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One Hundred Years of Solitude: एक उपन्यास के फिल्मी पर्दे पर उतरने का इंतजार

Tue, 10 Dec 2024 04:00 PM IST
Dr. Vijay Sharma डॉ. विजय शर्मा
Updated Tue, 10 Dec 2024 04:00 PM IST
सार

सभी जानते हैं कि गैब्रियल गार्षा मार्केस अपने प्रसिद्ध उपन्यास ‘वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ़ सोलिट्यूड’ पर फ़िल्म बनाने का अधिकार किसी को नहीं देना चाहते थे। जबकि फ़िल्मों से उनका संबंध बहुत गहरा रहा है। उनकी कहानियों-उपन्यासों में फ़िल्म संबंधित बातें मिलती हैं।

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Gabriel Garsha Marques and film on One Hundred Years of Solitude
मार्केस के जीवन के सिने पक्ष को विस्तार से जानना है, तो 230 पन्नों की एलेसेंड्रो रोको की किताब ‘गैब्रियल गार्षा मार्केस एंड द सिनेमा लाइफ़ एंड वर्क्स’ पढ़नी होगी। - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

जग जाहिर है, गैब्रियल गार्षा मार्केस अपने प्रसिद्ध उपन्यास ‘वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ़ सोलिट्यूड’ पर फ़िल्म बनाने का अधिकार किसी को नहीं देना चाहते थे। जबकि फ़िल्मों से उनका संबंध बहुत गहरा रहा है। उनकी कहानियों-उपन्यासों में फ़िल्म संबंधित बातें मिलती हैं। उनकी रचनाओं में फ़िल्म की तरह चाक्षुष बिंब होते हैं, संवाद होते हैं। उनकी कहानी ‘संत’ में एक विशिष्ट हस्ती सिनेमा शिक्षक सीजर जवाटोनी की बात आती है, जो उन लोगों को प्लॉट डिवलपमेंट और स्क्रीन राइटिंग पढ़ाता था। वह केवल क्राफ़्ट नहीं सिखाता वरन जीवन के प्रति एक अलग नजरिया रखना भी बताता था। वह प्लॉट इजाद करने की मशीन था, प्लॉट उससे उमड़ते-घुमड़ते रहते। लगता है, सीजर जवाटोनी स्वयं मार्केस हैं। क्योंकि उनके भीतर भी फ़िल्म बनाने को लेकर एक जुनून था।

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उन्होंने इस दिशा में फ़िल्म समीक्षा से शुरुआत की। वे एल एस्पेक्टडोर अखबार में लगातार कॉलम लिख रहे थे और कोलंबिया में गंभीर फ़िल्म समीक्षा की उन्होंने ही शुरुआत की। फ़िर वे फ़ीचर फ़िल्म तथा टेलिविजन के लिए स्क्रीनप्ले लिखने लगे। वे नुएवो सिने लैटिनोअमेरिकानो फ़ाउंडेशन के द्वारा लैटिन अमेरिकी सिनेमा को निरंतर प्रमोट कर रहे थे। उन्होंने करीब 20 फ़िल्मों की पटकथा लिखी। साथ ही नए युवा सिने-निर्देशकों के विकास केलिए उन्होंने क्यूबा में सिनेमा तथा टेलिविजन स्कूल की स्थापना की। वे पटकथा लेखक एवं निर्देशक की सहभागिता के पक्ष में थे।
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यदि मार्केस के जीवन के सिने पक्ष को विस्तार से जानना है, तो 230 पन्नों की एलेसेंड्रो रोको की किताब ‘गैब्रियल गार्षा मार्केस एंड द सिनेमा लाइफ़ एंड वर्क्स’ पढ़नी होगी। मार्केस जो भी करते जुनूनी ढ़ंग से करते थे, अत: जब सिनेमा से जुड़े तो यह भी उनका एक जुनून था।

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वे ‘वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ़ सोलिट्यूड’ में लिखते हैं-

 

उनके ग्रैंडफ़ादर कर्नल निकोलस मार्कीज ने न केवल बच्चे को बर्फ़ से परिचित कराया बल्कि सदी के नए चमत्कार सिनेमा से भी पहचाना करवाई। इसी किताब में एक अन्य उदाहरण मिलता है, जब मकांडो के लोग सिनेमा न देखने जाने का निश्चय करते हैं। क्योंकि वे इस बात को पचा नहीं पाते हैं कि जो चरित्र एक फ़िल्म में मरने के बाद दफ़ना दिए जाते हैं, जिसके लिए उन्होंने आँसू बहाए थे, वही अगली फ़िल्म में एक अरब बन कर जीवित नजर आता है।


मार्केस सिनेमा के विशेषज्ञ थे। इस दिशा में उनके कदम कैसे बढ़े? असल में इसका खुलासा वे स्वयं करते हैं। 1961 में वे जेब में मात्र 20 डॉलर लिए मैक्सिको सिटी पहुँच गए। साथ में उनकी पत्नी और बेटा था और दिमाग में सिनेमा से जुड़ने का पागलपन। वे कहते हैं, ‘एक समय था जब मुझे उपन्यास से अधिक सिनेमा रुचिकर लगता था।’ उन्हें लगता था कि अभिव्यक्ति का साहित्य से अधिक गहरा माध्यम सिनेमा है। उनकी सारी कहानियों को प्रड्यूसरों ने नकार दिया था, उन्हें लगता था ये अवास्तविक हैं और दर्शकों को आकर्षित नहीं करेंगी। वे खासे निराश हो गए थे। साहित्य का विस्तार और संभावनाएँ सिनेमा से कहीं अधिक है, यही सिद्ध करने केलिए उन्होंने ‘वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ़ सोलिट्यूड’ लिखना प्रारंभ किया। और इसे लिख कर उन्हें ज्ञात हुआ कि दोनों विधाएँ एक-दूसरे से पूरी तरह भिन्न हैं।

और एक दिन एक फ़िल्म प्रड्यूसर उनके सामने धरना दे कर बैठ गए। हॉलीवुड मुगल हावी वाइंस्टीन के प्रस्ताव को कोई न नहीं करता है। उन्होंने ‘शेक्सपीयर इन लव’ जैसी नामी फ़िल्म बनाई है। मगर मार्केस ने उन्हें न कहा। हावी वाइंस्टीन ने मार्केस की कहानी ‘एरेंडीरा’ को फ़िल्म में रूपांतरित करने के अधिकार 1983 में लिए थे, फ़िल्म का स्क्रीनप्ले स्वयं मार्केस ने लिखा था। इस कहानी की भी एक कहानी है।

मार्केस ने इसका स्क्रीनप्ले लिखा पर वह खो गया। इस बीच उन्होंने इसे कहानी के रूप में लिखा। अत: याददाश्त से कुछ और कुछ कहानी से लेकर फ़िर से पटकथा लिखी। फ़िल्म को रुय गेरा ने निर्देशित किया। जब फ़िल्म की लंबाई को कम करने की बात आई तो प्रड्यूसर की हिम्मत नहीं पड़ रही थी मार्केस से पूछने की। पर मार्केस इसके लिए राजी हो गए। वे साहित्य और सिनेमा का अंतर जानते थे।

लेकिन जब हावी वाइंस्टीन ‘वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ़ सोलिट्यूड’ को फ़िल्म में ढ़ालने का प्रस्ताव लेकर मार्केस के पास गए तो मार्केस ने कहा, यदि जोसेपी टोर्नाटोरे इसे निर्देशित करना चाहते हैं, तो वे इसके सर्वथा योग्य व्यक्ति हैं। परंतु नोबेल पुरस्कृत साहित्यकार ने एक अनोखी एवं सृजनात्मक शर्त रख दी। उन्होंने कहा, ‘पूरी किताब की फ़िल्म बननी चाहिए। लेकिन एक चैप्टर पर प्रत्येक साल मात्र दो मिनट की फ़िल्म रिलीज होनी चाहिए और यह क्रम 100 साल चलना चाहिए।’ सीधी बात है, वे इस पर फ़िल्म बनाने के पक्ष में नहीं थे। हाँ, उन्होंने इसका अधिकार हावी वाइंस्टीन को नहीं दिया। 20 चैप्टर में फ़ैले उपन्यास पर उस समय फ़िल्म बनाने केलिए प्रड्यूसर एक बड़ी रकम देने को तैयार था, मगर वे टस-से-मस नहीं हुए। अब उनके न रहने पर इस पर फ़िल्म बनी है।

उनके प्रसिद्ध उपन्यास 'लव इन द टाइम ऑफ कॉलरा' (1988) के फिल्मीकरण के लिए निर्देशक उनके चक्कर लगा रहे थे। 'लव इन द टाइम ऑफ कॉलरा' पर फिल्म बनाने केलिए प्रोड्यूसर स्कॉट स्टेनडोर्फ ने मार्केस को घेरना शुरू किया। तीन साल तक मार्केस से अनुनय-विनय करते रहने के बाद अंत में स्कॉट स्टेनडोर्फ ने साफ-साफ कह दिया कि जैसे फ़्लोरेंटीनो अरीज़ा ने फरमीना डाज़ा का पीछा नहीं छोड़ा था, वैसे ही वे भी मार्केस का पीछा नहीं छोड़ने वाले हैं। हार कर मार्केस ने अपने उपन्यास पर फिल्म बनाने की अनुमति उन्हें दे दी। निर्देशन थे जाने-माने माइक नेवेल। इसी नाम से 2007 में फिल्म रिलीज हुई।

पूर्व प्रदर्शन के समय मार्केस उपस्थित थे। फिल्म की समाप्ति पर उन्होंने चेहरे पर मुस्कान लिए हुए केवल एक शब्द कहा 'ब्रावो!' उपन्यासकार ने फिल्म देख कर 'ब्रावो!' कहा, लेकिन फिल्म देख कर दर्शकों पर क्या प्रभाव पड़ता है? यदि आपने पुस्तक पढ़ी है, तो पहली बार में फिल्म जीवंत और तेज गति से चलती हुई लगती है। अगर नहीं पढ़ी है, तो बहुत सारी बातें बेसिर-पैर की लगती हैं।

मार्केस के काम पर ‘टाइम टू डाई’, ‘इन इविल ऑवर’, ‘द ईयर ऑफ़ द प्लेग’, ‘मेरी माई डियरेस्ट’, ‘ए वेरी ओल्ड मैन विद एनॉर्मस विंग्स’ आदि फ़िल्म बनी हैं। अधिकाँश का स्क्रीनप्ले उन्होंने स्वयं लिखा है। देखते हैं, ‘वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ़ सोलिट्यूड’ पर कैसी फ़िल्म बनी है।


 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 

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