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पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव: क्या चुनावी रेवड़ियां बनेंगी सत्ता में वापसी की चाभी?

Tue, 10 Oct 2023 12:00 PM IST
Vinod Patahk विनोद पाठक
Updated Tue, 10 Oct 2023 12:00 PM IST
सार

साढ़े नौ साल से केंद्र की सत्ता में रहने के बाद नरेंद्र मोदी के लिए यह चुनाव लिटमस टेस्ट से कम नहीं होगा। यह चुनाव इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण है कि सभी राज्यों में सरकारों ने लोकलुभावन घोषणाएं करने के रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं।

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क्या चुनावी रेवड़ियां बनेंगी सत्ता में वापसी की चाबी? - फोटो : Social Media

विस्तार

लोकसभा चुनाव का सेमीफाइनल कहे जाने वाले राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम विधानसभा चुनावों की तारीखों का एलान हो गया है। हिंदी पट्टी के राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में मुख्य मुकाबला भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच ही होना है। यहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है।

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साढ़े नौ साल से केंद्र की सत्ता में रहने के बाद नरेंद्र मोदी के लिए यह चुनाव लिटमस टेस्ट से कम नहीं होगा। यह चुनाव इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण है कि सभी राज्यों में सरकारों ने लोक लुभावन घोषणाएं करने के रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। इन चुनावों में फ्रीबीज या चुनावी रेवड़ियों की भी परीक्षा होने वाली है। विपक्ष के जातीय जनगणना के दांव पर जनता का रुख भी इन चुनावों में पता चलने वाला है। 
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राज्यवार बात करें तो राजस्थान में कांग्रेस की सरकार है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पिछले पांच साल से अपनी कुर्सी को बचाते आ रहे हैं। पांच साल में कई ऐसे अवसर आए, जब लगा कि गहलोत की सरकार गिर जाएगी। वर्ष 2020 में ठीक कोरोना के बीच कांग्रेस में बगावत हो गई थी। राजनीति के जादूगर अशोक गहलोत की सूझबूझ से सरकार बच तो गई, लेकिन मुख्यमंत्री निर्दलीय विधायकों पर आश्रित होकर रह गए। उसी का नतीजा था कि मुख्यमंत्री गर्वनेंस से ज्यादा विधायकों को खुश करने में जुटे रहे। 
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चुनाव से ठीक छह महीने पहले गहलोत ने लोकलुभावन घोषणाओं की झड़ी लगा दी। बिजली बिल माफी से लेकर मुफ्त मोबाइल बांटने तक शायद ही कोई सेक्टर होगा, जिसके लिए गहलोत ने घोषणा न की हो। 33 से बढ़ाकर 53 जिले तक कर दिए गए।

जाति के आधार पर बोर्ड बना दिए गए। गहलोत जहां अपनी जनकल्याणकारी योजनाओं के दम पर सत्ता में वापसी का दम भर रहे हैं, तो वहीं भारतीय जनता पार्टी भ्रष्टाचार, कानून व्यवस्था, पेपरलीक, तुष्टिकरण जैसे मुद्दों को आधार बना रही है। हालांकि, भारतीय जनता पार्टी की राज्य इकाई में आपसी प्रतिद्वंद्वता के चलते चुनाव नरेंद्र मोदी के चेहरे पर लड़ा जा रहा है। 

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क्या चुनावी रेवड़ियां बनेंगी सत्ता में वापसी की चाबी? - फोटो : Social Media

राजस्थान में गहलोत बनाम मोदी

रोचक बात यह है कि राजस्थान से कांग्रेस का गांधी परिवार नदारद है। चुनाव गहलोत बनाम मोदी का बन गया है। पिछली बार कांग्रेस को सत्ता तक लाने वाले सचिन पायलट मौन हैं तो भाजपा की स्टार नेता और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को पार्टी में दरकिनार कर दिया गया है। राजस्थान में पिछले तीन दशक से हर पांच साल पर सत्ता बदलती आ रही है। 3 दिसंबर को पता चलेगा कि रिवाज बदलेगा या नहीं।

मध्य प्रदेश में वर्ष 2018 में भारतीय जनता पार्टी की कांग्रेस से चंद सीटें कम रह गई थीं। कांग्रेस ने युवा ज्योतिरादित्य सिंधिया की जगह अनुभवी कमलनाथ को सत्ता की बागडोर सौंप दी थी, लेकिन सिंधिया की बगावत के चलते भारतीय जनता पार्टी पुनः सत्ता में आई।

शिवराज सिंह चौहान फिर मुख्यमंत्री बने, लेकिन मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री बदलने के कयास चलते रहे। अभी भले चुनाव शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्री रहते हुए लड़ा जा रहा है, लेकिन यदि भारतीय जनता पार्टी सत्ता में लौटती है तो उन्हीं को कुर्सी मिलेगी, इसका कोई स्पष्ट संकेत पार्टी की ओर से नजर नहीं आ रहा है। 

इस बार जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी ने केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर से लेकर कद्दावर कैलाश विजयवर्गीय, केंद्रीय मंत्रियों, सांसदों को टिकट दिया है तो उससे भी शिवराज सिंह चौहान की बेचैनी बढ़ी है। हालांकि, चौहान भी फ्रीबीज के सहारे सत्ता वापसी की चाभी ढूंढ रहे हैं।

कांग्रेस में मुख्य चेहरा कमलनाथ का ही नजर आ रहा है। वह अपने एक साल के कार्यकाल को लेकर जनता को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं। कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी मध्य प्रदेश में कांग्रेस की ओर से मोर्चा संभाला हुआ है। पिछले कुछ दिनों में प्रियंका के कई दौरे हुए हैं। सत्ता विरोधी लहर के बीच भाजपा के लिए सत्ता में वापसी उतनी आसान नहीं है, लेकिन कमजोर कांग्रेस किस तरह टक्कर दे पाएगी, यह चुनाव नतीजों से पता चलेगा।


छत्तीसगढ़ की चुनावी राजनीति

छत्तीसगढ़ में 15 साल सत्ता से बाहर रहने के बाद वर्ष 2018 में कांग्रेस को सत्ता हासिल हुई थी। भूपेश बघेल को मुख्यमंत्री बनाया गया। राजस्थान और मध्य प्रदेश के मुकाबले छत्तीसगढ़ में कांग्रेस बेहद अच्छी स्थिति में है। हालांकि, राज्य में भूपेश बघेल और टी.एस.सिंह देव में कुछ वैसी ही नोकझोंक चलती रही, जैसी राजस्थान में सचिन पायलट और अशोक गहलोत में चल रही थी।

भूपेश बघेल आलाकमान को साधकर कुर्सी बचाने में सफल तो हुए। सत्ता में पुनः वापसी के लिए भूपेश बघेल ने भी चुनावी रेवड़ियों का सहारा लिया है। अब तक बघेल काफी मजबूत स्थिति में नजर आ रहे हैं, क्योंकि भारतीय जनता पार्टी के पास कोई मजबूत चेहरा नहीं है। पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह पिछले पांच साल ज्यादा सक्रिय नहीं रहे। यही कारण है कि यहां पर भी भारतीय जनता पार्टी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सहारा है।

दक्षिण के राज्य तेलंगाना में के.चंद्रशेखर राव की भारत राष्ट्र समिति सत्ता में है। राव दो बार से सत्ता में बने हुए हैं। जिस तरह से वर्ष 2018 में उन्हें बहुमत मिला था तो कहा जा सकता है कि उनकी लोकप्रियता का ग्राफ काफी ऊंचा है। हालांकि, राव भी सरकार विरोधी लहर का सामना कर रहे हैं। उन्हें कांग्रेस के साथ भारतीय जनता पार्टी से भी चुनौती मिल रही है। उपचुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने जिस तरह से प्रदर्शन किया तो लग रहा है कि वो यहां तीसरी ताकत बन रही है। 

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क्या चुनावी रेवड़ियां बनेंगी सत्ता में वापसी की चाबी? - फोटो : Social Media

के. चंद्रशेखर राव ने भी कोई ऐसा अवसर नहीं छोड़ा, जहां उन्होंने मुफ्त की घोषणाएं न की हों। खासकर अल्पसंख्यकों को लेकर उनकी योजनाओं को भारतीय जनता पार्टी ने निशाने पर लिया। तेलंगाना में निश्चित रूप से त्रिकोणीय मुकाबला रहने वाला है। चंद्रशेखर राव की बीआरएस, कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी एक-दूसरे से मुकाबला करते नजर आएंगे।

मिजोरम में मिजो नेशनल फ्रंट की सरकार है और उसने वर्ष 2018 में 40 सीटों वाली विधानसभा में 26 सीटें जीती थीं। यहां पर मुख्य रूप से मुकाबला मिजो नेशनल फ्रंट और जोरम पीपुल्स मूवमेंट के बीच है। राष्ट्रीय पार्टियों यहां अपनी जमीन नहीं तैयार कर सकी हैं।

जहां तक तीसरे मोर्चे या अन्य दलों की बात है तो वो अभी कहीं नहीं नजर आ रहे हैं। राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में आम आदमी पार्टी ने कुछ महीने पहले जोर-शोर से प्रचार किया था, लेकिन उसके प्रचार की गति धीमी पड़ चुकी है। राजस्थान में हनुमान बेनीवाल की राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी कुछ सीटों को प्रभावित कर सकती है। हालांकि, वह भाजपा और कांग्रेस का मुकाबला कर पाएगी, यह मुश्किल लगता है। 

भारतीय ट्राइबल पार्टी राजस्थान और मध्य प्रदेश की कुछ सीटों पर प्रभाव डाल सकती है। कुछ-कुछ यही स्थिति बहुजन समाज पार्टी की भी है। राजस्थान और मध्य प्रदेश के उत्तर प्रदेश से लगते इलाकों में बहुजन समाज पार्टी का प्रभाव है। इन चुनावों में नवगठित इंडिया गठबंधन का भी टेस्ट होना बाकी है।

यह देखना होगा कि लोकसभा से पांच महीने पहले हो रहे पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में यह गठबंधन एकजुट रहता है या नहीं। यदि आपसी प्रतिद्वंद्वता को छोड़कर इंडिया गठबंधन के दल पांचों राज्यों में एकजुट हो जाएं तो भारतीय जनता पार्टी को वर्ष 2024 में बड़ी चुनौती दे सकते हैं।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकताु, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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