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हनुमान जन्मोत्सव विशेष: हनुमान नाम ही उत्साहवर्धन करने वाला है..!

Sat, 16 Apr 2022 11:18 AM IST
Anuraag Sharma अनुराग शर्मा
Updated Sat, 16 Apr 2022 11:18 AM IST
सार

पूरा भारतीय वाङ्मय हनुमान जी से श्रेष्ठ और समर्पित भक्त/सेवक किसी को नहीं मानता। संस्कृत साहित्य में हनुमान जी के दर्शन सबसे पहले वाल्मीकि रामायण के किष्किंधा काण्ड में होते हैं। महर्षि वाल्मीकि हनुमान जी को महानुभाव (सम्मानीय), दुरासद (जिन्हें सरलता से नहीं जीता जा सकता) और भीम (शक्तिशाली) कहते हैं।

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Hanuman janmotsav 2022 Special Heroic Characteristics of Lord Hanuman
हनुमान जी देवांश हैं। उन्हें वायुपुत्र माना गया है। इसलिए, उन्हें समीरज, ईरज, मारुतात्मज, वातात्मज और पवनात्मज जैसे नाम भी दिए गए हैं।  - फोटो : iStock

विस्तार

पूरा भारतीय वाङ्मय हनुमान जी से श्रेष्ठ और समर्पित भक्त/सेवक किसी को नहीं मानता। हनुमान नाम ही उत्साहवर्धन करने वाला है। जब-जब भारतीय जनमानस निराशा के अंधकार में डूब रहा था तब हनुमान जी के चरित्र ने उसे आशा की नई किरण दिखाई।

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मातृभूमि से हजारों किलोमीटर दूर गन्ने के खेतों में काम करने वाले विवश गिरमिटिया मजदूरों को हनुमान जी का ही संबल था। स्वाधीनता समर में अंग्रेजों से बचते हुए, चंद्रशेखर आजाद जैसे क्रांतिकारी भी हनुमान मंदिर में पुजारी बनकर रहे थे।
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हनुमान जी को शारीरिक और बौद्धिक बल का देवता मान कर गांव-गांव पूजा गया है।

 
संस्कृत साहित्य में हनुमान जी के दर्शन सबसे पहले वाल्मीकि रामायण के किष्किंधा काण्ड में होते हैं। पंपा सरोवर से ऋष्यमूक पर्वत की ओर दो तपस्वियों को आते देख सुग्रीव बेचैन हो जाते हैं। तब संवाद में कुशल (वाक्यविद्) हनुमान उन्हें भरोसा दिलाते हैं कि उन्हें यहां वाली से खतरा नहीं है। सुग्रीव हनुमान को साधारण वेश में जाकर यह पता लगाने को कहते हैं कि राम-लक्ष्मण यहां क्यों आए हैं।

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महर्षि वाल्मीकि हनुमान जी को महानुभाव (सम्मानीय), दुरासद (जिन्हें सरलता से नहीं जीता जा सकता) और भीम (शक्तिशाली) कहते हैं।
 
वहीं महाकवि भट्टि हनुमान जी को शर्मद (सुख देने वाले) और शोक भगा देने वाला बताते हैं।

वे कहते हैं-
 

“(सुग्रीव ने उन हनुमान को दूत बनाया) जिनकी वेषभूषा से विश्वास जगता है, जो पथ जानते हैं, सतर्क हैं, और उनका मन जानते हैं जो विजय चाहते हैं।”

 
(विश्वासप्रदवेषोऽसौ पथिप्रज्ञः समाहितः।
चित्तसंख्यो जिगीषूणामुत्पपात नभस्तलम्॥
भट्टि काव्य)

हनुमान जी देवांश हैं। उन्हें वायुपुत्र माना गया है। इसलिए, उन्हें समीरज, ईरज, मारुतात्मज, वातात्मज और पवनात्मज जैसे नाम भी दिए गए हैं। 
 
उनकी बुद्धिमता को भगवान राम कुछ ही क्षण में पहचान लेते हैं। 

वे लक्ष्मण से कहते हैं-

"जिसे ऋग्वेदकी शिक्षा नहीं मिली, जिसने यजुर्वेद का अभ्यास नहीं किया तथा जो सामवेद का विद्वान् नहीं है, वह इस प्रकार सुन्दर भाषा में वार्तालाप नहीं कर सकता.!’

( “नानृग्वेदविनीतस्य नायजुर्वेदधारिणः ।
नासामवेदविदुषः शक्यमेवं विभाषितुम् ॥”)

वे आगे कहते हैं- 

"हृदय, कण्ठ और मूर्धा - इन तीनों स्थानों से स्पष्टरूप से अभिव्यक्त होने वाली हनुमान की इस विचित्र वाणी को सुनकर किसका चित्त प्रसन्न न होगा। वध करने के लिये तलवार उठाये हुए शत्रुका हृदय भी इस अद्भुत वाणी से बदल सकता है॥"
 

(अनया चित्रया वाचा त्रिस्थानव्यञ्जनस्थया।
कस्य नाराध्यते चित्तमुद्यतासेररेरपि ॥)

Hanuman janmotsav 2022 Special Heroic Characteristics of Lord Hanuman
हनुमान जन्मोत्सव 2022: घोर निराशा से जूझ रहा मन भी किष्किन्धा काण्ड के अंतिम दो सर्ग पढ़कर उत्साह से पूर्ण हो सकता है। - फोटो : अमर उजाला

हनुमान जी महाप्राज्ञ (महान बुद्धिमान) हैं। वे भी भगवान राम और लक्ष्मण को देखकर समझ जाते हैं कि इनसे ही सुग्रीव के काम की सिद्धि हो सकती है। 
 
राम और सुग्रीव की मित्रता करवाने में हनुमान महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वाली वध के बाद जब सुग्रीव कर्त्तव्य भूलते दिखते हैं, हनुमान ही सुग्रीव को समझाते हैं कि उन्हें राम काज में देरी नहीं करना चाहिए।
 

घोर निराशा से जूझ रहा मन भी किष्किन्धा काण्ड के अंतिम दो सर्ग पढ़कर उत्साह से पूर्ण हो सकता है। जाम्बवान हनुमान जी को उनकी शक्ति याद दिलाते हैं। वे कहते हैं कि हनुमान सभी शास्त्रों को जानते (सर्वशास्त्रविद) हैं, तेज और शक्ति में राम-लक्ष्मण के बराबर हैं और उनके कंधों का बल गरुड की तरह है। 

 
लंका में हनुमान अपनी बुद्धि और बल का भरपूर परिचय देते हैं। वे नीतिज्ञ हैं। हनुमान अशोक वाटिका उजाड़कर और लंका दहन कर न केवल शत्रु का दमन कर देते हैं (अरिंदम), बल्कि रावण और समूची लंका की सत्ता और जनता का मनोबल तोड़ देते हैं और श्रीराम में सीता माता का विश्वास भी और दृढ़ कर देते हैं।
 
राम काज कर हनुमान वापस सागर लांघ लेते हैं। इन कर्मों के कारण वे जग प्रसिद्ध (विश्राव्य) हो गए हैं। युद्धभूमि में भगवान राम और लक्ष्मण पर बार-बार आए संकटों को भी हनुमान ही हरते हैं। 
 
महाभारत में भी वे सत्य का साथ देते हैं और अर्जुन की ध्वजा पर विराजते हैं, इसी कारण उन्हें पार्थध्वज कहा गया।  अष्ट सिद्धि और नौ निधियों वाले हनुमान को हनुमान सहस्रनाम में सौ शक्तियों वाला या सौ यज्ञ करने वाला (शतक्रतु) कहा गया है। 
 
हनुमान जी का चरित्र सेवा, समर्पण और त्याग का सर्वोच्च उदाहरण दिखलाई पड़ता है। वे कल्याणस्वरूप (स्वस्तिमान्) हैं। वे राम के भक्तों के परम मित्र (सुहृत) भी हैं। 
 
सीता माता तो उनमें बुद्धि के आठों गुणों की उपस्थिति बताती हैं। सुनने की इच्छा, सुनना, ग्रहण करना, स्मरण रखना, तर्क-वितर्क, सिद्धांत का निश्चय, अर्थ का ज्ञान और तत्त्व को समझना ये आठ बुद्धि के गुण हनुमान जी में हैं।
 
उनमें करुणा का भाव भी है इसलिए उनका एक नाम कारुण्य है। रामचरितमानस में वे राम से कहते हैं, “सीता कै अति बिपति बिसाला बिनहिं कहें भली दीनदयाला (सीता की विपत्ति बहुत विशाल है, उसे न ही कहूं तो अच्छा है, हे दीनदयाल!)”
 
भगवान राम भी उनके सहयोग को नहीं भूलते, वे इस बुंदेली लोकगीत में कहते हैं, “सुनो भैया लक्ष्मण, होते न हनुमान तो पाउते न जानकी।”
 
भगवान राम के संकटों का अंत करने वाले संकटमोचक हनुमान सबके संकट हरें।


अनुराग शर्मा की शब्दों के उद्गम, हिन्दू नामों, और भारतीय संस्कृति में गहरी रुचि है। फ़ेसबुक पर facebook.com/HinduNamesOnline, YouTube पर उनके चैनल HinduNames और ट्विटर पर @Hindihainham हैंडल पर सम्पर्क किया जा सकता है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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