ़ता प्रचलन किसी भी भाषा के लिए हितकर नहीं है।

भाषा ज्ञान के रास्ते खोलती है तो वहीं लिपि उस ज्ञान को स्थायी व संग्रहणीय बनाती है। आज के दौर में कठिनता से सरलता के प्रवाह में देवनागरी लिपि का स्थान रोमन लिपि ले रही है। सरलता के इस प्रवाह में हम भाषा के मूल व्यवहार व उसकी संरचना को अनदेखा कर देते हैं। हमारा समाज बहुभाषी है। हमारी अपनी ही बहुत सी बोली, भाषाएँ और लिपियां है। इसके बावजूद हमारे देश में देवनागरी लिपि की अपेक्षा रोमन लिपि का प्रयोग सर्वाधिक हो रहा है। यहाँ तक की हिंदी भाषा का भाषिक व्यवहार भी देवनागरी लिपि की अपेक्षा रोमन लिपि में किये जाने पर ज़ोर दिया जाने लगा है। 

एक ओर हम भारतीय भाषाओं, बोलियों व लिपियों को पुन: जीवंत बनाने व उनके शैक्षिक व साहित्यिक योगदान को मजबूत बनाने का प्रयास कर रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ हमारी राजभाषा व राष्ट्रभाषा हिंदी को देवनागरी लिपि में लिखे जाने की अपेक्षा रोमन लिपि में लिखे जाने की बहस चल रही है। ऐसे में हमारी बोलियाँ व भाषाएं अपना अस्तित्व ही खो देगी क्योंकि वह लिपि ही है जो किसी भाषा को स्थायी, सजीव व संग्रहणीय बनाती है।

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं।  आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।  अपने विचार हमें blog@auw। co। in पर भेज सकते हैं।  लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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