Haryana Election 2019: आखिर क्यों बिहार का फोटो स्टेट बन रहा है हरियाणा चुनाव?
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हरियाणा विधानसभा चुनाव के कुछ दिन रह गए हैं। चुनाव प्रचार तेजी पर है। भाजपा ने अपने स्टार प्रचारक उतार दिए हैं, वहीं कांग्रेस पूरी तरह से भूपेंद्र सिंह हुड्डा और कुमारी शैलजा के चुनाव प्रचार पर निर्भर है। कांग्रेस का घोषणापत्र आ गया है। तमाम वादे किए गए हैं। कृषि क्षेत्र से लेकर बेरोजगारी तक के मुद्दों पर कांग्रेस ने तमाम वादे किए हैं। हालांकि दूसरी तरफ भाजपा भी पांच साल के विकास को लेकर तमाम दावे कर रही है, लेकिन चुनाव प्रचार में धारा 370 और राफेल का शस्त्रपूजन को भाजपा ने मुद्दा बना दिया है।
दरअसल, भाजपा को पांच साल में किए गए कार्यों पर भरोसा नहीं है। यही कारण है कि अमित शाह ने हाल ही मे अपनी चुनावी रैली में राफेल की शस्त्र पूजा और धारा 370 को चुनावी मुद्दा बनाया है। हालांकि चुनाव प्रचार में भाजपा काफी ज्यादा आगे निकल चुकी है। लेकिन जमीन पर तो कोई खास मुद्दा चुनाव में दिख नहीं रहा है।
चुनाव पूरी तरह से मुद्दा विहीन है। गांव तो गांव शहर भी जातीय आधार पर बंटे नजर आ रहे हैं। हरियाणा के चुनावो में छतीस बिरादरी, जाट बनाम नॉन जाट जैसे शब्दों का इस्तेमाल आम होते रहे हैं। हालांकि हरियाणा में भारी संख्या युवा बेरोजगारों की है, लेकिन ये भी जाति के आधार पर बंटे हुए नजर आ रहे है।
बिहार का फोटो स्टेट है हरियाणा चुनाव
बिहार में जाति को वोट नारा हमेशा चुनावों में रहा है। हरियाणा इससे अलग नहीं है। सोनीपत में लंबे समय से कार्यरत एक सरकारी अधिकारी बताते हैं कि हरियाणा चुनाव को आप बिहार में होने वाले चुनावों के चश्में से देख सकते हैं। शहर और गांव में जनता से जुड़े मुद्दों पर नहीं बल्कि जाति पर ज्यादा बात हो रही है।
यहां, जाट-नॉन जाट एक चुनावी मुद्दा है। जाटों का गोत्र भी एक मुद्दा है, जिसके आधार पर भाजपा कुछ इलाकों में अपनी जीत तय मान रही है। जातीय आधार पर यह आकलन लगाया जा रहा है कि अगर बांगर और देशवाली रीजन के जाट एक ही पार्टी के पक्ष में चले गए तो भाजपा की मुश्किल काफी बढ़ जाएगी। अधिकारी के अनुसार फरवरी 2016 में जाट आरक्षण के दौरान हुई हिंसा के घाव अभी तक नहीं हरे हैं।
ग्रामीण इलाकों में यह घाव तीखे हैं, जबकि शहरी इलाकों में हुई जाट आरक्षण आंदोलन की हिंसा के प्रभाव से लोग अभी भी मुक्त नहीं हुए है, इसलिए जाट बनाम नॉन जाट का विभाजन अभी भी साफ दिख रहा है। पिछड़ी जातियों में सैनी समेत कई अन्य पिछड़ी जातियां जाट विरोधी मानसिकता के साथ वोट करने की योजना बना रही है।
चूकिं जाट आरक्षण आदोलन के दौरान यादव और सैनी दो जातियों का सीधा टकराव जाटों से हुआ था। वहीं शहरी इलाकों में पंजाबी पूरी तरह से भाजपा के साथ नजर आ रहा है, क्योंकि पहली बार भाजपा ने प्रदेश में पंजाबी मुख्यमंत्री को गद्दी दिया था। जाट आरक्षण आंदोलन में पंजाबियों के व्यापार और दुकानों को सबसे ज्यादा निशाना बनाया गया था।
स्थानीय जातीए गठजोड़ और खापों की भूमिका
जातीय आधार पर चुनाव हरियाणा में किस कदर हो रहे हैं, उसे कुछ विधानसभा हल्कों के अध्ययन से आप देख सकते हैं। सोनीपत के राई विधानसभा क्षेत्र में भाजपा का प्रत्याशी ब्राह्मण है। पिछली बार भाजपा ने यहां से एक जाट प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतारा था।
भाजपा इस बार राई से ब्राह्मण उम्मीदवार लड़ा रही है। भाजपा का गुणागणित यहां यह है कि विपक्षी दलों के उम्मीदवार जाटों के दो मजबूत खाप दहिया और अंतिल खाप से संबंधित है इसलिए जाटों का वोट खाप के आधार पर बंट जाएगा। सोनीपत के ही बडौदा विधानसभा हल्के में चुनाव जाट बनाम ब्राह्मण हो गया है। क्योंक यहां पर भाजपा का उम्मीदवार योगेश्वर दत ब्राह्मण है।
कांग्रेस ने जाट उम्मीदवार श्रीकृष्ण हुड्डा को चुनाव मैदान में उतारा है। पानीपत के समालखा विधानसभा में जाट और गुर्जर एक मंच पर नजर आ रहे हैं, क्योंकि भाजपा ने यहां 2014 मे जीते निर्दलीय जाट जाति के रवींद्र मछरौली को टिकट नहीं दिया। रवींद्र मछरौली भाजपा में आ गए थे, उन्होंने भाजपा से टिकट मांगी, लेकिन भाजपा ने उनकी जगह ब्राह्मण जाति का उम्मीदवार उतार दिया। यहां पर अब रवींद्र मछरौली कांग्रेस के गुर्जर उम्मीदवार को समर्थन दे रहे हैं। यहां पर जाट और गुर्जरों के खासे गांव हैं।
अगर ये दोनों जाति एकजुट होकर वोट करेंगी तो भाजपा की मुश्किलें बढ़ेंगी। यही कुछ हाल जींद जिले के सफीदों विधानसभा क्षेत्र का है। यहां पर पिछली बार जाट जाति के निर्दलीय जसबीर देशवाल चुनाव जीते थे, वो बाद में भाजपा के साथ हो गए थे। उन्हें उम्मीद थी कि भाजपा से टिकट मिलेगी। लेकिन उनकी जगह भाजपा ने गुर्जर जाति के बचन सिंह आर्य को चुनाव मैदान में उतार दिया। इलाके में देशवाल जाटों के 50 से ऊपर गांव है। अब जसबीर देशवाल कांग्रेस के देशवाल उम्मीदवार का समर्थन कर रहे हैं।
क्या जाट एक तरफ जाएंगे ?
एक अहम सवाल यह उठ रहा है कि हरियाणा के सबसे प्रभावशाली जाति जाट एक तरफ वोट करेंगी?
दरअसल, अभी तक हरियाणा में जाट दो दलों के बीच बंटे हुए रहे हैं। भूपेंद्र सिंह हुड्डा के हरियाणा में मुख्यमंत्री बनने के बाद जाटों का बड़ा तबका कांग्रेस के साथ जुड़ गया था। हरियाणा के देशवाली इलाके में हुड्डा जाटों के एकछत्र नेता बन गए। लेकिन हरियाणा के बांगर क्षेत्र के जाट देवीलाल परिवार के साथ जुडे़ रहे।
देवीलाल परिवार के नेता ओमप्रकाश चौटाला लंबे समय तक बांगर के जाटों के एकमात्र नेता रहे। हालांकि इस इलाके के एक बडे़ नेता वीरेंद्र सिंह जो कभी कांग्रेस में थे अब भाजपा के साथ है, उनकी पत्नी भाजपा से विधायक है और बेटा हिसार से भाजपा से सांसद है।
इसके बावजूद अभी तक चौटाला परिवार का इस इलाके में प्रभाव कम नहीं हुआ था। लेकिन पिछले दो सालों में ओमप्रकाश चौटाला के दो बेटे अजय और अभय के बीच उपजे विवाद ने चौटाला परिवार को बांट दिया, उनकी पार्टी भी टूट गई। इससे इस इलाके के जाटों में असमंजस की स्थिति है।
अजय और अभय के पारिवारिक फूट ने दो पार्टी बना दी है, दोनों पार्टी चुनाव लड़ रही है। जाटों को लगता है कि अजय और अभय़ चौटाला की पार्टी फिलहाल जाटों का वोट बांटेगी, लेकिन चुनाव में जीतने की स्थिति में अजय और अभय़ की पार्टी नहीं है। वैसे में जाटों में असमंजस की स्थिति का फायदा भाजपा भी उठाना चाहती है और कांग्रेस भी उठाना चाहती है।
सामान्य रूप से जाट फरवरी 2016 में हुए आरक्षण आंदोलन के बाद भाजपा के खासे खिलाफ है। लेकिन क्या जाट एकमुश्त कांग्रेस को वोट करेंगे, यह अहम सवाल है।
दरअसल, कांग्रेस ने ठीक चुनाव से पहले भूपेंद्र हुड्डा को चुनाव की कमान देकर जाट वोटों को एकमुश्त कांग्रेस की तरफ लाने की कोशिश कर रही है, लेकिन इसका फायदा कितना मिलेगा यह समय बताएगा।
23 विधानसभा क्षेत्र में जाट काफी मजबूत
राज्य के अंदर जाट वोट शेयर 27 प्रतिशत है, जिस कारण हरियाणा लगभग 50 विधानसभा क्षेत्रों में जाट प्रभावी है। 23 विधानसभा क्षेत्रों में तो जाट मतदाता ही हार-जीत तय करते है। इन विधानसभा क्षेत्रों में पेहवा, कलायत, कैथल, खरखौदा, गोहाना, बड़ौदा, जुलाना, सफीदों, जिंद, रतिया, कलांवाली, डबवाली, रनिया, एलनाबाद, उकलाना, बरवाला, नलवा, दादरी, तोशाम, मेहम, किलोई, झझर, बेरी आदि शामिल है।
2014 में इन सीटों पऱ भाजपा हार गई थी। हालांकि 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को खासा उत्साह मिला, राज्य के 82 विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा को लीड मिली। लेकिन 2014 के विधानासभा चुनाव में 23 जाट बहुल इलाकों में भाजपा खाता भी नहीं खोल पाई थी।
इस बार भाजपा ने इन हारे विधानसभा क्षेत्रों में जोर लगाया है। इन इलाकों में कांग्रेस भी जोर लगा रही है। उन्हें उम्मीद है कि इनेलो और जजपा की फूट से असमंजस में गए जाट वोटर उनकी तरफ आएंगे। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने जाट बेल्ट में 7 रैलियों को संबोधित करेंगे।
भाजपा ने इस बार जाटों को अच्छी संख्या में टिकट भी दी है। यही नहीं राज्य में वित्त और कृषि जैसे अहम मंत्रालय के मंत्री भी जाट जाति के कैप्टन अभिमन्यु और ओपी धनखड़ है।
भाजपा ने जाट बहुल इलाकों में जीत तय करने के लिए दूसरे दलों से आयातीत विधायकों को भी टिकट दिया है। हालांकि भाजपा को अभी भी जाट मतदाताओं को लेकर शक है, इसलिए भाजपा जाट बहुल विधानसभा क्षेत्रों में धारा 370 को मुद्दा बना रही है। चूकिं जाटों की अच्छी संख्या सेना, सीआरपीएफ और बीएसएफ में है, इसलिए भाजपा को उम्मीद है कि राष्ट्रवाद के नाम पर जाटों मतदाताओं का एक तबका भाजपा की तरफ आकर्षित हो सकते है।
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