इस देश में भूलकर भी बिना मांगे ना करना महिलाओं की मदद, वरना पड़ जाएंगे मुश्किल में
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महिलाओं को प्राथमिकता देते हुए बसों या मेट्रो में उठ खड़ा होना भारतीय शिष्टाचार का हिस्सा है। इससे महिलाओं को सम्मान और तवज्जो देने से जोड़कर देखा जा सकता है। लेकिन स्वीडन में ऐसा नहीं है। संभव है कि आपके ऐसा करने से यहां किसी महिला को बुरा लग जाए। यहां के लिए यह इंप्रेसिव तरीक़ा नहीं माना जाएगा, क्योंकि समानता के अधिकार ने ऐसी चीज़ों के यहां के समाज से बाहर कर दिया है।
हालात ये हैं कि गर्भवती महिला हो या बुज़ुर्ग महिला अगर उनके कहे बग़ैर आपने सफ़र में अपनी जगह देने की कोशिश की तो यह उन्हें नागवार गुजरेगा। इसके पीछे उनके अपने तर्क भी हैं। यहां की महिलाएं मानती हैं कि अगर सहायता की ज़रूरत है तो उसे मांगने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन बेवजह किसी की मदद करना उनकी क्षमता पर शक करना माना जा सकता है। यही वजह है कि भारत समेत कई दूसरे विकासशील देशों से आई महिलाओं को ऐसी चीज़ें असहज कर देती हैं।
भारत और स्वीडन के समाज में है ये अंतर
दरअसल, हमारे यहां कोई महिलाओं की सीट पर नहीं बैठता और अगर बैठता है तो महिला के आते खड़े हो जाते हैं। लेकिन स्वीडन में प्रायरिटी सीट होती है, जिसमें विकलांग, बुज़ुर्ग, गर्भवती महिलाओं और दूसरे ज़रूरतमंदों को माना जाता है, इसलिए अगर महिला ने किसी से बैठने के लिए जगह नहीं मांगी तो उनके लिए खुद खड़े हो जाने की ज़रूरत नहीं है।
सार्वजनिक वाहनों में बैठने वाली अधिकतर जनता अपने मोबाइल में व्यस्त मिलेगी। आपको यह देखकर हैरानी होगी कि सब के सब फ़ोन में अति व्यस्त हैं। इतने कि उनके बग़ल में कौन बैठ रहा या सामने क्या हो रहा है इसका इल्म तक नहीं।
हालांकि मोबाइल फ़ोन में खो जाने वाले इनके तरीके की आलोचना भी ख़ूब होती है। लेकिन ऐसा करने वालों के भी अपने तर्क हैं। उनका मानना है कि बेवजह लोगों को घूरना, इधर उधर ताका-झांकी करने से बेहतर है कि समय मिलते ज़रूरी काम निपटा लिया जाए, या फिर कोई प्रिय आलेख, समाचार जैसी ज्ञानवर्धक चीज़ों पढ़ने में समय निकाला जाए। इंटरनेट की दुनिया में ऐसे कई ऐप हैं जिनकी मदद से आप रोज़मर्रा के काम आसानी से निपटा सकते हैं।
इन सबके अलावा अपने दोस्तों, रिश्तेदार व क़रीबियों के हालचाल लेने के लिए यह अच्छा समय होता है। यही वजह है कि सार्वजनिक स्थलों या वाहनों में ज़्यादातर लोग अपने फ़ोन में खिटपिट करते नज़र आएंगे। इनमें महिलाओं की संख्या ज्यादा होती है। आपको बता दूं कि यहां के लोग कहीं जाने आने के लिए ऑनलाइन समय सारणी देखकर ही कहीं आना जाना पसंद करते हैं।
बहुत अलग तरह से सोचते हैं लोग
मसलन आपकी मेट्रो अगर आठ मिनट में आने वाली है और मेट्रो स्टेशन तक की दूरी तीन मिनट में तय की जा सकती है तो इतने समय को ध्यान में रखकर लोग सफ़र के लिए निकलेंगे, ताकि समय की ज्यादा बर्बादी नहीं हो। इसी तरह घर के ज़रूरत के सामानों की ख़रीदारी, क़ीमतों की तुलनात्मक जानकारी, सैलून जाने से लेकर लोगों से मिलने तक के अपॉइंटमेंट बुक करने तक के काम रास्ते में ही निपटा लिए जाते हैं।
सार्वजनिक स्थलों में मोबाइल के ज्यादा इस्तेमाल करने वाली महिलाओं का एक तर्क यह है कि अगर इससे जुड़े ज़्यादातर काम रास्ते में ही निपट जाएं तो परिवार या अपने क़रीबियों के साथ समय गुज़ारते हुए मोबाइल पर टाइम बर्बाद करने की ज़रूरत नहीं है। स्वीडन में सफ़र के दौरान ऐसे कामों में समय का सदुपयोग करना स्मार्ट वर्क का हिस्सा माना जाता है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।