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भारत में CAA पर आंसू बहा रही यूरोपीय संसद पहले अपना बदहाल घर ठीक करे, एक बार पाकिस्तान को ही देख ले

Thu, 30 Jan 2020 12:37 PM IST
Rajesh Badal राजेश बादल
Updated Thu, 30 Jan 2020 12:37 PM IST
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european parliament debate on india's caa britain india eu vote delayed
यूरोपीय संसद को पाकिस्तान में मानवाधिकारों की दुर्दशा को भी समझना चाहिए। - फोटो : फाइल फोटो

यूरोपीय देशों की यूनियन अब एशियाई देशों की चिंता में दुबली हो रही है। आख़िरकार ब्रिटेन जैसा सैंतालीस साल पुराना सदस्य देश कल ही यूरोपीय यूनियन से बाहर हो गया। बचे सत्ताईस देश अब अपनी अपनी जाजम किसी तरह खिसकने से बचाए हुए हैं। ऐसे में वह अपनी सीमा से बाहर जाकर भारत के नागरिक संशोधन क़ानून की चिंता में दुबली हो रही है। भले ही उसने मतदान फ़िलहाल भारतीय विदेश मंत्री से चर्चा होने तक टाल दिया हो ,लेकिन यह कहने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि वह शरणार्थी समस्या को समग्र नज़रिए से नहीं देख रही है। 

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यूरोपीय यूनियन अपने सदस्य देशों की भलाई करने के लिए बनाई गई थी न कि संयुक्त राष्ट्र के समानांतर संगठन की तरह व्यवहार करने के लिए।क्या इस संघ के अधिवक्ता अपने संविधान के पन्ने पलट कर देखेंगे कि कैसे 1957 की रोम संधि सिर्फ़ कोयला और स्टील के कारोबार की ख़ातिर इसका गठन किया गया था। उसके बाद 1993 की मास्ट्रिख संधि भी एकल खिड़की से सदस्य देशों के बीच व्यापार को बढ़ावा देती थी। जब 2007 में लिस्बन समझौता हुआ तो उसमें भी सदस्यों के अलावा किसी की चिंता करने की इबारत नहीं लिखी गई थी।
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यूरोपीय यूनियन पहले अपनी ही समस्याओं को सुलझा ले। - फोटो : PTI

इससे पहले भी साझी मुद्रा यूरो को मंज़ूर किया गया। अंतर पासपोर्ट प्रणाली समाप्त की गई। संयुक्त विदेश, रक्षा और न्याय नीति को स्वीकार किया गया। इन सबका आधार कारोबार और केवल यूरोपीय सदस्य देशों की चिंता करना था। दूर एशिया में बसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के आंतरिक मामलों में टांग अड़ाने का कोई संकल्प रिकॉर्ड में नहीं है।

आज तक यह संस्था यूरोप के बाहर दख़ल देने नहीं गई है। अगर उसे इतनी ही चिंता है तो पाकिस्तान के भीतर मानव अधिकारों और आतंकवाद को पोसने की नीति पर भी चार आंसू बहाने चाहिए ,जो इस प्रस्ताव के पीछे है। क्या अंतर्राष्ट्रीय समझौतों ,संधियों और मान्य सिद्धांतों का भी यह यूरोपीय यूनियन मख़ौल उड़ाना चाहती है ,जो प्रत्येक देश की संप्रभुता की रक्षा करती है और अपने आंतरिक मामलों में निर्णय लेने का पूरी आज़ादी देती है। 

एक भारतीय होने के नाते मैं नागरिकता संशोधन क़ानून से असहमति का अधिकार रखता हूं। विरोध करता हूं। लेकिन उन गोरे देशों को यहां की चिंता करने का हक़ नहीं देना चाहता, जिन्होंने सदियों तक हिन्दुस्तान के हितों को क्षति पहुंचाई है। कभी ख़ामोशी से धर्मांतरण के कबूतर उड़ाए तो कभी कारोबार करने के बहाने भारत के मूल चरित्र पर हमला बोला। कभी यहां की संस्कृति को आघात दिया तो कभी अपने स्वार्थों की ख़ातिर भारत के मानवीय श्रम का दुरुपयोग किया।

क्या ये गोरे मुल्क़ अपने अंदर झांक कर देखेंगे कि उनके सदस्य देशों ने अतीत में अपने यहां शरणार्थियों के साथ क्या सुलूक़ किया है। वे रंगभेद की दूषित मानसिकता से आज भी जकड़े हुए हैं और अपने को श्रेष्ठ समझने की भावना से ग्रस्त हैं।

हिन्दुस्तान से इस मामले में भूल हुई है। हर भूल सुधारी जाती है। केंद्र सरकार के पास अवसर है। उसे यह करना चाहिए। शरणार्थियों का इतना ही ख़्याल था तो उसे पाकिस्तान की मुस्लिम उप जातियों- अहमदियों,सूफ़ियों ,शियाओं और पठानों की चिंता भी करनी थी। इस मामले में बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान जैसे मित्र देशों को बदनाम करने की कोई ज़रूरत नहीं थी कि वहां भी अल्पसंख्यकों के साथ ज़ुल्म हो रहा है।   
  

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें  blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें। 

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