जन्मदिन विशेष फ़हद फ़ासिल : मलयालम सिनेमा में बहुआयामी क्षमता का अभिनेता
8 अगस्त 1982 को जन्में मलयालम के प्रसिद्ध अभिनेता फहद फ़ासिल की आंखें अभिनय करती हैं। मलयालम के अलावा फ़हद ने तमिल फ़िल्मों में काम किया है। तमिल फ़िल्म ‘सुपर डीलक्स’ में उन्होंने तमिल के दिग्गज अभिनेता विजय सेतुपति के साथ तथा शिवकार्तिकेय के साथ ‘वैल्लाईकरण’ में प्रमुख भूमिका की है।
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8 अगस्त 1982 को जन्में मलयालम के प्रसिद्ध अभिनेता फहद फ़ासिल की आंखें अभिनय करती हैं, बिना एक शब्द के संवाद के पूरी बातें कह जाती हैं। फ़हद फ़ासिल की बोलती आंखें कमाल की हैं वैसे उनका पूरा व्यक्तित्व बहुत सौम्य और आकर्षक है। अभिनय क्षमता गजब की है। अक्सर उनकी आंखें बौद्धिकता, गुस्से, विद्रोह, मनुष्य के श्याम पक्ष, भीतरी उबाल को स्वभाविक रूप से प्रकट करती हैं।
सिनेमा की यह एक विशेषता है कि वह कैमरे की सहायता से अभिनेता के सूक्ष्म भावों को आसानी से पकड़ सकता है। क्लोजअप, एक्स्ट्रीम क्लोजअप के द्वारा कैमरा यह हासिल करता है। हिन्दी के बहुत कम सिने दर्शक फ़हद फ़ासिल से परिचित होंगे क्योंकि अभी तक उन्होंने हिन्दी सिनेमा में काम नहीं किया है। जहां तक याद है मैंने उन्हें पहली बार ‘इयोबिंटे पुस्तकं’ (बुक ऑफ़ जॉब) में देखा था और बस देखती रह गई थी।
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पूरी फिल्म में शायद ही वे बोलते हैं सारे समय उनकी आंखें देखती और बोलती हैं। अपने पिता और भाइयों की काली करतूत ये आंखें देखती हैं, साथ ही अपनी प्रियतमा को भी प्रेम-करुणा से भर कर देखती हैं। जीवन के श्याम पक्ष वाली उत्तम फिल्म में पिता और भाइयों की क्रूरता और अत्याचार के खिलाफ़ अलोसी यानि फ़हद फ़ासिल की आंखें सुलगती रहती हैं।
विद्रोह की ऐसी सशक्त अभिव्यक्ति! इस गाथात्मक फ़िल्म में फ़हद फ़ासिल के अलावा कई अन्य दिग्गज अभिनेता हैं। सबके उत्कृष्ट अभिनय रेखांकित किया जा सकता है। पर अभिनय में सबसे ऊपर है शांत, एकाकी अलोसी यानि योब (जॉब) का सबसे छोटा बेटा।
फिल्म निर्देशक पिता प्रसिद्ध थे अत: बेटे के लिए फ़िल्म जगत में राह बनाना आसान न रहा होगा। वैसे तो पिता ने ही बेटे को लॉन्च किया, मगर नतीजा सिफ़र रहा। फहद की पहले की कुछ फ़िल्में असफ़ल रहीं लेकिन वे हारे नहीं, उन्होंने खुद को अन्वेषित किया और एक सफ़ल अभिनेता के रूप में उभरे।
मलयालम के अलावा फ़हद ने तमिल फ़िल्मों में काम किया है। तमिल फ़िल्म ‘सुपर डीलक्स’ में उन्होंने तमिल के दिग्गज अभिनेता विजय सेतुपति के साथ तथा शिवकार्तिकेय के साथ ‘वैल्लाईकरण’ में प्रमुख भूमिका की है।
जल्द ही वे कमल हासन के साथ ‘विक्रम” में नजर आएंगे। वे तेलगु सिनेमा में भी प्रवेश कर रहे हैं। अब वे अभिनय के साथ फिल्म प्रोडक्शन भी करते हैं। अब तक 50 फिल्मों से अधिक में काम कर चुके फ़हद की कुछ फ़िल्में मैंने देखी हैं, उन्हीं की थोड़ी-सी बात करती हूं।
अभी पिछले साल उनकी फ़िल्म ‘मलिक’ आई है। इसमें अतीत के अपराध, मौत और दर्द फ़्रेडी (फ़हद) के ऊपर बोझ हैं। बाल अपराधी को उसके ही अंकल को समाप्त कार्ने के काम पार लगाया गया है। इस व्यक्ति के आंतरिक संघर्ष को अभिनेता बखूबी अंजाम देता है। मगर इसी अभिनेता को हीरो युवा डैशिंग डॉक्टर अरुण कुमार दुबई में मस्त-बिंदास जिंदगी बिताते देखना सुखद है।
‘डायमंड नेकलेस’ वह लक्ज़री कारें चला रहा है, आलीशान फ़्लैट में रहता है, खुल कर क्रेडिट कार्ड का उपयोग करता है। नर्स लक्ष्मी का दिल जीतता है। और एक दिन उसकी नजर एक रोगिणी माया के डॉयमंड नेकलस पर पड़ती है।
परिस्थितिवश उसे एक गांव की लड़की से उसकी शादी करनी पड़ती है। उसे असली नेकलेस की जगह नकली नेकलेस रखने में, मरीज को जरूरत से ज्यादा मॉर्फ़ीन देने में कोई हिचक नहीं... आगे आप खुद देखें।
फ़हद फ़ासिल ने जिस तरह से ‘हैप्पी लकी गो फ़ेलो’ का अभिनय किया है, वह ‘बुक ऑफ़ जॉब’ के अलोसी से बहुत भिन्न है। इससे उनकी अभिनय क्षमता की विस्तृत सीमा का पता चलता है। 2013 में यूथ आइकॉन का पुरस्कार जीतने वाले फ़हद को इस फ़िल्म के लिए पुरस्कार मिला तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
सच्ची घटना पर आधारित, स्त्री केंद्रित फ़िल्म ‘टेक ऑफ़’ में मनोज के रूप में फहद की एंट्री फ़िल्म में काफ़ी बाद में होती है। लेकिन आते ही वे कहानी का केंद्र बन जाते हैं। यहां उनकी चाल, बैठने-बोलने का अंदाज फ़िल्म के किरदार को जीवंत कर देता है। 2014 में एक बार फ़िर वो अपने ब्रूडिंग किरदार में लौटते हैं, जहां संवाद से अधिक उनकी आंखें बोलती हैं। ‘बैंगलोर डेज़’ के दास की उदास-विचारमग्न आंखों का राज फ़िल्म में बहुत बाद में खुलता है।
अतीत के मस्तमौला, चुलबुला, सफ़ल और वर्तमान में चुप्पा दास यानि दो भिन्न स्वभाव के चरित्र को निभाना सरल नहीं होता है। फ़हद ने दोनों रूप सफ़लतापूर्वक निभाए हैं। मुख्य पात्र न होते हुए भी फ़हद इस फ़िल्म को अर्थवत्ता प्रदान करते हैं और एक बार फ़िर वे पुरस्कार के हकदार बनते हैं।
‘बैंगलोर डेज’ में उनकी पत्नी की भूमिका में हैं, मलयालम सिनेमा की अभिनेत्री नज़रिया नज़ीम। दोनों ने पहले भी ‘प्रमाणी’ में संग काम किया था। ‘बैंगलोर डेज’ में काम करते हुए दोनों नजदीक आए और परदे के पति-पत्नी जीवन में पति-पत्नी बन गए। दोनों ने एक और फ़िल्म ‘ट्रांस’ में भी साथ-साथ में काम किया है।
आश्चर्य होता है अलोसी और दास की मासूम, निष्पाप आंखों को चालाकी-दुष्टता भरी आंखों में परिवर्तित होते देख कर। ‘22 फ़ीमेल कोट्टयम’ के सिरिल को अपराध करने में कोई हिचक नहीं है, अपने फायदे के लिए किसी भोली-भाली लड़की को ड्र्ग पेडलिंग के लिए उपयोग करने में उसे कोई शर्म नहीं है।
गंदे तरीके से वह अपने फ़ायदे के लिए लोगों का खूब दुरपयोग करता है। यहां उसकी आंखें दुष्टता का पर्याय हैं, बड़ा-से-बड़ा अपराध करते हुए वे निर्लिप्त रहती है। दर्शक की आंखें फहद की आंखों से हटती नहीं हैं। ‘जोजी’ में जोजी के रूप में केंद्रीय पात्र बन फ़हद एक बार फ़िर आदमी के श्याम पक्ष को प्रस्तुत करते हैं और अपनी छाप डालते हैं। दुष्ट पिता और भाइयों को रास्ते से हटाने में जोजी को कोई संकोच नहीं होता है, आखीर उसमें भी वही दुष्ट खून बह रहा है।
‘जोजी’ फ़िल्म के ऑफ़ीसियल पोस्टर में फ़हद फ़ासिल का पूरा चेहरा दिखाया गया है जिसमें उनकी एक आंख उन्होंने अपने हाथ से ढ़ंकी हुई है, मात्र एक आंख नजर आ रही है। अभिनेता की एक आंख दर्शकों को फ़िल्म की ओर आकर्षित करने के लिए काफ़ी है। बिना किसी व्याख्या के ऐसे अभिनेता का चेहरा पोस्टर पर दिखाना, उसकी प्रसिद्धि का गवाह है। आप इस अभिनेता की फिल्में देखें, अपने आप फहद फासिल की बोलती आंखों और उनके अभिनय के मुरीद हो जाएंगे।
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