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मौसम की मार झेल रहा देश : भारत में जलवायु परिवर्तन और खराब पर्यावरण बढ़ा रहा मौत का संकट
सार
एनविस्टेट्स रिपोर्ट के अनुसार, चरम मौसम घटनाओं से होने वाली मौतों का डेटा आपदा प्रबंधन विभाग, गृह मंत्रालय से लिया गया है। रिपोर्ट में मुख्य रूप से बाढ़, चक्रवात, भारी बारिश, भूस्खलन, गर्मी की लहरें और बिजली गिरने जैसी घटनाओं को शामिल किया गया है।
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पिछले 25 वर्षों में चरम मौसम घटनाओं से होने वाली मौतों में 269% की विस्फोटक वृद्धि दर्ज की गई है।
- फोटो : संवाद
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विस्तार
भारत, अपनी विशाल भौगोलिक विविधता, सघन जनसंख्या और जटिल सामाजिक-आर्थिक संरचना के साथ, जलवायु परिवर्तन और चरम मौसम घटनाओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील रहा है। हिमालय की बर्फीली चोटियों से लेकर दक्षिण के तटीय मैदानों तक, देश का प्रत्येक क्षेत्र प्राकृतिक आपदाओं जैसे बाढ़, सूखा, चक्रवात और गर्मी की लहरों का सामना करता है।
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हाल ही में सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय द्वारा प्रकाशित 'एनविस्टेट्स इंडिया 2025: पर्यावरण सांख्यिकी' की आठवीं रिपोर्ट ने इस संकट की भयावहता को उजागर किया है। यह रिपोर्ट एक चिंताजनक तथ्य सामने लाती है: पिछले 25 वर्षों में चरम मौसम घटनाओं से होने वाली मौतों में 269% की विस्फोटक वृद्धि दर्ज की गई है। जहां 2001-02 में ऐसी घटनाओं से 834 लोगों की मृत्यु हुई थी, वहीं 2024-25 में यह संख्या बढ़कर 3,080 हो गई है।
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यह न केवल मानवीय क्षति की गंभीरता को दर्शाता है, बल्कि जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों और इसके खिलाफ तत्काल, समन्वित कार्रवाई की आवश्यकता को भी रेखांकित करता है। यह आंकड़ा भारत के सामने खड़ी पर्यावरणीय चुनौतियों का एक सशक्त चेतावनी संकेत है, जो नीति निर्माताओं, समुदायों और वैश्विक हितधारकों को स्थायी और समावेशी समाधानों की दिशा में एकजुट होने का आह्वान करता है।
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मौतों के बहुत डरावने आंकड़े
एनविस्टेट्स रिपोर्ट के अनुसार, चरम मौसम घटनाओं से होने वाली मौतों का डेटा आपदा प्रबंधन विभाग, गृह मंत्रालय से लिया गया है। रिपोर्ट में मुख्य रूप से बाढ़, चक्रवात, भारी बारिश, भूस्खलन, गर्मी की लहरें और बिजली गिरने जैसी घटनाओं को शामिल किया गया है।
पिछले 25 वर्षों का साल-दर-साल डेटा निम्नलिखित है:-
· 2001-02: 834 मौतें (मुख्य रूप से बाढ़ और चक्रवात से)।
· 2004-05: 1,995 मौतें (भारी बारिश और भूस्खलन से वृद्धि)।
· 2005-06: 2,500 से अधिक मौतें (मानसून संबंधी आपदाओं से उछाल)।
· 2007-08: 3,700 से अधिक मौतें (बाढ़ से उच्चतम स्तर)।
· 2013-14: 5,677 मौतें (उत्तराखंड बाढ़, जिसमें केदारनाथ आपदा में 4,000 से अधिक मौतें)।
· 2014-15: 1,674 मौतें (केदारनाथ के बाद सुधार, लेकिन बाढ़ और चक्रवात जारी)।
· 2018-19: लगभग 2,357 मौतें (केवल बिजली गिरने से)।
· 2022-23: लगभग 2,887 मौतें (बिजली गिरने से चरम)।
· 2023-24: 2,616 मौतें (गर्मी की लहरें और मानसून से वृद्धि)।
· 2024-25: 3,080 मौतें (11 वर्षों में उच्चतम, 18% वृद्धि)।
यह डेटा उतार-चढ़ाव दर्शाता है, लेकिन समग्र रूप से ऊपर की ओर रुझान दिखाता है। 2013-14 में चरम उछाल के बाद कुछ वर्षों में कमी आई, लेकिन हाल के दशक में फिर से बढ़ोतरी हुई है। रिपोर्ट के अनुसार, 2024-25 में हिमाचल प्रदेश में सर्वाधिक 452 मौतें हुईं, उसके बाद केरल (387), मध्य प्रदेश (373), गुजरात (230) और महाराष्ट्र (206)।
कुल मिलाकर, 1993-2022 के 30 वर्षों में 80,000 से अधिक मौतें हुईं, जो औसतन 2,667 मौतें प्रति वर्ष है। यह आंकड़े जलवायु परिवर्तन की बढ़ती तीव्रता को प्रतिबिंबित करते हैं।
मौतों में वृद्धि के कारण
मौतों में 269% की वृद्धि आकस्मिक नहीं है; यह कई कारकों का परिणाम है। सबसे प्रमुख कारण जलवायु परिवर्तन है। इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) की छठी मूल्यांकन रिपोर्ट (2021) के अनुसार, मानव गतिविधियों से उत्सर्जित ग्रीनहाउस गैसों ने गर्मी की लहरें, असामान्य बारिश और चक्रवातों की तीव्रता बढ़ाई है।
भारत में, अप्रैल-जून 2024 में गर्मी की लहरों के दिनों में वृद्धि हुई, जहां उत्तराखंड, पंजाब आदि राज्यों में 22 दिन तक गर्मी की लहर चली। इसी तरह, ठंडी लहरों के दिनों में भी वृद्धि हुई, जैसे जम्मू-कश्मीर में 12 दिन।
इस संकट का दूसरा कारण शहरीकरण और जनसंख्या वृद्धि है। भारत की आबादी 2001 से 2025 तक दोगुनी से अधिक हो गई है, और लोग बाढ़-प्रवण क्षेत्रों, पहाड़ी ढलानों और तटीय इलाकों में बस रहे हैं।
उदाहरणस्वरूप, हिमालयी राज्यों में अनियोजित निर्माण ने भूस्खलन की घटनाओं को बढ़ाया। 2013 की केदारनाथ आपदा इसका ज्वलंत उदाहरण है, जहां अनियोजित पर्यटन और बांध निर्माण ने मौतों को कई गुना बढ़ा दिया। तीसरा कारण, अपर्याप्त आपदा प्रबंधन और जागरूकता की कमी।
हालांकि, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एन डी एम ए ) सक्रिय है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली कमजोर है। बिजली गिरने जैसी घटनाओं, जो 2022 में 1,285 मौतों का कारण बनीं, को रोका जा सकता है यदि किसान और मजदूरों को सुरक्षित आश्रय उपलब्ध हों। आर्थिक असमानता भी भूमिका निभाती है; गरीब वर्ग सबसे अधिक प्रभावित होते हैं, क्योंकि उनके पास मजबूत आवास या संसाधन नहीं होते।
कई कारणों से बढ़ी हैं मौतें
मौतों की वृद्धि का तरीका घटनाओं के प्रकार और क्षेत्रीय विविधता से समझा जा सकता है। पहले दशक (2000-2010) में बाढ़ और चक्रवात मुख्य कारण थे, जो मानसून की अनियमितता से जुड़े थे। 2007-08 में 3,700 से अधिक मौतें मुख्यतः बाढ़ से हुईं। लेकिन 2010 के बाद, बिजली गिरने और गर्मी की लहरों ने प्रमुख भूमिका निभाई।
2017-2022 के बीच, बिजली गिरने से औसतन 2,772 मौतें प्रति वर्ष हुईं, जो कुल मौतों का बड़ा हिस्सा है। क्षेत्रीय रूप से, हिमालयी क्षेत्र (उत्तराखंड, हिमाचल) में भूस्खलन और फ्लैश फ्लड से मौतें बढ़ीं, जबकि मैदानी इलाकों (उत्तर प्रदेश, बिहार) में गर्मी और बाढ़ से।
2024-25 में असम में 1,60,000 घर क्षतिग्रस्त हुए, जो बाढ़ की तीव्रता दर्शाता है। कैसे बढ़ी? जलवायु परिवर्तन ने घटनाओं की आवृत्ति बढ़ाई – 2024 में जनवरी से सितंबर तक 255 दिनों में चरम मौसम घटनाएं हुईं। साथ ही, कृषि क्षेत्र में मजदूरों की असुरक्षा ने बिजली गिरने से मौतों को बढ़ाया।
सामाजिक-आर्थिक प्रभाव गहरा
यह वृद्धि केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं; इसका सामाजिक-आर्थिक प्रभाव गहरा है। 2024-25 में 3,64,124 घर नष्ट हुए (पिछले वर्ष से 2.6 गुना वृद्धि), 61,960 पशु मारे गए, और 1.424 मिलियन हेक्टेयर फसल क्षेत्र प्रभावित हुआ। आर्थिक नुकसान 1993-2022 में $180 बिलियन रहा।
सामाजिक रूप से, महिलाएं और बच्चे सबसे अधिक प्रभावित होते हैं, क्योंकि वे घरेलू जिम्मेदारियों के कारण बचाव में पिछड़ जाते हैं। स्वास्थ्य पर असर: गर्मी की लहरें हृदय रोग बढ़ाती हैं, जबकि बाढ़ से संक्रामक रोग फैलते हैं। राष्ट्रीय स्तर पर, यह विकास को बाधित करता है। क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स में भारत 2019 में 7वें स्थान से 2022 में 49वें पर पहुंचा, लेकिन मौतों की वृद्धि से यह सुधार प्रभावित हो सकता है।
समाधान और सुझाव
इस संकट से निपटने के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण जरूरी है। सबसे पहले, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली को मजबूत करें – जैसे बिजली गिरने के लिए ऐप और शेल्टर। दूसरा, सतत विकास: हिमालयी क्षेत्रों में इको-फ्रेंडली निर्माण को बढ़ावा दें। तीसरा, शिक्षा और जागरूकता: ग्रामीण स्तर पर प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाएं। सरकारी व्यय पर्यावरण संरक्षण पर 2022-23 में ₹4,969 करोड़ तक बढ़ा, लेकिन कॉर्पोरेट सीएसआर में 5% की कमी आई। इसे बढ़ाना चाहिए।
अंतरराष्ट्रीय सहयोग, जैसे पेरिस समझौते के तहत, उत्सर्जन कम करने में मदद करेगा। आपदा प्रबंधन विशेषज्ञ डा० पीयूष रौतेला का कहना है, "ये आंकड़े जलवायु जोखिमों की वर्तमान वास्तविकता हैं। स्थानीय लचीलापन, पूर्व चेतावनी और जागरूकता से मानवीय लागत कम की जा सकती है।"
यह समय कार्रवाई का
चरम मौसम से मौतों में 269% वृद्धि एक चेतावनी है कि जलवायु परिवर्तन अब दूर की बात नहीं। यह संकट अधिक तीव्र घटनाओं, शहरीकरण और कमजोर प्रबंधन से और मानव गतिविधियों से बढ़ा है । यदि हम अब भी नहीं चेते, तो आने वाले वर्षों में यह संकट और गहराएगा। सरकार, समाज और व्यक्ति को मिलकर कार्य करना होगा। एक हरित, लचीला भारत ही इस चुनौती का सामना कर सकता है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।