हिमालय के लिए ग्लोबल से ज्यादा लोकल वॉर्मिंग बनी खतरा, प्रदूषण से कैसे बचेगा उत्तराखंड?
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गर्मियों में ठण्डी हवाएं देकर तथा सर्दियों में साइबेरिया से चलने वाली शीत लहरों को रोकने वाला एशिया का जलवायु नियंत्रक हिमालय जब स्वयं ही तप रहा हो तो फिर दिल्ली मेंं पारे का 48 डिग्री तक और राजस्थान के धौलपुर में 51 डिग्री सेल्यिस तक पहुंच कर सारे उत्तर भारत को झुलसाना स्वाभाविक ही है। अभी तो पारा 51 डिग्री तक ही पहुंचा और अगर इसकी उछाल इसी तरह जारी रही तो अनिष्ट की कल्पना सहज ही की जा सकती है।
दरअसल, इससे जीव-जन्तु वनस्पतियां और आबादी ही नहीं झुलसेगी बल्कि इसका असर हिन्द महासागर और अरब सागर पर भी पड़ेगा तथा वहां वाष्पीकरण बढ़ने से मानसूनी हवाएं नमी का इतना बड़ा बोझ लेकर चलेंगी जिसका परिणाम विनाशकारी बाढ़ों के रूप में सामने आएगा।
ग्लोबल और लोकल वॉर्मिंग
इस स्थिति के लिए ग्लोबल वार्मिंग को जिम्मेदार ठहराना तो आसान हो गया है। मजेदार बात तो यह है कि इसके लिए अपने वनों का सर्वाधिक दोहन करने ग्रीन हाउस को नुकसान पहुंचाने वाली गैसों का उत्सर्जन करने वाले अमेरिका और यूरोप के जैसे देशों को सीधे-सीधे जिम्मेदार ठहराया जाता है जबकि इन देशों में इतनी बर्फ गिरने लगी है कि मौसम विज्ञानी वहां हिमयुग के लौटने के संकेत तक देने लगे हैं, इसलिए अब समय आ गया है कि पर्यावरणविदों और हिम विशेषज्ञों का ध्यान जलवायु परिवर्तन के लिए ग्लोबल वार्मिंग से इतर लोकल वार्मिंग की ओर भी जाने लगा है।
हिमालय पर लोकल वॉर्मिंग का ज्यादा असर देखा गया
वैश्विक तापमान वृद्धि या ग्लोबल वार्मिंग पर प्रो. आर.के.पचौरी के नेतृत्व वाली संयुक्त राष्ट्र संघ की इंटर गवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आइपीसीसी) की चौथी रिपोर्ट में सन् 2035 तक हिमालयी ग्लेशियरों के लुप्त हो जाने की भविष्यवाणी का सार्वजनिक होना ही था कि भारत ही नहीं बल्कि समूचे एशिया में हलचल मच गई। मचती भी क्यों नहीं अगर हिमालय पर 15 हजार से अधिक ग्लेशियर ही नहीं रहेंगे तो सिन्धु, गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी महानदियों और उनकी सहायिकाओं की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। जब ये नदियों ही नहीं रहेंगी तो अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, तिब्बत, नेपाल और भूटान के जनजीवन पर इसका क्या असर पड़ता उसकी कल्पना भी भयावह थी।
आइपीसीसी के पैनल की विवादास्पद रिपोर्ट के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा आई.आई.टी. मुम्बई के प्रोफेसर आनन्द पटवर्धन की अध्यक्षता में में एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया गया जिसमें वाडिया हिमालयी संस्थान और इसरो समेत देश के प्रमुख संस्थानों के विशेषज्ञों के अलावा पर्यावरणविद् चण्डी प्रसाद भट्ट को भी शामिल किया गया।
जून 2010 में भारत सरकार को सौंपी गई इस रिपोर्ट में अध्ययन दल ने भी कुछ ग्लेशियरों के पीछे खिसकने और कुछ के आगे बढ़ने की ओर संकेत कर ग्लोबल वार्मिंग के साथ ही लोकल वॉर्मिंग की ओर इशारा किया है। इस अध्ययन दल की रिपोर्ट में कुछ हिमालयी ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने, कुछ के बहुत धीमी गति से पिघलने और कुछ ग्लेशियरों के आगे बढ़ने की पुष्टि हुई है। अब विशेषज्ञों को लगता है कि ग्लेशियरों पर वैश्विक असर कम और स्थान विशेष की परिस्थितियों का असर ज्यादा पड़ रहा है।
कुछ ग्लेशियर टस से मस नहीं हुए
जम्मू-कश्मीर विश्वविद्यालय के शोधकर्ता प्रो. आर.के गंजू के ताजा अध्ययन के अनुसार ग्लेशियरों के पिघलने का कारण ग्लेाबल वार्मिंग नहीं है। वह कहते हैं कि अगर यह वजह होती तो नॉर्थ वेस्ट में कम और नार्थ ईस्ट में ग्लेशियर ज्यादा नहीं पिघलते। कराकोरम रेंज में ग्लेशियरों के आगे बढ़ने के संकेत मिले हैं। वहां 114 ग्लेशियरों में से 35 जस के तस हैं और 30 आगे बढ़ रहे हैं, जबकि बाकी सिकुड़ रहे हैं। यदि ग्लोबल वॉर्मिंग होती तो ये सारे के सारे ग्लेशियर सिकुड़ रहे होते।
एशिया का मौसम नियंत्रित करता है हिमालय
हवा और जल संचरण की विशाल प्रणालियों को प्रभावित करने वाले विशाल जलवायुवीय नियंत्रक के रूप में हिमालय दक्षिण में भारतीय उपमहाद्वीप और उत्तर में मध्य एशियाई उच्च भूमि की मौसमी स्थितियों को प्रभावित करने में प्रमुख भूमिका निभाता है। अपनी स्थिति और विशाल ऊंचाई के कारण हिमालय पर्वतश्रेणी सर्दियों में उत्तर की ओर से आने वाली ठंडी यूरोपीय हवाओं को भारत में प्रवेश करने से रोकती है और दक्षिण-पश्चिम मॉनसूनी हवाओं को पर्वतश्रेणी को पार करके उत्तर में जाने से पहले अधिक वर्षा के लिए भी बाध्य करती है।
लेकिन पर्वतराज हिमालय के साथ छेड़छाड के कारण मौसम चक्र में परिवर्तन साफ नजर आने लगा है। वाडिया हिमालयी भूविज्ञान संस्थान और अल्मोड़ा स्थित गोविन्द बल्लभ हिमालयी पर्यावरण संस्थान आदि के वैज्ञानिकों का कहना है कि कुछ ग्लेशियर कम पिघल रहे हैं तो कुछ ऐसे भी हैं जो पिघलने के बजाय आगे बढ़ रहे हैं।
ग्लेशियरों की अपनी-अपनी रफ्तार है खिसकने की
दल के सदस्य एवं विश्व विख्यात चिपको आन्दोलन के प्रणेता पद्मभूषण चण्डी प्रसाद भट्ट का कहना है कि उत्तराखण्ड में भी ग्लेशियरों की स्थिति एक जैसी नहीं मिली। भागीरथी की तुलना में अलकनन्दा के श्रोत ग्लेशियर अधिक तेजी से पिघल रहे हैं, क्योंकि वहां मानवीय हस्तक्षेप अधिक है। सतोपन्थ ग्लेशियर 1962 से लेकर 2005 तक 22.88 मीटर की गति से पीछे खिसका मगर इसकी पीछे खिसकने की गति 2005-06 में मात्र 6.5 मीटर प्रति वर्ष दर्ज हो पाई। हिमालयी ग्लेशियरों में सबसे अधिक अध्ययन गंगोत्री ग्लेशियर का ही हुआ है।
अध्ययन दल की रिपोर्ट में कहा गया है कि गंगोत्री ग्लेशियर सन् 1962 से लेकर 1991 तक के 26 सालों में लगभग 20 मीटर प्रतिवर्ष की दर से पीछे खिसका जबकि 1956 से लेकर 1971 तक 27 मीटर प्रति वर्ष और 2005 से लेकर 2007 के बीच मात्र 11.80 मीटर प्रति वर्ष की दर से सिकुड़ा। इसी रिपोर्ट में ओवेन आदि (1997)और नैनवाल आदि (2007)के अध्ययन का हवाला देते हुए कहा गया है कि भागीरथी जलसंभरण क्षेत्र के ही शिवलिंग और भोजवासा ग्लेशियर आगे बढ़ रहे हैं। इसी तरह हिमाचल की लाहौल घाटी में तीन ग्लेशियर जमाव और 2 ग्लेशियरों के आगे बढ़ने की बात कही गई है।
रिपोर्ट में ओवेन आदि (2006) के हवाले से लद्दाख क्षेत्र के 5 ग्लेशियरों के आगे बढ़ने की बात कही गई है। अगर पिघलने का एकमात्र कारण ग्लोबल वार्मिंग होता तो यह गति घटती और बढ़ती नहीं। अमेरिका पत्रिका “टाइम“ द्वारा ”मैन आफ द इयर” घोषित ग्लेशियर विशेषज्ञ डॉ. डी.पी. डोभाल के अनुसार हिमालय में 70 प्रतिशत से अधिक ग्लेशियर 5 वर्ग कि.मी. से कम क्षेत्रफल वाले हैं और ये छोटे ग्लेशियर ही तेजी से गायब हो रहे हैं।
डोभाल भी अलग-अलग ग्लेशियर के पीछे हटने की अलग-अलग गति के लिए लोकल वॉर्मिंग को ही जिम्मेदार मानते हैं। इन ग्लेशियरों की सेहत बिगड़ने का सीधा असर इन पर निर्भर नदियों पर पड़ने लगा है। नदियों का जल स्तर घटने से हिमालयी राज्यों का बिजली उत्पादन भी घट रहा है।
हिमालय पर मानव दबाव से लोकल वॉर्मिंग
हिमालय की आरंभिक यात्राएं व्यापारियों, चरवाहों और तीर्थयात्रियों द्वारा की गई थीं। तीर्थयात्रियों को विश्वास था कि यात्रा जितनी कष्टकर होगी, वे मोक्ष या निर्वाण के उतने ही क़रीब पहुंच पाएंगे, जबकि व्यापारियों और चरवाहों ने 5,486 से 5,791 मीटर तक की ऊंचाई पर स्थित दर्रों को सामान्य जीवन मार्ग मानकर पार किया, लेकिन अन्य सभी लोगों के लिए हिमालय एक दुर्गम और भयंकर अवरोध था।
आज लोग चांद सितारों की सैर करने लगे हैं तो फिर लक्जरी कारों समेत हिमालय पर चढ़ना कौन सी बड़ी बात है। हिमालयी तीर्थ बद्रीनाथ, सतोपन्थ और भगीरथ खर्क ग्लेशियर समूह के काफी करीब है। सन् 1968 में जब पहली बार बद्रीनाथ बस पहुंची थी तो वहां तब तक लगभग 60 हजार यात्री तीर्थ यात्रा पर पहुंचते थे। लेकिन यह संख्या अब 10 लाख तक पहुंच गई है। इतने अधिक तीर्थयात्री मात्र 6 माह में लगभग सवा लाख वाहनों में बद्रीनाथ पहुंचते हैं।
समुद्रतल से लगभग 15210 फुट की उंचाई पर स्थित हेमकुण्ड लोकपाल में 1936 में एक छोटे से गुरुद्वारे की स्थापना की गई। सन् 1977 में वहां केवल 26700 और 1997 में केवल 72 हजार सिख यात्री गये थे, लेकिन वर्ष 2011 में हेमकुण्ड जाने वाले यात्रियों की संख्या लगभग 6 लाख तक पहुंच गई थी। यह स्थान विश्वविख्यात फूलों की घाटी और सर्वाधिक संरक्षित नंदा देवी बायोस्फीयर रिजर्व के बीच है।
इसी तरह 1969 में जब गंगोत्री तक मोटर रोड बनी तो वहां तब तक लगभग 70 हजार यात्री पहुंचते थे। लेकिन गत् वर्ष तक वहां पहुंचने वाले तीर्थ यात्रियों की संख्या भी 3 लाख 50 हजार तक पहुंच गई। मसूरी, शिमला और नैनीताल जैसे पर्यटक नगरों में भीड़ बढ़ने से पारितंत्र प्रभावित हो रहा है। एक अनुमान के अनुसार नैनीताल में सन् 1958 में 1,60,000 पर्यटक पहुंचे थे जिनकी संख्या 1986 तक 7 लाख सालाना तक तक पहुंच गयी। यही हाल मसूरी का भी है।
हिमालय पर वाहनों की चढ़ाई से भी गरमाया हिमालय
प्रदूषण के मामले में ऑटोमोबाइल क्षेत्र की सबसे खराब छवि है। वैज्ञानिकों का मत है कि ये वाहन मैदान की तुलना में पहाड़ पर चार गुना प्रदूषण करते हैं। मैदानों में प्रायः 60 किलोमीटर प्रति घण्टा चलने वाले वाहन पहाड़ों की चढ़ाइयों और तेज मोड़ों पर पहले और दूसरे गेयर में 20 किलोमीटर से भी कम गति से चल पाते हैं। जिससे उनका ईंधन दोगुना खर्च होता है। इस स्थिति में वाहन न केवल कई गुना अधिक काला दूषित धुआं छोड़ते हैं बल्कि इतना ही अधिक वातावरण को भी गर्म करते हैं।
समुद्रतल से 10 हजार की ऊंचाई के बाद वृक्ष पंक्ति या ट्री लाइन लुप्त हो जाती है। मतलब यह कि ये हजारों वाहन प्रतिदिन उच्च हिमालयी क्षेत्र में भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन तो कर रहे हैं मगर उस कार्बन डाइऑक्साइड को हवा से चूसने वाले और हवा में आक्सीजन छोड़ने वोले वृक्ष वहां नहीं होते हैं।
हिमालय पर वाहनों की बढ़ती संख्या खतरनाक
एक अनुमान के अनुसार बद्रीनाथ में प्रति सीजन लगभग सवा लाख छोटे बड़े वाहन पहुंचने लगे हैं। बद्रीनाथ के लिए जोशीमठ से गेट सिस्टम है, जिसमें जोशीमठ और बद्रीनाथ से 5 गेट यानी कि वाहनों के 5 काफिले छोड़े जाते हैं और प्रत्येक काफिले में लगभग 250 से 300 तक गाड़ियां होती हैं। बद्रीनाथ से 10 कि.मी. पीछे हनुमान चट्टी से चढ़ाई और मोड़ दोनों ही शुरू हो जाते हैं और वहीं से सर्वाधिक प्रदूषण शुरू हो जाता है।
बद्रीनाथ से कुछ दूरी से स्थाई हिम रेखा शुरू हो जाती है और फिर कुछ आगे सतोपन्थ आदि ग्लेशियर शुरू हो जाते हैं। लगभग यही स्थिति केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री की भी है। गंगोत्री से लेकर बद्रीनाथ तक के अति संवेदनशील उच्च हिमालयी क्षेत्र में स्थित कालिन्दी पास और घस्तोली होते हुए ट्रैकिंग रूट पर भी भीड़ बढ़ने लगी है।
कावड़ियों का भी हिमालय पर आना
वैज्ञानिकों का मानना है कि समुद्रतल से ऊंचाई के साथ ही पर्यावरणीय संवेदनशीलता भी बढ़ती जाती है। हिमालय पर ऊंचाई बढ़ने के साथ ही ऑक्सीजन और वर्षा कम होने लगती है। उत्तराखण्ड की चारधाम यात्रा ऋषिकेश से शुरू होती है, जो कि समुद्रतल से लगभग 300 मीटर की उंचाई पर स्थित है। वाहन यहां से शुरू हो कर समुद्रतल से 3042 मीटर की उंचाई पर स्थित गंगोत्री और 3133 मीटर की ऊंचाई पर स्थित बद्रीनाथ पहुंचते हैं।
एक अनुमान के अनुसार एक यात्रा सीजन में लगभग 30 हजार वाहन सीधे गंगोत्री पहुचंते हैं। इतने वाहन अगर गोमुख के इतने करीब पहुंचेंगे तो वाहनों की आवाजाही का सीधा असर गंगोत्री ग्लेशियर पर पड़ना स्वाभाविक ही है। पिछले एक दशक से हजारों कावड़ियेे जल भरने सीधे गोमुख जा रहे हैं। यही नहीं गंगोत्री और गोमुख के बीच कई जैनेरेटर भी लग गए हैं।
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