जन्मदिन विशेष: आवाज़ का जिस्म हो जाना है आशा भोसले होना
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8 सितम्बर को आशा भोसले का जन्मदिन है। आशा भोसले यानी एक ऐसी आवाज़ जिसमें सिर्फ रूह नहीं है, एक भरा पूरा जिस्म है। जब उनका गाना बजता है तो लगता है कि एक आवाज़ ज़िंदा हो गई और एक शरीर का रूप ले लिया है।
हर गाने में एक अलग जिस्म है। ये जो आवाज़ का जिस्म हो जाना है, आशा भोसले को "न भूतो न भविष्यति" बनाता है। आशा मंगेशकर खानदान के बरगद से निकली वो जड़ है जो पेड़ से अलग हो कर अपनी पूरी नर्सरी, अपना पूरा बागान, अपना पूरा जंगल बना चुकी है।
आशा भोसले की आवाज़ का जिस्म कभी दूर से एक धुंधली- सी लकीर है, कभी वो इतना मांसल है कि आपके दिल-दिमाग और शरीर पर महसूस होता है। 'मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है' यानी दुबली, पतली, छरहरी अनुराधा पटेल। इस जिस्म के हर पोर से बिछड़ने का दुःख बहता है पसीने की तरह।
'ये मेरा दिल यार का दीवाना' में हेलन का जिस्म बनकर थिरकती ये आवाज़ जाने कितने नौजवानों से बिस्तर पर करवटों से सिलवटों के निशां बनवा रहा है। छोटे कद की मुमताज़ जब 'ये है रेशमी ज़ुल्फ़ों का अंधेरा' न घबराइए गाती हैं तो उमर खय्याम की साक़ी और सुराही नज़र आती है। जब मादक नज़रों वाली रेखा पारम्परिक मुजरे के परिधान में लिपटकर नज़रें झुका कर कहती हैं "इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हज़ारों हैं" तो वो आंखें आपको रोक लेती हैं क्योंकि वो आवाज़ ही आंख बन जाती है।
आशा की ज़िन्दगी का तराज़ू हमेशा दुखों वाले पलड़े में भारी रहा
आशा भोसले के बारे में हज़ारों लेख लिखे गए हैं। संगीत के जानकार, उनकी और लताजी की तुलना में लाखों शब्द बर्बाद कर चुके हैं। आशा नाम की इस जिस्म वाली आवाज़ को समझने के लिए बहुत लोग प्रयास कर रहे हैं।
वो क्या है जो 86 साल की इस नवयौवना के 76 साल लंबे करियर में बस अभी तो गाना शुरू किया है वाली फीलिंग ले आता है। आज भी जब कोई कॉन्सर्ट करती हैं, या कोई रिकॉर्डिंग पर जाती हैं तो फर्स्ट स्टेज परफॉरमेंस की तरह नर्वस होने वाली आशा को सभी संगीतकार अकेले छोड़ देते हैं। और जब आशा का मन कड़ा हो जाता है, कॉन्फिडेंस आ जाता है तो वो उनके गले से वो सुर बहते हैं जो किसी भी तूफ़ान को खामोश कर देते हैं। किसी भी आर्टिस्ट को कोई ये कह दे की भाई डरना छोड़ो, आशा जी भी अपनी रिकॉर्डिंग या कॉन्सर्ट से पहले नर्वस होती है, तो ये सुनकर वह शख्स आप पर हंस देगा। आशा भोसले और नर्वस।
आशा के जीवन में सदैव साथ देने वाला सिर्फ एक ही था - उनका अपना दुःख। बचपन में पिता का साया न होना, 10 साल से घर चलाने में मां और दीदी की मदद करने के लिए कमाना, 16 की उम्र में 31 साल के इंसान से शादी करना और घरवालों का नाराज़ हो जाना, पति का शराब पीना और मारना-पीटना, आशा की कमाई पर जीने की कल्पना करना और गाने के लिए भेजना, 2 बच्चों के साथ गर्भावस्था में पति द्वारा घर से निकाला जाना, और फिर भी इंडस्ट्री में लीड सिंगर के तौर पर एस्टब्लिश होने की मशक्कत, संगीतकारों द्वारा सौतेला व्यवहार किया जाना, अपने से छोटे आरडी बर्मन से शादी, पंचम का बुरा प्रोफेशनल वक़्त और उनकी शराब/ पंचम की असमय मृत्यु।
एक-एक दिन देखा जाए तो लगता है आशा की ज़िन्दगी का तराज़ू हमेशा दुखों वाले पलड़े में भारी रहा। मगर लड़ाका आशा ने सब को गलत साबित किया, मतलबी लोगों को ज़िन्दगी से बाहर किया और अभी तक वे सिर्फ पंचम को मिस करती हैं।
आशा जी के करियर पर भारी पड़ा था लता जी का गुस्सा
लता मंगेशकर हिंदी फिल्म संगीत में वटवृक्ष की तरह मानी और पूजी जाती हैं, इनकी छाया में किसी और सिंगर का पनपना नामुमकिन था। गणपतराव भोसले से शादी कर के आशा ने पूरे घर से दुश्मनी मोल ले ली थी। आशा की कमाई से घर चलाने की गणपत राव की स्कीम की वजह से आशा दिन-दिन भर गाने की रिकॉर्डिंग्स करती थी।
कभी-कभी आशा कहती हैं, की अगर गणपत राव न होता तो उन्हें कभी गाना गाने के लिए जाना नहीं पड़ता। मगर आशा को ये दुःख भी है कि माई (आशा जी की माताजी) को बहुत दुःख हुआ था जब आशा शादी करने के लिए घर छोड़ कर चली गई थीं। ये उनके जीवन का सबसे बड़ा रिग्रेट है।
कहा जाता है कि लता जी का गुस्सा आशा के गुस्से से भी तेज़ है, और उनका गुस्सा आशा के करियर के लिए भारी पड़ा था। आशा को हमेशा सेकंड लीड के गाने और आइटम सॉन्ग्स मिलते थे। पहले पति की वजह से जो गाने मिले वो गाए और फिर जब पति ने घर निकाल दिया तो 3 बच्चों का पेट पालने के लिए आशा ने गाने गाते समय किसी भी गाने को न नहीं कहा। जो गाना मिलता वो जाती।
ऐसा करते-करते 13000 गानों के साथ आज आशा गिनीज़ बुक में शामिल हैं। अगर लता जी को अपनी बहन से इतनी दिक्कत होती तो क्या आशा जी वो सब कर पाती जो वो आज तक अचीव कर पाई हैं। वैसे कहा जाता है कि जिन-जिन संगीतकारों को लता मंगेशकर से दिक्कत होती थी, या उनका व्यवहार पसंद नहीं आता था वो सब आशा के पास जाते थे।
जैसे ओपी नैय्यर ने ज़िन्दगी में कभी लता से गाना नहीं गवाया, और अपनी पूरी ज़िन्दगी आशा को स्टार बनाने में लगा दी। एसडी बर्मन और लता के बीच रिहर्सल को लेकर बात बिगड़ गई तो एक लंबे समय तक आशा ने दादा बर्मन के सब गाने गाए। एक कम मशहूर मगर काबिल संगीतकार रवि ने कभी आशा जी का साथ नहीं छोड़ा और तब तक पंचम ने आशा की ज़िन्दगी में कदम नहीं रखा था।
दोनों बहनों के बीच अनबन तो रही, और कई गवाह हैं, मगर जब आशा जी को उनके पति ने घर से निकल दिया, तो वो सीधे "प्रभु कुञ्ज", पेड्डर रोड, मुंबई गई जहां लता जी और बाकी मंगेशकर परिवार रहता था।आशा जी और उन्हें बच्चों को खुले दिल से स्वीकार किया गया, स्वागत किया गया।
दोनों बहनों के बीच कला का टकराव हुआ, तो अपने अपने गुणों से उन्होंने गीतों पर विजय पाई। अहम् के टकराव में कवि प्रदीप के लिखे महान गीत "ऐ मेरे वतन के लोगों" की रिकॉर्डिंग में आशा और लता द्वारा गाया जाने वाला यह गाना, सिर्फ लता की आवाज़ में रिकॉर्ड किया गया। ये भी कहानी सुनाई जाती है कि आशा की सफलता में सबसे बड़ा हाथ लोगों द्वारा उन्हें उचित सम्मान न दिए जाने का रहा है।
1948 की फिल्म चुनरिया में आशा जी को एक लाइन गाने को मिली, "बहन खुश हो के सगुन मनाये", साथ गाने वाली थी मक़बूल गायिकाएं, ज़ोहराबाई अम्बालेवाली और गीता दत्त। कहते हैं की ज़ोहराबाई ने इस गाने की रिकॉर्डिंग में आशा जी से माइक छीन लिया था जबकि हकीकत ये थी कि उस वक़्त तीन सिंगर्स थे और तीनों के लिए एक ही माइक था। संगीतकार हंसराज बहल ने आशा को ये मौक़ा दिया था, रेकॉर्ड्स पर आशा का नाम आया था और ये बात आशा जी कभी भूल नहीं पाई। अपने हर इंटरव्यू में वे हंसराज जी को अपने मेंटर का दर्ज़ा देती रही हैं।
जो आशा को हक़ से नहीं मिला, वो उन्होंने अपनी आवाज़ से छीना। आशा को लगातार सेकंड लीड के गाने मिलते थे। आइटम नंबर मिलते थे। उनके गाए हुए गाने वैम्प्स पर फिल्माए जाते थे। फिल्में सारी बी ग्रेड की होती थी। कोई-कोई गाना चल भी जाता था मगर इन सब संघर्षों के बावजूद वो टॉप की सिंगर नहीं थी। फिर दिलीप कुमार वैजयंती माला की फिल्म "नया दौर" में ओपी नैयर ने आशा की आवाज़, फिल्म की हीरोइन के सभी गानों के लिए इस्तेमाल की थी।
आशा की तक़दीर में थोड़ा बदलाव आया। यहां से उनका सही मायनों में उत्थान शुरू हुआ। उनके करियर को एक नई दिशा मिली। संघर्ष जारी रहे मगर थोड़ा सम्मान भी मिलने लगा था। यहां नैय्यर साहब का योगदान बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि उनके कम्पोज़िशन्स की वजह से आशा रेंज का सबको पता चल पाए। लेकिन ये साथ भी एक दिन टूट गया क्योंकि अहम् बीच में आ गया था।
आशा ने कुछ इंटरव्यूज में ओपी नैय्यर को भला बुरा भी कहा था, और इस पर लता मंगेशकर ने अपनी बहन को झाड़ भी लगाई थी। पहचान और सम्मान का ये युद्ध दशकों तक अनवरत् जारी रहा, जब तक कि खैय्याम साहब ने आशा को उमराव जान की आवाज़ नहीं बनाया। और फिर आशा, पंचम और गुलज़ार ने मिलकर हिंदी फिल्म संगीत के इतिहास को फिर से लिख दिया।
आज दोनों बहनें साथ में पुरानी बातों पर हंसती हैं। लता जी बचपन से नाज़ुक थी, बीमार रहती थी और पेट दुरुस्त नहीं रहता था। एक बार किसी होम्योपैथिक दवाई खाने की वजह से न सिर्फ उनका पेट बल्कि गला भी ठीक हो गया। आज वो अचार भी खाती हैं तो उनके गले को कुछ नहीं होता। मगर आशा के साथ ये नहीं हो पाया। वो अपने गले का और सेहत का ख्याल रखती हैं। बाहर का नहीं खाती, आईस्क्रीम भी कई महीने में एक बार खाती हैं। दोनों बहनें एक दूसरे के बगैर रह नहीं सकती थी। दुबली-पतली लता, गोलू-मोलू आशा को कंधे पर लेकर घूमती रहती थी और इसी चक्कर में एक बार वो दोनों सीढ़ियों से गिर पड़ी थी।
लता जी के माथे पर चोट आ गई थी। आशा को गुड़िया समझने वाली लताजी उन्हें स्कूल में भी साथ ले जाती थी। वहां मास्टरजी ने टोक दिया कि एक फीस पर दो लोग नहीं पढ़ सकते। लता जी उस दिन के बाद से स्कूल नहीं गईं। बरसों बाद कोई संगीतकार किसी गायक की तारीफ कर रहा था क्योंकि वो संगीत में ग्रेजुएट था। थोड़ी देर तक तो आशा जी ने सुना फिर संगीतकार को कहा, कितना भी पढ़ लो...लता मंगेशकर नहीं बन पाओगे। जितने भी किस्से सुनिए, पता चलता है कि आशा, लता को लेकर बेहद पज़ेसिव हैं और लता, आशा को हमेशा गुड़िया ही मानती हैं, जो हमेशा उनके साथ रहेंगी।
आशा भोसले के पास आज भी हैं पंचम की 3000 ट्यून्स
आशा और पंचम ने शादी क्यों की यह बात किसी को कभी समझ नहीं आई। खुद उन दोनों को भी। मगर उनकी आत्मा एक सुर के तार से पिरोयी हुई थी। आशा, जो पंचम को बब्स कहती थी, ने ये स्वीकार किया कि पंचम से उनकी ज़िन्दगी में पूर्णता आई और उन्होंने अपनी ज़िन्दगी और गले के नए पहलू डिस्कवर किए। दोनों बहुत पहले से साथ काम कर रहे थे।
तीसरी मंज़िल पंचम के लिए एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट था। "आजा आजा मैं हूं प्यार तेरा" में "आ आ आ आजा" वाला गले में वाइब्रेटो वाला पीस गाने के लिए आशा डरी हुई थी। मगर आशा को चैलेंज देना यानी जीवन की सबसे बड़ी गलती करना है। 10 दिन तक रिहर्सल की और एक दिन पंचम से कहा चलो रिकॉर्ड करते हैं। जब गाना रिकॉर्ड हुआ तो पंचम ने जेब से 100 रुपये का नोट निकाल कर आशा जी के हाथ में थमा दिया।
ये मेहनताना नहीं था, ये पंचम का आदर प्रकट करने का तरीका था। गानों को लेकर दोनों में बहुत क्रिएटिव डिफरेंस और नोक-झोंक होती रहती थी। मगर पंचम के मन में था कलाकार आशा के प्रति आदर, और आशा के मन में था जीनियस पंचम के प्रति अगाध प्रेम। इसी प्रेम की वजह से दोनों ने आखिर में संगीत को ही जिता दिया। आशा ने कई बार कहा है कि पंचम हस्बैंड मटेरियल तो बिलकुल नहीं था मगर जान देकर दोस्ती निभा दे ऐसा दोस्त था। अपनी ज़िन्दगी की बेस्ट ट्यून्स पंचम ने आशा के लिए रिज़र्व रखी थी।
कहते हैं कि पंचम की 3000 ट्यून्स आज भी आशा जी के पास हैं। मगर असल बात तो ये है कि प्रेम और संगीत का ये मेल अनूठा था, और ऐसी जोड़ी कभी देखने को नहीं मिलेगी। पंचम की शराब और सिगरेट की वजह से आशा जी बहुत दुखी थी और अपने गले को बचाने के लिए वो पंचम के साथ नहीं रह पाती थी। इस बात पर भी आशा जी को बहुत आलोचना झेलनी पड़ी थी। जिस दिन पंचम की मृत्यु हुई, जो भी लोग पंचम के घर गए थे, कोई एक शख्स आशा जी का सामना नहीं कर पा रहा था। पंचम के बगैर आशा, फिर से अधूरी जो रह गईं थी।
दुनिया के 100 प्रभावशाली महिलाओं में सम्मिलित हो चुका है आशा भोसले का नाम
आशा ने तकरीबन 20 भाषाओं में गाने गाए हैं। मसालेदार खाना बनाने की शौक़ीन आशा भोंसले ने रेस्टोरेंट की एक श्रृंखला में निवेश किया है जहां कभी- कभी वो खुद जाकर खाना बनाती हैं। आशा भोसले का नाम गिनीज़ बुक में दर्ज है, मैडम तुसाद के म्यूजियम में आशा का वैक्स स्टेचू शामिल है। दुनिया की 100 प्रभावशाली महिलाओं में सम्मिलित हो चुकी हैं। दादा साहब फाल्के पुरुस्कार, पद्म विभूषण और सैकड़ों अवॉर्ड्स, मुंबई के पेड्डर रोड स्थित उनके घर की दीवारों पर सज चुके हैं।
खास बात यह है कि आशा जी के बच्चों में से किसी ने संगीत या गायन को अपना करियर नहीं बनाया।पुत्री वर्षा एक सफल राजनीतिक स्तंभकार थीं। उन्होंने बचपन में कुछ फिल्मों में गाया भी था मगर अपनी मां और मौसी से तुलना होने के डर से वर्षा ने संगीत छोड़कर लेखन को अपनाया। उनकी असमय मृत्यु से आशा जी को बहुत भारी सदमा लगा था।
इधर पुत्र हेमंत ने कुछ मधुर गीतों की रचना की मगर फिल्म इंडस्ट्री के बहरे प्रोड्यूसर्स और उनकी घटिया समझ की वजह से संवेदशील हेमंत ने कुछ 20 हिंदी फिल्में और कुछ मराठी गीत रचने के बाद संन्यास ले लिया था और स्कॉटलैंड में बस गए थे। उनकी मृत्यु 4 साल पहले कैंसर की वजह से हुई।
घर में सबसे छोटे और लाडले, आनंद भोसले अधिकांश समय दुबई में रहते थे। आशा जी ने उन्हें ज़िद कर के बिज़नेस मैनेजमेंट की शिक्षा दिलाई और और वे कई सालों से आशा जी के मैनेजर बनकर काम कर रहे हैं।
लता की परछाई से आशा तो निकल आई मगर आशा जी के अपने बच्चों ने मायानगरी की हकीकत को बहुत करीब से देखा और अपनी मां के जीवट की रोज़ परीक्षा होते हुए देखा, इसलिए वो इन सबसे दूर हो गए। लोग इसे विडम्बना कहते हैं मगर मैं सोचता हूं कि मां अपने बच्चों की रक्षा के लिए ईश्वर से लड़ जाती है और आशा ने शायद यही किया है।
दुःख से भरे जीवन का बोझ लेकर चलने में बड़े-बड़े तुर्रम खान फ़ैल हो जाते हैं, दम तोड़ देते हैं मगर, दुखों का महासागर अपने कांधे पर लेकर आशा भोंसले जैसी गायिका, हिंदुस्तान की ऐसी थाती है, ऐसी धरोहर जिसे आप और हम नहीं बचाएंगे।
ये तो वो आवाज़ है जिसका जिस्म हर बार एक नए रूप में पुनर्जन्म लेता रहेगा। 4 पीढ़ियों से आशा जी की आवाज़ जवान है, बस अभी गाना शुरू किया है की फीलिंग के साथ है। मगर आशा, सिर्फ आशा है।मुस्कुराती है और अपने जीवन को यूं बयां करती है....पंडित भरत व्यास द्वारा लिखे और पद्मभूषण श्री निखिल घोष (बांसुरीवादक पन्नालाल घोष के छोटे भाई) द्वारा कंपोज़ किए इस गाने से
गीत कितने गा चुकी हूं इस सुखी जग के लिए
आज रोने दो मुझे पल एक अपने भी लिए।
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