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कोरोना संकट और शिक्षा: भविष्य में शिक्षा का भी इंजन बनेगा इंटरनेट, 'स्वयं' से साकार होगा डिजिटल एजुकेशन का सपना

सार

  • 21 वीं सदी में इंटरनेट ने अवसरंचना विकास में नया आयाम जोड़ दिया है।
  • चुनौतियों को नीतिगत दूरदर्शिता और नवाचार से हल करना वर्तमान शासन की विशेषता है।
  • हेफा के जरिए वर्तमान सरकार की नीतिगत दूरदर्शिता को समझा जा सकता है।
  • अध्यापकों को प्रशिक्षित करने के लिए लांच किया गया 'पंडित मदन मोहन मालवीय नेशनल मिशन ऑन टीचर्स एंड ट्रेनिंग' एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम है।

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भविष्य में इंटरनेट शिक्षा का भी इंजन बन सकता है- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Pexels

विस्तार

विकास के अन्य क्षेत्रों की भांति भारत में उच्च शिक्षा के समक्ष भी अवसंरचना एक प्रमुख चुनौती रही है। अवसंरचना के अभाव ने शिक्षा की गुणवत्ता और विस्तार दोनों को ही प्रभावित किया है।

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बीती सदी तक विश्वविद्यालयों की चुनौती इमारतों और अकादमी ढांचे का विकास था। 21वीं सदी में इंटरनेट ने अवसरंचना विकास में नया आयाम जोड़ दिया। हालांकि चुनौतियां हमेशा ही रही हैं, मगर चुनौतियों को नीतिगत दूरदर्शिता और नवाचार से हल करना वर्तमान शासन की विशेषता है।

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बीते छह वर्षों में केंद्र सरकार ने अवसंचना विकास की दिशा में कई ऐसी नीतिगत पहलकदमियां की हैं, जिनसे न केवल पारदर्शिता बढ़ी है, बल्कि विश्वविद्यालयों की जवाबदेही भी बढ़ी है। बढ़ी हुई जवाबदेही, भविष्य में शिक्षा की गुणवत्ता और विस्तार में परिलक्षित होगी, यह तय है।

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'हेफा' (HEFA) एक ऐसा कार्यक्रम है, जिसके जरिए वर्तमान सरकार की नीतिगत दूरदर्शिता को समझा जा सकता है। 'हेफा' यानी हाइअर एजुकेशन फंडिग एजंसी; 'हेफा' की स्थापना केंद्र सरकार ने 31 मई 2017 को एक नॉन-प्रॉफिट, नॉन बैंकिंग फिनैन्सिंग कम्पनी के रूप में की थी।


मानव संसाधन विकास मंत्रालय और केनरा बैंक का यह संयुक्त उद्यम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विज़न है, जिसका लक्ष्य उच्च शिक्षण संस्थानों को अकादमिक अवसंरचना और शोध के विकास के लिए अतिरिक्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराना है।
 

उच्च शिक्षण संस्थानों को वित्तीय सहायता प्रदान करने की पुरानी नीति यह थी कि केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अंतर्गत सूचीबद्ध सभी विश्वविद्यालयों और संस्थानों को प्रतिवर्ष मेंटनंस ग्रांट के साथ हर पांच वर्ष पर डिवेल्पमंट ग्रांट दी जाती थी, जिससे वो भौतिक सुविधाओं के साथ-साथ नए पाठयक्रम और नए कार्यक्रमों का आरंभ कर सकें।

विडबंना यह थी कि इस नीति के तहत स्थापित संस्थानों की संसाधनों के खर्च को लेकर जवाबदेही नहीं थी, और जिन संस्थानों को संसाधनों की महति आवश्यकता थी, वो ज्यादातर खाली हाथ होते थे।

जबकि हेफा ने संस्थानों को आवश्यकतानुसार श्रेणिबद्ध कर वित्तीय सहायता की प्राथमिकता को तय किया गया है। हेफा के तहत, सभी संस्थानों को, विशेष रूप से 2014 के बाद स्थापित संस्थानों, केंद्रीय विश्वविद्यालयों, सीमित संसाधन-युक्त संस्थानों, और स्कूल व स्वास्थ्य शिक्षण संस्थानों को पांच श्रेणियो में रखा गया है, जिनमें उन्हें वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने और फंड की मूल राशि की अदायगी के तरीकों को तय किया गया है।

इन तरीकों के तहत नवनिर्मित संस्थानों के लिए वित्तीय सहायता प्राप्त करना आसान है। चूंकि हेफा के तहत पुराने संस्थानों को दी गई वित्तीय सहायता की अदायगी का तरीका तय है, इसलिए संसाधनों के अधिकतम इस्तेमाल की संभावना है, साथ ही खर्च में जवाबदेही और पारदर्शिता की भी गारंटी है।
 

जैसा कि ऊपर कहा गया कि 21वीं सदी में इंटरनेट शैक्षणिक अवसरंचना विकास की दिशा में नया आयाम है। करोना वायरस की महामारी के बाद ये तय भी हो चुका है कि इंटरनेट सूचनाओं का ही नहीं, भविष्य में शिक्षा का भी इंजन बन सकता है। वर्तमान सरकार 'स्वयं' (SWAYAM) और 'दीक्षा' (DIKSHA) जैसे कार्यक्रमों के जरिए डिजिटल संसाधनों के विकास की दिशा में संलग्न है। 


 

सरकार की मंशा है कि इन नवाचारों के जरिए विश्वविद्यालयों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया जाए...

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अवसंरचना के अभाव ने शिक्षा की गुणवत्ता और विस्तार दोनों को ही प्रभावित किया है- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : pixabay

'स्वयं' एक ऐसा ऑनलाइन शिक्षा प्लेटफॉर्म है, जिसे भारतवासियों ने भारतवासियों के लिए तैयार किया है। इसके जरिए कोई भी व्यक्ति, कहीं से भी उच्च गुणवत्ता के शैक्षणिक संसाधनों तक आसानी से पहुंच सकता है। 

'स्वयं' के जरिए पढ़ा भी जा सकता है और डिग्री भी पाई जा सकती है। उच्च रैंक के कई विश्वविद्यालय 'स्वयं' के तहत डिग्री प्रदान करते हैं। वर्तमान में 'स्वयं' के अतंर्गत 4084 कार्यक्रम संचालित हो रहे हैं।


'स्वयं' के जरिए उच्च शिक्षा को इंटरनेट पर सुलभ करा रही वर्तमान सरकार 'दीक्षा' के जरिए स्कूली शिक्षा को इंटरनेट पर उपलब्ध करा रही है। 'दीक्षा' का लक्ष्य 'एक राष्ट्र, एक पोर्टल' के तहत एनसीआरटी और सीबीएससी सहित सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के बोर्डों के ई-कंटेट को इंटरनेट पर उपलब्ध कराना है। फिलहाल 15 भाषाओं के 95,000 ई-कंटेट इंटरनेट पर उपलब्ध हो चुके हैं।


अध्यापन और शोध अवसरंचना विकास के अन्य महत्वपूर्ण पाये हैं। मानव संसाधान विकास मंत्री श्री रमेश पोखरियाल ने पिछले साल स्कूल अध्यापकों के एकीकृत प्रशिक्षण के लिए पिछले वर्ष 'निष्ठा' ( NISHTHA) कार्यक्रम लांच किया था।

इस कार्यक्रम का लक्ष्य 42 लाख शिक्षकों और प्रधानाध्यापकों को प्रशिक्षित करना है, और अब तक 15 लाख से ज्यादा शिक्षकों और 1.6 लाख से ज्यादा प्रधानाध्यापकों को प्रशिक्षित किया जा चुका है।

अध्यापकों को प्रशिक्षित करने के लिए लांच किया गया 'पंडित मदन मोहन मालवीय नेशनल मिशन ऑन टीचर्स एंड ट्रेनिंग' भी एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम है।

इस कार्यक्रम के तहत स्कूल और कॉलेज, दोनों ही स्तरों पर अध्यापकों को प्रशिक्षित किया जाता है, और अब तक विभिन्न विश्वविद्यालयों और संस्थानों के 95 लाख अध्यापक प्रशिक्षित हो चुके हैं।

इनके अतिरिक्त लीप (LEAP) और अर्पित (ARPIT) भी ऐसे कार्यक्रम हैं, जिनके तहत उच्च शैक्षणक संस्थानों के अध्यापकों को प्रशिक्षण प्रदान किया जा रहा है। शोध की गुणवत्ता बेहतर करने और वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने की प्रक्रिया सरल करने के लिए सरकार ने इम्प्रेस (IMPRESS) और इम्प्रिंट (IMPRINT) जैसे कार्यक्रम आरंभ किए हैं।

इम्प्रेस के तहत अब तक 739 परियोजनाओं को वित्तीय सहायता उपलब्ध करवाई जा चुकी है। जबकि इम्प्रिंट का लक्ष्य ज्ञान को व्यवहार्य तकनीकी में बदलना है और इसके तहत 10 ज्ञानक्षेत्रों में 319 परियोजनाओं पर कार्य हो रहा है।


सरकार की मंशा है कि इन नवाचारों के जरिए विश्वविद्यालयों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया जाए। शोध और अध्यापन की गुणवत्ता बेहतर कर भारतीय विश्चविद्यालयों को विश्व के श्रेष्ठतम विश्वविद्यालयों की कतार में शामिल किया जाए। विकास की स्वाभाविक गति सतत ओर सुचारू होती है।


वर्तमान शासनतंत्र की ओर से उच्च शिक्षा में अधिरोपित विकास के ये नवाचार सतत और सुचारू रहे तो विकास का विशाल वृक्ष हमारे सामने होगा।


 प्रो. हरिश्चंद्र सिंह राठौर दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय, गया, बिहार में कुलपति हैं। 


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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