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टीएन शेषन–ज्ञानेश कुमार: एक के दौर में बदली पहचान, दूसरे के दौर में क्यों उठे सवाल!

सार

टीएन शेषन 10वें और ज्ञानेश कुमार 26वें मुख्य चुनाव आयुक्त हैं। शेषन ने देश को CEC की ताकत दिखाई, जबकि ज्ञानेश कुमार के दौर में उसी पद की शक्ति के इस्तेमाल और फैसलों पर सवाल उठ रहे हैं। शेषन ने बूथ लूट, फर्जी मतदान और चुनावी हिंसा पर नकेल कसने से लेकर आचार संहिता को जमीन पर उतारने तक चुनाव की तस्वीर बदली; आज SIR, मतदाता सूची और आयोग की निर्णय प्रक्रिया को लेकर विवाद है।

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Gyanesh Kumar Identity transformed during one's tenure; why did questions arise during the other's
ज्ञानेश कुमार, मुख्य चुनाव आयुक्त - फोटो : PTI

विस्तार

भारत में मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संविधान बनने के साथ ही अस्तित्व में आ गया था। अधिकार भी थे और जिम्मेदारियां भी। लेकिन आम मतदाता के बीच इस पद की ताकत का अहसास किसे था? शेषन से पहले नौ मुख्य चुनाव आयुक्त इस पद पर रह चुके थे, मगर उनका नाम आम राजनीतिक चर्चा का हिस्सा नहीं बना।

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12 दिसंबर 1990 को देश के 10वें मुख्य चुनाव आयुक्त बने टीएन शेषन ने तस्वीर बदल दी। उन्होंने चुनाव आयोग को सिर्फ चुनाव कराने वाली संस्था के बजाय चुनावी व्यवस्था पर निगरानी रखने वाली प्रभावशाली संवैधानिक संस्था के रूप में सामने रखा।
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आयोग के आधिकारिक दस्तावेज भी उनके कार्यकाल में मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट के कठोर क्रियान्वयन और चुनाव पर्यवेक्षकों की भूमिका बढ़ने को रेखांकित करते हैं। यही वह दौर था जब देश ने जाना कि मुख्य चुनाव आयुक्त चाहे तो राजनीतिक दलों को भी चुनावी नियमों के सामने झुका सकता है।
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बिहार में बूथ लूट और हिंसा पर लगाम

शेषन का दौर ऐसे समय आया जब चुनावों में बाहुबल, बूथ कैप्चरिंग, फर्जी मतदान और हिंसा बड़े सवाल थे। खासकर बिहार के चुनावों की बदनामी देशभर में थी। शेषन ने इसे चुनावी व्यवस्था की मजबूरी मानने से इनकार किया। उनके कार्यकाल में जहां गड़बड़ी की आशंका गंभीर थी, वहां मतदान स्थगित या रद्द करने जैसे कदम उठाए गए। सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत किया गया और चुनाव प्रक्रिया की निगरानी बढ़ाई गई। 

शेषन का संदेश साफ था बूथ पर कब्जा करने वाला कितना भी ताकतवर क्यों न हो, चुनाव आयोग उससे बड़ी संवैधानिक ताकत है। यही कारण था कि शेषन का नाम सिर्फ चुनाव आयोग के दफ्तर तक सीमित नहीं रहा। गांव के मतदाता से लेकर दिल्ली के सत्ता गलियारों तक उनकी चर्चा होने लगी।

मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट को कागज से मैदान तक पहुंचाया

आज चुनाव आते ही मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट यानी आचार संहिता की चर्चा आम बात है। लेकिन इसे चुनावी राजनीति की वास्तविक ताकत बनाने में शेषन के दौर की बड़ी भूमिका रही। आयोग के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, शेषन की रणनीति आचार संहिता को कठोरता से लागू करने के साथ उसका व्यापक प्रचार करने की थी।

सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग से लेकर चुनाव प्रचार के तौर-तरीकों तक पर निगरानी बढ़ी। नेताओं और उम्मीदवारों को यह संदेश मिला कि चुनाव के दौरान सत्ता में होना नियमों से ऊपर होने का अधिकार नहीं देता।

काफिलों और गाड़ियों पर भी लगाम

शेषन की सख्ती सिर्फ बड़े संवैधानिक मुद्दों तक सीमित नहीं थी। चुनाव प्रचार की पूरी संस्कृति को नियमों के दायरे में लाने की कोशिश हुई। उम्मीदवारों के खर्च, वाहनों के इस्तेमाल और चुनाव प्रचार में सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग पर निगरानी बढ़ी।

आज मतदान के दिन वाहनों के इस्तेमाल को लेकर जो विस्तृत नियम दिखाई देते हैं, उनकी राजनीतिक स्वीकार्यता की जमीन भी उसी दौर में मजबूत हुई। सवाल यह था कि क्या चुनाव गरीब और सामान्य उम्मीदवार के लिए भी वही होना चाहिए जो बड़े राजनीतिक दल और धनबल वाले उम्मीदवार के लिए है? शेषन का जवाब कार्रवाई के जरिए सामने आया।

फोटो पहचान-पत्र और चुनाव पर्यवेक्षक

फर्जी मतदान पर रोक के लिए फोटो मतदाता पहचान-पत्र की दिशा में भी शेषन के कार्यकाल में निर्णायक पहल हुई। शुरुआत में इसका विरोध हुआ, लेकिन आगे चलकर फोटो पहचान-पत्र चुनावी व्यवस्था का अहम हिस्सा बना। इसी तरह चुनाव पर्यवेक्षकों की भूमिका को भी मजबूत किया गया। 

चुनाव आयोग के आधिकारिक इतिहास के अनुसार, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने की कोशिश में पर्यवेक्षकों की भूमिका बढ़ी और 1996 में उन्हें वैधानिक आधार मिला। अर्थात शेषन की विरासत सिर्फ ‘सख्त अफसर’ की नहीं थी। उन्होंने चुनाव आयोग की संस्थागत क्षमता को जमीन पर उतारने की कोशिश की।

फिर 26वें CEC ज्ञानेश कुमार सुर्खियों में आए

करीब तीन दशक बाद मुख्य चुनाव आयुक्त का पद फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में है। ज्ञानेश कुमार देश के 26वें CEC हैं। लेकिन इस बार कहानी अलग है। उनके कार्यकाल में सबसे बड़ा विवाद SIR यानी Special Intensive Revision को लेकर खड़ा हुआ। मतदाता सूची को शुद्ध करना और अपात्र या गलत नामों को हटाना चुनाव आयोग की जिम्मेदारी का हिस्सा है। लेकिन SIR की प्रक्रिया, नामों को जोड़ने-काटने, नए मतदाताओं के लिए दस्तावेजी शर्तों और आयोग की निर्णय प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल उठे।

सितंबर 2026 में Indian Express की एक जांच में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के फैसलों पर लिखित आपत्तियां दर्ज कीं। रिपोर्ट में नए मतदाताओं को जोड़ने, नाम हटाने और मतदाता डेटा से जुड़े फैसलों पर भी सवालों का उल्लेख किया गया।
 
फॉर्म-6 से लेकर SIR तक विवाद

सबसे चर्चित विवादों में नया Form-6 भी शामिल रहा। यह नए मतदाताओं के नाम जोड़ने के लिए इस्तेमाल होता है। रिपोर्ट के मुताबिक इसमें SIR से जुड़े सवाल जोड़े गए, जिनमें पुराने चुनावी रोल में आवेदक, माता-पिता या दादा-दादी के नाम से संबंधित जानकारी मांगी गई। दोनों चुनाव आयुक्तों ने इसे कथित तौर पर ‘illegal’ और ‘unauthorised’ बताते हुए आपत्ति जताई।

यहां विवाद सिर्फ फॉर्म का नहीं था। सवाल यह बना कि मतदाता बनने की प्रक्रिया कितनी सरल होनी चाहिए और चुनाव आयोग प्रशासनिक प्रक्रिया में कितनी दूर तक बदलाव कर सकता है?

आयोग का पक्ष भी सामने है

लेकिन तस्वीर का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। चुनाव आयोग ने इन आपत्तियों के अस्तित्व से इनकार नहीं किया, लेकिन कहा कि अलग-अलग राय निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा हैं और पिछले एक वर्ष में आयोग के सभी निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए। इसलिए इन आरोपों को अंतिम निष्कर्ष की तरह पेश करना उचित नहीं होगा। विवाद का वास्तविक परीक्षण अब कानूनी और संस्थागत स्तर पर हो रहा है।

5 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने CEC ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली और SIR से जुड़े मामले में नोटिस जारी किया। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि कुछ महत्वपूर्ण निर्णय अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना लिए गए; हालांकि अदालत ने तत्काल CEC को पद से हटाने या निलंबित करने की मांग स्वीकार नहीं की। 

शेषन के समय सवाल था आयोग कितना ताकतवर है?

यहीं दोनों CEC की कहानी का सबसे बड़ा अंतर सामने आता है।

शेषन के दौर में सवाल था क्या चुनाव आयोग राजनीतिक दलों और सरकारों पर प्रभावी लगाम लगा सकता है? उन्होंने बूथ कैप्चरिंग, फर्जी मतदान, हिंसा, आचार संहिता के उल्लंघन और चुनावी अनियमितताओं पर कार्रवाई करके आयोग की ताकत दिखाई।

ज्ञानेश कुमार के दौर में सवाल बदल गया है

आयोग अपनी इतनी बड़ी शक्ति का इस्तेमाल किस प्रक्रिया से कर रहा है? SIR के जरिए मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर बदलाव, नए मतदाताओं से जुड़ी प्रक्रिया और आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों ने बहस को चुनावी अनुशासन से आगे बढ़ाकर पारदर्शिता, सामूहिक निर्णय और संस्थागत भरोसे तक पहुंचा दिया है।

एक ने पद को ताकत से पहचान दिलाई, दूसरे ने फैसलों से सुर्खियां बटोरीं

यही इस पूरी तुलना का सबसे दिलचस्प पहलू है। शेषन ने मुख्य चुनाव आयुक्त के पद को आम भारतीय की राजनीतिक शब्दावली में ला दिया। उन्होंने दिखाया कि संविधान में दर्ज शक्तियों का इस्तेमाल अगर सख्ती से किया जाए तो चुनावी व्यवस्था के तौर-तरीके बदले जा सकते हैं।

ज्ञानेश कुमार के दौर में वही पद फिर चर्चा में है, लेकिन चर्चा का केंद्र SIR, मतदाता सूची और आयोग की निर्णय प्रक्रिया है। इसलिए सवाल शेषन बनाम ज्ञानेश का नहीं, उस पद की बदलती भूमिका का है। शेषन ने CEC की ताकत दिखाई थी; ज्ञानेश कुमार के दौर ने उसी ताकत के इस्तेमाल की प्रक्रिया और पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

तीन दशक पहले बहस थी CEC कितना ताकतवर हो सकता है? आज बहस है उस ताकत का इस्तेमाल कैसे हो रहा है और उस पर भरोसा कैसे कायम रहेगा? यही फर्क टीएन शेषन और ज्ञानेश कुमार को एक साथ चर्चा में लाता है एक ने चुनाव आयोग को ताकत का चेहरा बनाया, दूसरे के दौर में चुनाव आयोग की ताकत ही बहस का विषय बन गई।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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