गांधी जयंती विशेष: प्रतिरोध की राजनीति के बीच गांधी की प्रासंगिकता
गांधी जी के राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले की भी यही सीख थी कि देश की राजनीति में हर आदमी को रुचि लेना चाहिए, ताकि राजनीति को आधात्मिक रास्ते पर ले जाया जा सकें। गांधी का राजनीति में आना एक तरह राजनीति को आध्यात्मिक राह पर ले जाने का ही एक प्रयास है।
विस्तार
आज से (2अक्टूबर 1869 ई) 152 साल पहले जन्मे महात्मा गांधी की प्रासंगिकता का सवाल बार-बार हमारे सामने इसलिए आता है क्योंकि उनकी सोच, अपने जीवन के साथ किए उनके प्रयोग, देश समाज और उनके राजनीतिक संघर्ष में, आज भी ऐसा कुछ न- कुछ प्रासंगिक मिल ही जाता है- जिसको आमने-सामने रखकर हम सवाल कर सकते हैं।
अपने समय-समाज की जांच-परख और शिनाख्त करने का साहस-दुःसाहस भी कर सकते हैं। गांधी जी का अपने जीवन के साथ प्रयोग, जन्म काल से 30 जनवरी 1948 को हत्या होने तक निरन्तर चलता रहा। इस दौरान वे दक्षिण अफ्रीका, लंदन और भारत में भी अपने तमाम रचनात्मक परियोजनाओं को अमलीजामा पहनाते हुए अपने हत्यारों से मिलते-पहचानते और माफ करते हुए बेफिक्र और निर्द्वंद भाव से आगे बढ़ते रहे। अपनी पूरी राजनीतिक यात्रा में सत्य, अहिंसा, और सत्याग्रह को एक व्रती की तरह अपनाते हुए अकेले निकलने का साहस अपने समय में किसी राजपुरुष में था, तो वह थे-महात्मा गांधी ।
'अ ट्रिब्यूट टू गांधी' पर लिखे अपने लेख में थॉमस मर्टन कहते हैं-
गांधी का सत्य आध्यत्मिकता पर आधारित है, जिसमें हिन्दू, बौद्ध, ईसायत, इस्लाम ,यहूदी सभी साझा करते हैंः यह प्रज्ञा कि 'सत्य हमारे होने की अंदरूनी विधि है' और अहिंसा भी इसी आध्यामिक परम्परा से ली गई है, जिसे हम पूरब और पश्चिम की साझा परम्परा के रूप में देख सकते है।
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गांधी जी के राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले की भी यही सीख थी कि देश की राजनीति में हर आदमी को रुचि लेना चाहिए, ताकि राजनीति को आधात्मिक रास्ते पर ले जाया जा सकें। गांधी का राजनीति में आना एक तरह राजनीति को आध्यात्मिक राह पर ले जाने का ही एक प्रयास है। उनके लिए राजनीति सत्य को कार्य रूप में अमलीजामा पहनाने का एक का माध्यम है। प्रेम, करुणा और आस्था पर आधारित अहिंसा, उप-जातीय समाज के सबसे कमजोर और वंचित तबके के लिए प्रतिरोध का एक हथियार है।
आज विडम्बना देखिए कि 'गांधी का सत्य ' राजनीति में तीन-तिकड़म,झूठ -फरेब, धोखाधड़ी-वादा खिलाफी का 'प्लेटफॉर्म ' बन गया है। हालांकि गांधी की राजनीति में भी 'राजनीतिक चतुराई, सत्ता प्रतिष्ठानों पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की उनकी रणनीति कम असरदार नहीं है।
किसी विपरीत परिस्थिति में कौन सा राजनीतिक कार्यक्रम जनता के मिजाज को गहराई तक प्रभावित कर सकता है, इसकी गांधी सरीखा समझ आज तक किसी नेता में नहीं है। शायद इसलिए कि बहुत से राजनेता -राजनीति को समाज सेवा के बजाय अपने परिवार और अपनी सुख-सुविधा के अलावा अल्पकालिक तौर ही अपनाते और इस्तेमाल करते हैं। शायद इस वजह से ही
चार्ल्स दि गाल को कहना पड़ा -
राजनीति एक गंभीर मसला है, इसे सिर्फ राजनेताओं के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।" सत्ता को ही राजनीति का अंतिम पायदान मानने वाले राजनेताओं के लिए गांधी की यह सीख है कि 'सत्ता केवल सेवा का माध्यम है। इससे ज्यादा कुछ नहीं।' क्या आज 'सत्तातुर' राजनेताओं के लिए गांधी के इस सीखवान से कोई सबक मिल सकता है?
बीएचयू में दिखा था गांधी का तेवर
गांधी अपने जीवन के अंतिम समय तक अनाशक्त भाव से राजनीति से जुड़े रहे, तब भी जब उनकी लगभग अनदेखी करते हुए भारत का विभाजन हुआ और कांग्रेस के अंदर ही उनकी बात सुनने और मानने वाला कोई नहीं था। दक्षिण अफ्रीका से भारत आने पर अपने राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले की सलाह पर पूरे एक साल तक वे पूरे भारत का दौरा करते रहे।
6 फरवरी 1916 को बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के स्थापना समारोह के अपने पहले सार्वजनिक भाषण में ही गांधी ने अपने विद्रोही तेवर का अहसास करा दिया। समारोह में उपस्थित राजाओं के चमचमाते गहनों से लेकर वायसराय हार्डिंग की सुरक्षा में लगे खुफिया और पुलिस की मौजूदगी को जमकर लताड़ा। नतीजतन राजा-महाराजाओं ने वहां से निकल जाना ही बेहतर समझा।
इस भाषण में महात्मा गांधी ने देश के किसानों के हालात को बयां करते हुए कहा कि देश के किसानों की खुशहाली के बिना भारत की समृद्धि की कल्पना नहीं किया जा सकती है। बनारस के विश्वनाथ मंदिर के आसपास और गलियों में फैलीं गंदगी को देखकर वे काफी विचलित हुए। इसके बाद सफाई को अपने स्वराज अभियान का हिस्सा बना दिया।
इस अभियान को ही 2 अक्टूबर 2019 को गांधी जी के 150वीं जयंती के अवसर पर "स्वच्छ भारत मिशन" को कार्य रूप में परिणित करने की कोशिश शुरू हुई।
गांधी जी के जीवन में विद्रोही तेवर के बीज तो बचपन में ही पड़ चुके थे। जिन वजहों से गांधी को ये विद्रोही तेवर अख्तियार करना पड़ा, वे घटनाएं ही दरअसल गांधी को बाद के सार्वजनिक जीवन में स्वाभिमानी, दूसरों से अलग और महान बनाती हैं। वह चाहे खानपान में मांस भक्षण और सोमपान का मामला हो, बचपन में ही अपने से बड़ी उम्र की कस्तूरबा के साथ शादी होने की वजह से कामजनित आवेग में अपने बीमार पिता के अंतिम समय में बरती गयी असावधानी हों,अथवा 'जाति से निकाले जाने ' का जोखिम लेते हुए भी सन् 1888 में बैरिस्टरी की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड जाना हो। ये सारी घटनाएं गांधी के सार्वजनिक जीवन को एक नया मोड़ देती हैं।
बापू के जीवन की बड़ी घटना
सन 1893 में दक्षिण अफ्रीका की पहली यात्रा में ही गांधी को रेल का प्रथम श्रेणी का टिकट होने के बावजूद अंग्रेजों की 'रंगभेदी नीति 'का सामना करना पड़ा। गांधी को रेल के डिब्बे से समान समेत 'मैरिटजवर्ग' रेलवे स्टेशन पर बाहर निकाल दिया गया। उस वक्त गांधी अगर मन मसोस कर भारत लौट आते, तो शायद गांधी 'वो' नहीं होते जो दक्षिण अफ्रीका में टिककर, अंग्रेजों की 'रंगभेदी नीति' के विरुद्ध मुहिम छेड़कर और उसे अहिंसक संघर्ष के जरिए परास्त कर, गांधी बने।
दक्षिण अफ्रीका में गांधी की बनी इस छवि ने ही दुनिया के सामने उनकी एक ऐसी नजीर को पेश किया, जो मार्टिन लूथर किंग जूनियर , नेल्सन मंडेला और हाल में जॉर्ज लॉयड के साथ बरते गए अमरीकी प्रशासन की हिंसक और नस्ल विरोधी अभियान में भी काम आया।
जब बापू के मॉब लिंचिंग की रची गई थी साजिश
जिस भीड़ हत्या की चर्चा अपने देश के कभी-कभार होती है, उसके पहले शिकार शायद भारतीय राजनेताओं में गांधी ही हुए है। बात 18 दिसम्बर 1896 की है। तब गांधी 'रायटर ' न्यूज़ एजेंसी के एक सत्याभाषी (पोस्ट ट्रूथ) खबर के झूठ का शिकार हुए। ठीक वैसे ही जैसे महाभारत में अश्वत्थामा की झूठी मौत की सूचना फैलाकर महारथी 'द्रोण' की हत्या की गई। 'रायटर' की खबर के मुताबिक गांधी भारत से 'नेडेरी जहाज' से पांच सौ से ज्यादा भारतीयों को ले जाकर ब्रितानी हुक़ूमत के विरुद्ध विद्रोह की योजना बना रहे हैं।
यह महज संयोग था कि ठीक उसी समय गांधी भी 'कोरलैंड जहाज' से अपने परिवार के दूसरे सदस्यों के साथ नटाल के डरबन बंदरगाह पर पहुंचे थे। इस ख़बर का असर यह हुआ कि गांधी और भारतीयों को डरबन के किसी भी तट पर नहीं उतरने देने के लिए स्थानीय लोग लामबंद हो गए, तब नटाल के कार्यवाहक प्रधानमंत्री हैरी एस्काम्बे की पहली रणनीति यह थी कि गांधी को भीड़ के हवाले कर दिया जाए, जो उनकी हत्या कर दें।
दूसरा इससे स्थानीय लोगों को भारतीयों के खिलाफ गुस्से को हवा देकर आने वाला चुनाव जीतने में आसानी होगी। पर अपने यहां कहा गया है कि "जाको राखें सांईयां , मार सकें ना कोऊं।" एन वक्त स्थानीय पुलिस अधीक्षक की पत्नी जेनी अलेक्जेंडर ने अपने छाते के अंदर लेकर हत्यारी भीड़ से गांधी की जिंदगी बचायी।
यही हैरी एस्काम्बे कुछ दिन बाद में डरबन प्रवास के दौरान गांधी के पड़ोसी हो गए। एक दिन सड़क पार करते हुए अपने मौत के तीन घंटे पहले गांधी से मिले। एस्काम्बे ने डरबन में गांधी के आगमन के समय घटीं घटनाएं और एशिया विरोधी कानून के लिए माफी मांगी।
गांधी ने यह कहते हुए माफी दे दी कि "मेरे लिए ये तकरीरें वहीं छूट गयी, जब वे हुई थी।" बाद में एस्काम्बे के मूर्ति अनावरण के मौके पर गांधी ने कहा कि "मैं इस महान आदमी की निष्पक्षता और सदासयता के प्रति न्याय बरतना चाहता हूं।"
एक समय गांधी की हत्या के लिए भीड़ को उकसाने वाले इन्सान पर ऐसी रहमदिली गांधी जैसे महान आत्मा के ही बूते की बात थी। ऐसी दो और घटनाओं से दक्षिण अफ्रीका में गांधी का सामना हुआ, जब गांधी जी के हत्या के प्रयास हुए और बाद में वे हत्यारे गांधी के दोस्त बन गए।
दक्षिण अफ्रीका में नागरिकता संबंधी के एक अध्यादेश के तहत पहले तो हर भारतीय को पंजीयन करना और पंजीयन कार्ड को अपने साथ रखना अनिवार्य किया गया। हिंदुस्तानी इस अध्यादेश के विरोध के लिए जोहान्सबर्ग के पुराना इम्पीरियल थियेटर में इकट्ठा हुए। इसके विरोध स्वरूप पंजीयन न कराने का संकल्प लिया गया। इस शपथ के कोख से ही 11 सितंबर 1906 को ही 'सत्याग्रह' यानी अहिंसक प्रतिरोध का जन्म हुआ। इस सत्याग्रह को ही गांधी ने भारत क ब्रिटिश हुकूमत से 'छुटकारा' के ब्रह्मास्त्र के रूप में इस्तेमाल किया।
इस सत्याग्रह की एक शर्त यह है कि दुश्मन पर भी बार-बार धोखा खाने के बावजूद भरोसा करना। इस भरोसे का ही नतीजा था कि दक्षिण अफ्रीका में गांधी जनरल स्मट्स के इस झांसे में आ गए कि अगर कुछ लोग स्वेच्छा से पंजीयन करा लें तो यह कानून अपने आप खत्म हो जाएगा। पर बाद में यह कानून खत्म करने के बजाय और सख्ती से लागू हुआ।
गांधी ने जनरल स्मट्स पर भरोसा किया और स्मट्स से किए आश्वासन के तहत ही 10 फरवरी 1908 को जब गांधी अपना पंजीयन कराने के लिए निकलें, तो मीर आलम अपने साथियों के साथ खड़ा था। मीर आलम ने गांधी से पूछा कि कहां जा रहे है? गांधी ने कहा कि 'अपनी दसो अंगुलियों की छाप' देकर पंजीयन कराने। इस बीच गांधी के सिर पर किसी ने जोर से डंडे से प्रहार किया। गांधी 'हे राम' कहते हुए बेहोश होकर गिर गए।
गांधी के सहयोगी थंबी नायडू ने गांधी को बचाने की कोशिश की पर उनके सिर पर इतने प्रहार हुए कि जिंदगी भर उन्हें चक्कर आता रहा। बाद में मीर आलम को उसके साथियों के साथ गिरफ्तार किया गया। पर गांधी ने मीर आलम और उसके साथियों पर कोई मुकदमा नहीं करने की बात कहीं, वे सभी छूट गए।
असलियत जानने के बाद मीर आलम गांधी का जीवन रक्षक बन गया। दक्षिण अफ्रीका में अपना जान जोखिम में डालने वाले इन प्रयत्नों को अपनी पुस्तक 'दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह का इतिहास' में गांधी बताते हैं-
"ईश्वर जैसे मुझे सत्याग्रह के आचरण के लिए तैयार कर रहा था।" सत्याग्रह की दक्षिण अफ्रीका में आजमाइश और सफलता के बाद ही गांधी इस अचूक ब्रह्मास्त्र का इस्तेमाल भारत की आजादी के लिए करते है।
सत्याग्रह की असली परीक्षा चंपारण ( बिहार) में अंग्रेजों का निलहें किसानों पर किए जा रहें अत्याचार के विरोध में हुई। अंग्रेजों के किसानों पर जबरन 'तीन कठिया' खेती करने के दबाव के प्रतिरोध में इस आंदोलन का नेतृत्व गांधी ने किया। सत्याग्रह का असली रूप बिहार कांग्रेसी नेताओं को तब समझ आया, जब गांधी ने कानून की अवज्ञा के लिए खुद कानून के हवाले किया। गांधी के पहले ऐसी गिरफ्तारी की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था।
सत्याग्रह का एक और रूप देश के सामने तब सामने आया ' रौलट एक्ट' के विरोध में गांधी ने हड़ताल, पर्दशन, बहिष्कार का आह्वान किया। इस कानून के तहत ' बिना कोई अपील, बिना किसी दलील, बिना किसी वकील' के देश के किसी भी नागरिक को पाबंद करने और जेल भेजने की छूट थी।
गांधी के आह्वान पर शुरू यह आंदोलन पंजाब में हिंसक रूप ले लिया। सैफ़ुद्दीन किचलू और सतपाल डांग के नेतृत्व निकले जुलूस ने थाने फूंक दिया और पुलिस कर्मियों की हत्या कर दिया। गांधी ने ऐसी घटनाओं की जिम्मेदारी खुद पर लेते हुए घोषणा किया कि " अहिंसा के बिना उचित प्रशिक्षण की वजह से ऐसी घटनाएं घटित हुई।" इसे गांधी ने "अपनी हिमालय सरीखा भूल" की संज्ञा दी।
उत्तर प्रदेश के 'चौरी-चौरा' में हुई हिंसात्मक घटनाओं के बाद गांधी ने जब आंदोलन वापस लिया तो इसका कांग्रेस में और देश के दूसरे नेताओं के बीच खूब आलोचना हुई। पर गांधी की एक खूबी थी कि वे हर आंदोलन से सबक लेते है और उसके बाद आगे की भूमिका तय करते है। इसलिए उनका हर अगला आंदोलन पहले से बड़ा और प्रभावी हुआ।
सन 1924 के बाद वे कांग्रेस से अलग हुए और जब सन 1929 में जवाहर लाल नेहरू जब कांग्रेस के अध्यक्ष बनें तो कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज हासिल करने का लक्ष्य तो घोषित कर दिया। पर आगे इसे प्राप्त करने के लिए कांग्रेस को कोई प्रभावी कार्यक्रम सूझ नहीं रह था। यह जिम्मेदारी गाधी के कंधों पर डाली गई।
गांधी की एक खूबी यह भी थी कि हर आंदोलन के लिए वे ऐसा प्रतीक और नारा चुनते है, जिसका असर हर आम और खास पर एक तरह से हों। 12 मार्च 1930 साबरमती से दांडी के 'नमक सत्याग्रह' में ' नमक' एक ऐसा ही प्रतीक है।
इस आंदोलन का मखौल उड़ाते हुए 'स्टेट्समैन' अखबार ने टिप्पणी किया कि" ब्रिटिश साम्राज्य जैसे शक्तिशाली सत्ता प्रतिष्ठान से लड़ने के लिए 'नमक सत्याग्रह' ...आप चाहें तो इस पर हंस सकते हैं।" पर 'नमक सत्याग्रह' का असर इतने तक सीमित नहीं रहा कि बड़े पैमाने पर स्त्री-पुरूष जेल गए, लाठियां खायीं।
इसका असली प्रतिकात्मक विरोध तब सामने आया हुआ जब गांधी वायसराय के सामने एक 'चाय पार्टी' में अपने 'चेट' से नमक की पुड़िया निकली, चाय में मिलाया और फिर मुस्कराते हुए वायसराय को बताया कि "यह वहीं नमक है, जो दांडी में नमक कानून के विरोध में मैंने तोड़ा था।" इस घटना पर मई 1930 में रवींद्र नाथ टैगोर ने 'मैनचेस्टर गार्जियन' में टिप्पणी किया कि "यूरोप अब एशिया में अपनी नैतिक प्रतिष्ठा खो चुका है।"
करो या मरो का नारा
सन 1942 आते -आते देश में परिस्थितियां बड़ी तेजी से बदल रहीं थी। गांधी के सामने भी थोड़े ही विकल्प बचे थे। वे अंग्रेजों से अपील करते हैं कि भारत जैसा भी है, वे भारतीयों भाग्य भरोसे छोड़कर कर चलें जाएं। उस वक्त गांधी जी ने देशवासियों को एक युक्ति दी कि अब 'करो या मरो' के अलावा कोई दूसरा उपाय उनके सामने नहीं है।
इसके बाद गांधी समेत कांग्रेस के सभी बड़े नेताओं को जेल में कैद कर दिया गया। गांधी को 'आगा खां पैलेस' में कैद किया गया। इस पैलेस में ही गांधी के विश्वसनीय सहयोगी रहे महादेव देसाई और उनकी पत्नी कस्तूरबा की मौत हुई। इस दौरान अंग्रेजों की ओर से कई प्रस्ताव आए पर इन तमाम प्रस्तावों का अंतिम नतीजा यह रहा कि देश का विभाजन धर्म के आधार पर हो गया, जो गांधी नहीं चाहते थे।
गांधी के जाने के बाद आजादी के 'अमृत महोत्सव' के अवसर पर भी आज हम उन सवालों से जूझ रहे हैं, जिनसे तीस के दशक में वे रुबरू थे। मसलन हिन्दू-मुसलमानों के बीच आपसी सौहार्द और एकता की अब तक तमाम कोशिशें नाकाम रहीं है। एक 'धर्मनिरपेक्ष राज्य' के इतने साल के शासन के बाद भी ये समस्याएं ज्यों की त्यों बनीं हुई है। राज्य मशीनरी उन कार्यक्रमों से पहले ही पाला झाड़ चुका है, जो गांधी ने सुझाए।
गांधी के 'ग्रामस्वराज्य' का सपना आज विकेन्द्रित भृष्टाचार का अड्डा बन चुका है। जनता की भागीदारी के बजाय इस पर नौकरशाही हॉबी है। इस अर्थ में पार्था चटर्जी के इस बात से सहमत होने की काफी गुंजाइश है कि "गांधी के कार्यक्रम को राज्य मशीनरी लागू ही नहीं कर सकती। फिर भी गांधी के विचारों की चर्चा इस वजह से होनी चाहिए कि उनके विचार कभी भी आपके बीच एक 'फाइनल प्रोजेक्ट' के बजाय 'निरन्तर होने' और 'विकसित होते' हुए नजर आएंगे। और कहना न होगा कि ऐसे बीज विचारों में ही भविष्य की कोई राह निकलने की संभावना हो सकती है।