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26 जनवरी 2021: लाल किले की घटना शर्मसार करती है, आखिर कौन है जिम्मेेेेेदार?

Thu, 28 Jan 2021 04:40 PM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Thu, 28 Jan 2021 04:40 PM IST
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farmers protest in india red fort flag hoisting kisan aandolan delhi
लाल किले पर प्रदर्शन करते किसान - फोटो : पीटीआई

भारत के गणतंत्र दिवस की पावन बेला पर भारतीय गणतंत्र की संप्रभुता और अखंडता के प्रतीक एवं सदियों तक भारत की हुकूमत के केंद्र रहे लाल किले पर हुए अराजक तत्वों के बेहद शर्मनाक हमले के बाद इस राष्ट्र विरोधी हरकत के लिए संबंधित पक्ष एक दूसरे पर दोष मढ़ कर स्वयं को पाक साफ साबित करने का प्रयास कर तो रहे हैं लेकिन देखा जाए तो जिन्होंने जिस ऐतिहासिक प्राचीर के स्तंभ से भारत की शान तिरंगे की जगह अन्य झंडा फहराया वे तो देश के गद्दार हैं ही लेकिन एक दूसरे पर देाष मढ़ने वाले बयानबाज स्वयं भी इस राष्ट्र को शर्मसार करने के लिए कम दोषी नहीं हैं, चाहे वे किसानों के आंदोलन को शिवजी की बारात बनाने वाले नेता हों, या कानून व्यवस्था के पालक हों या फिर वे लोग हों जिनके कंधों पर इस राष्ट्र की सुरक्षा और इसके सम्मान की रक्षा की जिम्मेदारी हो।  

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  • लाल किला सदियों से हमलावरों के निशाने पर रहा

लाल किले का सबसे पहले निर्माण तोमर राजा अनंगपाल ने 1060 में करवाया था। बाद में पृथ्वीराज चैहान ने इसे फिर से बनवाया और शाहजहां ने इसे तुर्क शैली में ढलवाया था। मुगल शासक, शाहजहां 11 वर्ष तक आगरा से शासन करने के बाद राजधानी को  दिल्ली ले आया। शाहजहां ने यहां 1618 में लाल किले की नींव रखी और वर्ष 1647 में इसका उद्घाटन हो गया।

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इस किले में शहजहां से लेकर बहादुर शाह जफर तक 15 बादशाहों का आवास ही नहीं रहा बल्कि हिंदुस्तान की हुकूमत का केंद्र भी रहा। इसलिए यह ऐतिहासिक किला भारत की राजनीति के कई उतार और चढ़ावों का गवाह रहा है। मुगल सुल्तान शाह आलम को हराने के बाद 11 मार्च 1783 में बाबा बघेल सिंह ने अपनी फौज सहित दिल्ली के लाल किले पर केसरिया झंडा लहराया था। उससे पहले लाल किले को सन् 1747 में ईरान के बादशाह नादिर शाह ने लूटा।
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सत्ता और वैभव के लिए इस किले पर कभी नादिर शाह, कभी सिखों के तो कभी मराठों के हमले होते रहे और इसके कोहिनूर समेत बहुमूल्य रत्न जड़ित मयूर सिंहासन (तख्त-ए-ताउस ) आदि वैभव लुटते रहे। अंत में अंग्रेजों ने 1857 की क्रांति के बाद इस किले को न केवल सत्ताविहीन किया बल्कि कोहिनूर को भी लूट कर ले गए। गदर को कुचलने के बाद अंग्रेजों ने लाल किले को अपनी सेना के बैरकों में बदल दिया था।

अंतत: यह किला देश की आजादी के साथ ही 1947 में आजाद हुआ। उसके बाद भारत की संप्रभुता के इस प्रतीक की शान की रक्षा करने की जिम्मेदारी हमारी थी जिसे हम इस साल की 26 जनवरी को नहीं निभा पाए। यह देश किसी बादशाह या सम्राट की जागीर नहीं बल्कि एक गणतंत्र होने के नाते सभी देशवासियों की विरासत है। इसलिए सरकार से लेकर आंदोलनकारी और आम नागरिक सभी उस ‘हम’ की श्रेणी में आते हैं जिस ‘हम’ का उल्लेख हमारे संविधान की प्रस्तावना में है। लेकिन बिडंबना तो देखिए ! हादसा इतना बड़ा हो गया और उस हादसे को भी राजनीतिक लाभ का जरिया बनाया जा रहा है।

  • देश की संप्रभुता का प्रतीक है लाल किला

 इस लाल किले से शाहजहां से लेकर बहादुर शाह जफर तक 15 बादशाह देश पर हुकूमत चलाते रहे। इसी लाल किले की प्राचीर से 1911 में जार्ज पंचम और महारानी मैरी ने भारत की जनता को संबोधित किया था। 16 अगस्त 1916 से लेकर 15 अगस्त 2020 तक 12 प्रधानमंत्री देश को संबोधित करते रहे हैं। आजादी के बाद निरंतर जिस लाल किले की प्राचीर से हमारे 12 प्रधानमंत्री अब तक 21 तोपों की सलामी के साथ देश की शान तिरंगा फहराते रहे और देश के भविष्य का एजेंडा घोषित करने के साथ ही सारी दुनियां के समक्ष अपनी संप्रभुता का जयघोष करते रहे उसी प्राचीर और राष्ट्रीय ध्वज पर अराजक और उन्मादी भीड़ का कब्जा बहुत ही गंभीर बात है।

लाल किले की ऐतिहासिक प्राचीर पर कब्जा कर स्तंभ पर तिरंगे की जगह एक धर्म के प्रतीक परचम को फहराने वालों की गद्दारी के लिए कानून तो अपने हिसाब से कार्यवाही करेगा ही लेकिन इस महापाप से वे किसान नेता कैसे बच सकते हैं, जिन्होंने किसानों के इतने महत्वपूर्ण आंदोलन को निरंकुश छोड़ दिया। इन नेताओं ने पुलिस को शांतिपूर्ण ढंग से ट्रैक्टर रैली निकालने का वचन दिया था। अगर जनसमूह को नियंत्रित और निर्देशित करना इनके बूते से बाहर था तो इन्होंने इतने लोगों को एकत्रित किया ही क्यों था?

भीड़ का न तो कोई चेहरा होता है और ना ही चरित्र। लेकिन इस आंदोलन में 40 नेताओं समूह स्वयं ही भीड़ साबित हो गए। नेताओं की इस भीड़ की गैर जिम्मेदाराना हरकत ने किसान आंदोलन को नुकसान पहुंचाने के साथ ही उस मकसद को ही विफल कर दिया। यह आंदोलन सफलता के करीब पहुंच गया था जो कि आज गर्त में चला गया। देशवासियों की जो भावनाएं किसानों के प्रति थीं वे अब पलटती नजर आ रही हैं। वह इसलिए कि देश की एकता अखंडता और सुरक्षा से बड़ी कोई भावना नहीं होती है।

सरकार की ओर से कहा गया था कि किसान आंदोलन में गड़बड़ी और अराजकता फैलाने के लिए...

farmers protest in india red fort flag hoisting kisan aandolan delhi
लाल किले पर प्रदर्शनकारियों ने फहराया अपना ध्वज - फोटो : पीटीआई
  • सरकार भी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती

लेकिन भारत सरकार इस मामले में अपनी जिम्मेदारियों से नहीं बच सकती है। माना कि किसान नेतृत्व ने परेड के दौरान शांति और अनुशासन बनाए रखने का वायदा किया था, फिर भी कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी किसान नेतृत्व की नहीं बल्कि सरकार की थी। इस ऐतिहासिक हादसे का पूर्वानुमान सरकार को नहीं था तो यह किसान नेतृत्व की नहीं बल्कि सरकार की इंटेलिजेंस ऐजेंसियों की विफलता थी।

सरकार की ओर से कहा गया था कि किसान आंदोलन में गड़बड़ी और अराजकता फैलाने के लिए पाकिस्तान में तीन सौ से ज्यादा ट्विटर हैंडलर सक्रिय हैं। पुलिस इस खतरे से आंदोलनकारियों को तो आगाह कर रही थी, मगर स्वयं खुफिया ऐजेंसियों सतर्क नहीं थीं। खुफिया तंत्र और सरकार का जानकर भी अनजान बनना हैरत की बात है।

  • दिल्ली की कानून व्यवस्था राज्य सरकार के पास नहीं

देश की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा के साथ ही देश की एकता और अखंडता की जिम्मेदारी सरकार की होती है और इसके लिए बाकायदा संविधान को हाजिर नाजिर कर शपथ ली जाती है। अन्य राज्यों में तो आंतरिक सुरक्षा या कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की होती है लेकिन दिल्ली के लिए अलग से संवैधानिक व्यवस्था होने के कारण यह जिम्मेदारी केवल भारत सरकार की होती है। यह संवैधानिक व्यवस्था राजधानी क्षेत्र की अति संवेदनशील स्थिति को देखते हुए की गई है।

इस तर्क में कोई दम नहीं है कि शांति बनाए रखने का का किसान नेताओं ने वायदा किया था। क्या गृह मंत्रालय को पता नहीं था कि भीड़ का कोई चेहरा और चरित्र नहीं होता है? क्या गृह मंत्रालय को पता नहीं था कि किसानों के 40 नेताओं का समूह भी अपने आप में ही एक भीड़ है और कुंठाओं के साथ ही धार्मिक उन्माद से प्रभावित लाखों लोगों की पहले से ही उत्तेजित भीड़ को संभालना इन 40 नेताओं की भीड़ के बूते से बाहर है।

इस तर्क में भी दम नहीं कि अगर चुप नहीं रहते तो खून खराबा हो जाता। देश की आन-बान और शान से बड़ा कुछ नहीं होता। कल अगर कोई कहे कि हमें राष्ट्रपति भवन और संसद भवन को कब्जाने दो अन्यथा बहुत खून खराबा हो जाएगा, तो क्या सरकार इस डर से उत्पातियों को खुली छूट दे देगी? अगर सरकार सोचती है कि उसे झुकाने पर तुला किसान नेतृत्व इस घटनाक्रम के बाद नकारा साबित होने के साथ ही अब निस्तेज हो गया और अब आंख से आंख मिला कर वार्ता की मेज तक आने लायक भी नहीं रह गया तो यह सरकार की भूल ही होगी।

संसद भवन पर 13 दिसंबर 2001 को आतंकी हमला हो चुका है। इससे पहले 22 दिसंबर 2000 को लालकिले पर लश्कर-ए-तोइबा का हमला हो चुका था। जाहिर है कि ये अति महत्वपूर्ण इमारतें राष्ट्र विरोधियों के निशाने पर पहले से ही हैं। ऐसी स्थिति का फायदा देश के दुश्मन भी उठा सकते हैं इसलिए भी देश के नेतृत्व का 26 जनवरी के दिन की तरह बेबस, कमजोर और लाचार दिखना भी खतरनाक साबित हो सकता है।

  • लाल किले पर धार्मिक निशान खतरे की घंटी

लाल किले की प्राचीर से जिस तरह एक धर्म विशेष का निशानयुक्त झंडा फहराया कर धार्मिक जयघोष किया गया वह भविष्य के लिए खतरे की घंटी है। सरकार को नहीं भूलना चाहिए कि मुश्किल से खालिस्तानी आतंकवाद पर काबू पाया जा सका था। यह सही है कि किसान आंदोलन का लाभ खालिस्तान समर्थक उठाना चाहते हैं। लेकिन किसान आंदोलन को बदनाम करने के लिए सारे किसानों को खालिस्तान समर्थक साबित करने का प्रयास भी बेहद खतरनाक हो सकता है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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