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हिंदी दिवस और दूसरी भाषाओं का संकट: धीरे-धीरे खत्म हो रही हैं कई बोलियां और भाषाएं

Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Tue, 14 Sep 2021 03:08 PM IST

सार

यूनेस्कों की एक रिपोर्ट के अनुसार सन् 2000 तक विश्व में लगभग 7000 भाषाएं थीं, जिनमें से लगभग 2500 भाषाएं संकटापन्न थीं।

ऐसा आशंका है कि सन् 2050 तक लगभग 90 प्रतिशत भाषाएं लुप्त हो जाएंगी। भारत में 1961 की जनगणना में 1652 भाषाएं दर्ज हुई थीं। लेकिन जब 1971 की जनगणना में 10 हजार से कम लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषाओं को दर्ज न करने का नियम बना तो उस गणना में देश में केवल 108 भाषाएं ही दर्ज पाईं।
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भाषाओं का संकट- छोटी मछलियों को निगलती बड़ी मछलियां
भाषाओं का संकट- छोटी मछलियों को निगलती बड़ी मछलियां - फोटो : Social media
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विस्तार

साहित्य समाज का दर्पण तो होता ही है। किसी भी समाज के स्थानीय साहित्य से ही हमें उसके अतीत और वर्तमान की जीवन शैली, उसके नैतिक मूल्यों, उसके स्वभाव, उसकी आस्था और रहन-सहन का पता चलता है। लेकिन साहित्य के श्रृजन के लिए भी शब्दों की आवश्यकता होती है और वे शब्द बोली या भाषा से ही मिलते हैं। यही शब्द साहित्य का सृजन करने के साथ ही उसे सजाने के लिए अलंकार बनते हैं और वही शब्द किसी भी साहित्य में रस भी भरते हैं।
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भाषा या लिपि के शब्दों के ज्ञान से ही हम साहित्य विशेष को पढ़कर उसका रसास्वादन करते हैं, मनोविनोद करते हैं और ज्ञानार्जन करते हैं। अगर बोली या भाषा नहीं रहेगी तो आदमी गूंगा ही रह जाएगा। जाहिर है कि जो व्यक्ति जितनी भाषाएं या बोलियां जानेगा, उसके ज्ञान के भण्डार की श्रीवृद्धि के लिए उतने ही मार्ग खुलेंगे। लेकिन जब भाषा या बोली ही मर जाएगी तो उस साहित्य को न तो कोई पढ़ पाएगा और ना ही कोई समझ पाएगा। इस हाल में भाषा के साथ ही साहित्य विशेष भी मर जाएगा। 


रुतबे वाली भाषाओं से असली खतरा

इस वैश्विक युग में समय के साथ कदमताल करने के लिए अधिक से अधिक बोली-भाषाओं का ज्ञान जितना जरूरी है उतना ही जरूरी अपनी भाषा का उन्नयन और श्रीवृद्धि करना भी है। लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है। हम अपनी भाषा और खास कर बोलियों के प्रति हीनभावना से ग्रसित हैं।

इसी मानसिकता के चलते हमारे देश में अंग्रेजी के आगे हमारी हिन्दी और हिन्दी के आगे हमारी बोलियां अपना सम्मान और स्वाभिमान खोती जा रही हैं। अंग्रेजी तो हुकूमत चलाने वाले हाकिमों और बड़े लोगों की भाषा हो गई है और इस देश की अपनी हिन्दी आम शासित लोगों की भाषा बन कर रह गई है। देश के सुप्रीमकोर्ट और हाइकोर्टों में अंग्रेजी चलती है।

भारत सरकार का कामकाज भी मुख्यतः अंग्रेजी में ही चलता है। बड़े नौकरशाह भी अंग्रेजी में ही बतियाते हैं। और अगर आपको किसी पर रौब गालिब करना होता है तो आप अगर अंग्रेजी जानते हैं तो अंग्रेजी में ही किसी अफसर को हड़काते हैं। यही स्थिति निचले स्तर पर हिन्दी या क्षेत्रीय भाषाओं की है। कुल मिलाकर देखा जाए तो बड़ी मछली की तरह बड़ी भाषाएं कम लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषाओं और बोलियों को निगल रही है। बोली भाषाओं का यह संकट स्थानिक न हो कर वैश्विक ही है।

90 फीसदी भाषाएं विलुप्ति की कगार पर

यूनेस्कों की एक रिपोर्ट के अनुसार सन् 2000 तक विश्व में लगभग 7000 भाषाएं थीं, जिनमें से लगभग 2500 भाषाएं संकटापन्न थीं। ऐसा आशंका है कि सन् 2050 तक लगभग 90 प्रतिशत भाषाएं लुप्त हो जाएंगी। भारत में 1961 की जनगणना में 1652 भाषाएं दर्ज हुई थीं।


लेकिन जब 1971 की जनगणना में 10 हजार से कम लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषाओं को दर्ज न करने का नियम बना तो उस गणना में देश में केवल 108 भाषाएं ही दर्ज पाईं। वर्ष 2011 की जनगणना में 10 हजार से अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली 121 भाषाएं ही दर्ज हुई है, जिनमें से 22 भाषाएं संविधान की आठवीं अनुसूची के अन्तर्गत दर्ज है जिनका प्रयोग 96.71 प्रतिशत आबादी ही करती है।

दूसरी ओर सन् 2010 से लेकर 2012 तक कराए गए ‘‘पीपुल्स लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया’’ ने देश में कुल 780 भाषाओं का अस्तित्व स्वीकार किया है। इस सर्वे में 10 हजार प्रयोगकर्ताओं का मानक नहीं है। इसलिए इसकी तुलना 1061 की जनगणना के भाषा संबंधी आंकड़ों से की जा सकती है। इस तरह देखा जाए तो 1961 से लेकर 2012 तक 51 वर्षों के अन्तराल में हमारी 872 भाषाएं खो गई हैं। जब ये हाल भाषाओं का है तो फिर बोलियों की कल्पना की जा सकती है। 

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