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लैंगिक पूर्वाग्रहों और यौन हिंसा से मुक्त हो 2020, हर परिवार ले ये संकल्प

Thu, 02 Jan 2020 04:35 PM IST
Bhawna Masiwal भावना मासीवाल
Updated Thu, 02 Jan 2020 04:35 PM IST
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Happy New Year 2020 New year resolution Get rid of sexual prejudices and sexual violence in 2020
नया साल नये उद्देश्य और संकल्पों के साथ हमारे बीच है। मगर बीता साल महिलाओं के प्रति अपराध की बढ़ती घटनाओं से जूझता रहा। - फोटो : pixabay

नया साल नये उद्देश्य और संकल्पों के साथ हमारे बीच है। मगर बीता साल महिलाओं के प्रति अपराध की बढ़ती घटनाओं से जूझता रहा। अपराध की इन घटनाओं में एक साल की बच्ची से लेकर बुजुर्ग महिलाओं तक के साथ यौन हिंसा की घटनाएं हुई और इन घटनाओं ने सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर अपराध की बढ़ती घटनाओं के क्या कारण है? जबकि निर्भया के साथ हुई यौन हिंसा के बाद यौन हिंसा और उससे जुड़े अपराधों के लिए सख्त कानून बना। यहां तक उस समय बनी जस्टिस वर्मा कमिटी ने भी आई.पी. सी में संशोधन के सुझाव देते हुए कहा था कि महिलाओं को घूरने, उनका पीछा करने जैसे अपराध पर भी सजा का प्रावधान होना चाहिए। एसिड से पीड़ित महिलाओं से संबंधित अपराध के लिए अलग से सेक्शन बनाए जाने चाहिए।

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ऐसे सभी हिंसात्मक अपराधों पर सख्त कानून जरुरी है। जिस तरह से यह कमिटी 30 दिन में अपनी रिपोर्ट भेजती है उसी तरह से ऐसे अपराधों के लिए फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट हो जहां 30 दिन के अंदर इन अपराधों की कार्यवाही को पूरा किया जाएं। बावजूद इस सख्त कानून के अपराध की घटनाओं में बढ़ोतरी हुई और घटनाएं वीभत्स से वीभत्स होकर उभरने लगी। एक ओर तो महिलाओं के प्रति यौन हिंसा पर संवैधानिक कानून उनकी रक्षा और सुरक्षा की बात करता है। मगर जमीनी स्थितियाँ इनसे एक दम अलग अलग।
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यह कानून न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा बनकर 8 साल तक निर्भया के अपराधियों को सजा नहीं दे पाता है। न्यायिक प्रक्रिया इतनी लचर है कि अपराधी सजा से बचने के तमाम हथकंडों को अपनाते हैं और अपने मानवाधिकार के नाम पर रिहाई तक ले लेते हैं। निर्भया केस भी पुनः अपराधियों के मानवाधिकार की सुरक्षा की वजह से अब तक उन्हें सजा नहीं दे सका। इसी की वजह से महिलाओं के बढ़ते अपराधों को क्षय मिलती है। और समाज में यौन विकृति से ग्रस्त मानसिक रूप से बीमार लोगो ने इसी कानून को अपना हथियार बनाकर अपराध को बढ़ावा दिया। और कानून मूक होकर गवाह की दरकरार में फैसला नहीं कर पाता है।
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Happy New Year 2020 New year resolution Get rid of sexual prejudices and sexual violence in 2020
हमारे परिवेश स्त्री देह को हमेशा ही देह के रूप में देखे जाने की मानसिकता है। उसे सहज होकर सामान्य मनुष्य के रूप में देखे जाने की मानसिकता आज भी कम ही है। - फोटो : pixabay

न्यायिक व्यवस्था के इन्हीं कमजोर कारणों ने अपराध के बाद एनकाउंटर को बढ़ावा दिया और उन्हें इन लंबी और मानसिक यातनाओं से गुजरने से बेहतर एक बेहतर विकल्प के रूप में एनकाउंटर को सामने ला खड़ा किया। मगर फिर एक सवाल उभरता क्या एनकाउंटर एक वर्ग विशेष का ही सम्भव है या उन सभी का जो सत्ता में रहकर पद का दुरूपयोग करते हैं और महिलाओं का शोषण करते हैं। यह न्यायिक प्रक्रिया की कमज़ोरी है कि सत्ता में रहकर अपराधी अपराध करते हैं और बच जाते हैं। हमारे समाज यौन हिंसा और बलात्कार की वीभत्सता इतनी अधिक है कि  मनुष्य भी अपने मनुष्य होने पर शर्मशार हो जाए।

आंकड़ों की मानें तो भारत में महिलाओं के साथ बढ़ते अपराध के डाटा में 2017 के अंत तक न्यायिक प्रक्रिया में 1,28000 अपराध केस अब तक लंबित हैं। यौन हिंसा और बलात्कार की इन घटनाओं में सबसे ज्यादा 18 वर्ष तक के किशोर शामिल है। किशोरावस्था के ये अपराधी इतना मनोबल कहां से पाते हैं?  यह आज भी विचारणीय है। परिवार में बेटे और बेटी के प्रति लैंगिक भेदभाव में परिवार हमेशा बेटे के पक्ष में खड़ा देखा जाता है। वह कभी अपराधी बेटे को खुद से सजा नहीं देते हैं बल्कि उसे संरक्षण देते देखे जाते हैं। परिवार का संरक्षण ही उनकी अपराधी मनोवृति को बढ़ाता है। आज भी समाज और परिवार के भीतर लैंगिक समानता नहीं आ पाई है।


परिवार लिए लड़कियां जिम्मेदारी और लड़के संरक्षक की भूमिका में आज भी परवरिश पा रहे हैं। बेटी के पैदा होने के साथ असुरक्षा का भाव परिवारों में आज भी है और इसी असुरक्षा के भाव से लड़कियां घरों के अंदर सीमित कर दी जाती है और लड़की होने की समाजीकरण की प्रक्रिया से गुजरती है। जहां लड़की होना उसे सिखाया जाता है। क्या बोलना है? क्या पहनना है? कैसा दिखना है? कैसा होना है? कितना बोलती है? चुप रहती है। घमंडी है। कैसे चलती है? चलने का सलीका नहीं । कितना हंसती है कुछ तो गड़बड़ है।


दोस्तों के साथ फिल्म देखती है रात को देर से आती है। और भी न जाने कितने ही किस्से, घर, बाहर, दफ्तर के हर महिला के पास होंगे। पूछना शुरू  करेंगे तो हर किसी के पास अपने अनुभव होंगे। ऐसा नहीं है कि सिर्फ महिलाएं ही इस तरह के अनुभवों से गुजरती हैं बल्कि कई पुरुष साथी भी गुजरते हैं। दैहिक भाषा पर सवाल और उस पर फ़ब्ती समाज की मानसिकता का हिस्सा बन चुका है और इस तरह स्त्री के लिए बुद्धि से अधिक देह ही जीवन की अंतिम परिणति बनकर उभरा है। हमारे परिवेश स्त्री देह को हमेशा ही देह के रूप में देखे जाने की मानसिकता है। उसे सहज होकर सामान्य मनुष्य के रूप में देखे जाने की मानसिकता आज भी कम ही है। यही कारण भी है कि महिलाओं का छोटे कपड़ो का पहनना, हँसना, बोलना और अधिक आत्मीय भाव समान सेक्स में सहज समझे जाने वाले भाव की अपेक्षा एक अपील के रूप में देखा और समझा जाने लगता है। इसका कारण व्यक्ति विशेष नहीं बल्कि समाज है।

 

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स्त्री विरोधी गाली का विरोध करेंगे। अपनी महिला मित्रों के साथ लैंगिक पूर्वाग्रहों से मुक्त व्यवहार करेंगे। - फोटो : women

क्योंकि हमने कभी स्त्री को देह से अलग माना ही नहीं है। इसी कारण समाज अपने चश्में के फ्रेम को सही करने की अपेक्षा महिलाओं को ही सही चश्में पहनने की हिदायद देता देखा जाता है। क्योंकि उनका मानना है इनका सुधरना और बदलना मुश्किल है इसलिए तुम ही बदल जाओ और कैद हो जाओ। यही कारण भी है कि आज भी समाज में बढ़ती यौन शोषण की घटनाओं में हर बार कपड़ो और लड़की को दोषी बनाकर, समाज खुद की मानसिकता में सुधार की अपेक्षा महिलाओं को ही सुधरने और उनकी सीमा का बोध करा देता है। यह मानसिकता लैंगिक असमानता और पूर्वाग्रहों को बढावा देती है।


ऐसे इस नये साल के साथ हम कुछ नये संकल्प ले। यह संकल्प एक ऐसे समाज को बनाने का है जो किसी लड़की और लड़के के कपड़ों और व्यवहार को लेकर कमेन्ट नहीं करेगा। न ही उनके कपड़ों की लंबाई से उनके चरित्र का आंकलन करेगा। 


क्या हैं वो संकल्प जो इस साल लें...

स्त्री विरोधी गाली का विरोध करेंगे। अपनी महिला मित्रों के साथ लैंगिक पूर्वाग्रहों से मुक्त व्यवहार करेंगे। उनकी देह से बुद्धि की तुलना नहीं करेंगे। अपने आस-पास जब भी यौन हिंसा की घटनाओं को होते देखेंगे तो उसका विरोध करेंगे। छोटे बच्चों को बेड और गुड टच के बारे में बताएंगे ताकि लड़कों और लड़कियों का बचपन यौन हिंसा से बचाया जा सके। इसके अलावा, बच्चों पर निगरानी रखेंगे कि वह इंटरनेट और सोशल मीडिया का इस्तेमाल किस संदर्भ में कर रहे हैं। अपने बच्चों को 11 वर्ष के बाद धीरे-धीरे उसके शरीर में आने वाले बदलावों के बारे में बताएंगे। उनके भीतर की जिज्ञासाओं को शांतिपूर्ण तरीके से समझने और सुलझाने का प्रयास करेंगे।

बच्चों के गलत व्यवहार पर उन्हें समझाने के साथ दंड अवश्य दे ताकि वह उसे करने से बचें।लड़को को लड़कियों से दूर रखने की अपेक्षा एक सहज और स्वस्थ वातावरण बनाने का प्रयास किया जाए। क्योंकि दूर रखना घटनाओं को रोकने का माध्यम नहीं है। परिवार में माता-पिता की जितनी ज़िम्मेदारी बच्चों के प्रति है उतनी ही अपने स्वयं के व्यवहार का अवलोकन करना भी उसकी जिम्मेदारी का हिस्सा है। क्योंकि परिवार बच्चों की पहली पाठशाला होता है और बच्चा यही से जीवन जीना सीखता है। उसके मस्तिष्क में सही और गलत के संदर्भों की मनोभूमि भी इसी दौरान बननी आरंभ हो जाती है। ऐसे में बच्चे की मनोभूमि के निर्माण में परिवार का अहम् योगदान होता है और माता-पिता इससे बच नहीं सकते हैं।

इस नये साल के साथ यह कुछ संकल्प हमें बेहतर समाज की ओर आगे बढ़ा सकने में कारगर होगे और कुछ संकल्प आपके पास होगे। हम हर बार समाज को बदलने की बात तो करते है परंतु स्वयं को और अपने परिवार को बदलने में नाकाम होते हैं। यही नाकामी समाज का स्याह पक्ष बनाकर अपराध के रूप में हमारे सामने होती है। हमें उन नाकामियों से लड़ना है और उनसे जीत कर बेहतर समाज को बनाने का प्रयास करना है जो लैंगिक पूर्वाग्रहों और यौन हिंसा से मुक्त हो। 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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