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राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020: चरित्र निर्माण एवं व्यक्तित्व के समग्र विकास की शैक्षणिक रणनीति

Pro Neelima Gupta प्रो. नीलिमा गुप्ता
Updated Tue, 18 Oct 2022 04:14 PM IST
सार

भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ। शंकर दयाल शर्मा ने कहा था- किसी शिक्षित चरित्रहीन व्यक्ति की अपेक्षा एक अशिक्षित चरित्रवान व्यक्ति समाज के लिए अधिक उपयोगी होता है। तात्पर्य यह है कि जीवन के समस्त गुणों, ऐश्वर्यों, समृद्धियों और वैभवों की आधारशिला सदाचार है, सच्चरित्रता है। 

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Educational strategy for character building and holistic development of personality
शिक्षा किसी भी समाज में निरंतर चलने वाली सामाजिक प्रक्रिया है। - फोटो : iStock

विस्तार

शिक्षा किसी भी समाज और राष्ट्र की रीढ़ होती है जिसके आधार पर उस समाज और राष्ट्र का चहुंमुखी विकास आकार पाता है। समय के साथ होने वाले शाश्वत परिवर्तन आवश्यकता महसूस कराते हैं कि शिक्षा में भी परिवर्तन लाया जाए। इन्हीं परिवर्तनों के चलते 1986 की शिक्षा नीति में सुधार करने के लिए हमारे देश में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 लाई गई। इस राष्ट्रीय शिक्षा नीति में सभी के लिए समावेशी और समान गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने को लक्षित किया गया है। गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा की संरचना के रूप में राष्ट्रीय शिक्षा नीति के आधारभूत सिद्धांत में एक दृष्टि छिपी है जो इसे पूर्व की सभी शिक्षा नीतियों से विशिष्ट बनाती है। 

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शिक्षा का शाब्दिक अर्थ होता है सीखने एवं सिखाने की क्रिया, परंतु अगर इसके व्यापक अर्थ को देखें तो शिक्षा किसी भी समाज में निरंतर चलने वाली सामाजिक प्रक्रिया है जो उद्देश्यपूर्ण होती है और इसके माध्यम से मनुष्य की आंतरिक शक्तियों का विकास तथा व्यवहार को परिष्कृत किया जाता है। शिक्षा द्वारा ज्ञान एवं कौशल में वृद्धि कर मनुष्य को योग्य नागरिक बनाया जाता है।
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गांधी जी का मत था कि बालक और मनुष्य के शरीर, मन तथा आत्मा का सर्वांगीण एवं सर्वोत्कृष्ट विकास ही शिक्षा है। इसी प्रकार स्वामी विवेकानंद का कहना था कि मनुष्य की अंर्तनिहित पूर्णता को अभिव्यक्त करना ही शिक्षा है। 

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सच्चरित्रता मनुष्यों के विकास के आवश्यक


चरित्र का मनुष्य के जीवन में बड़ा महत्व है। सच्चरित्रता से मनुष्य को अनेक लाभ मिलते हैं क्योंकि सच्चरित्रता किसी खास गुण का बोधक शब्द नहीं है, बल्कि यह सत्य, उदारता, विनम्रता, सुशीलता, सहानुभूति आदि अनेक गुणों को अपनी परिधि में समेटे हुए है। जिस मनुष्य में ये गुण होते हैं वह मनुष्य सच्चरित्र कहलाता है और सद्चरित्रता ही मनुष्य को जीवन जीने की कला सिखाती है।


चरित्र हमारे व्यवहार और कार्यों में स्पष्ट तौर पर दिखाई देता है। ये चरित्र ही है जो निःस्वार्थ भाव, ईमानदारी, धारणा, साहस, वफादारी और आदर जैसे गुणों के मिले-जुले रूप में व्यक्ति में दिखता है। चरित्रवान व्यक्ति में आत्मबल के साथ-साथ उच्चकोटि का धैर्य एवं विवेक निश्चित रूप से होता ही है।

हमारे जीवन में चरित्र के महत्त्व को संदर्भित करते हुए भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ। शंकर दयाल शर्मा ने कहा था-

किसी शिक्षित चरित्रहीन व्यक्ति की अपेक्षा एक अशिक्षित चरित्रवान व्यक्ति समाज के लिए अधिक उपयोगी होता है।” तात्पर्य यह है कि जीवन के समस्त गुणों, ऐश्वर्यों, समृद्धियों और वैभवों की आधारशिला सदाचार है, सच्चरित्रता है। वैदिक मंत्रों में हमारे ऋषियों ने इसीलिए भगवान से प्रार्थना की है-
असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृत गमय।” क्योंकि विद्या से मनुष्य की बुद्धि के गवाक्ष खुलते हैं और उन गवाक्षों से ज्ञान के प्रकाश की किरणें अन्दर प्रवेश करती हैं। 


पश्चिम से प्रभावित जीवनशैली, तकनीकी के दायरे में सिमटती हुई दुनिया, वास्तविक जीवन के बजाय काल्पनिक जीवन और इंटरनेट मीडिया का बढ़ता वर्चस्व, शारीरिक और श्रमपरक खेलकूद की जगह गैजेट गेम्स में उलझते जीवन, बढ़ते एकाकीपन ने देश के युवाओं को एक खतरनाक गिरफ्त में लेना शुरू किया है। इसका दुष्परिणाम है ऐसे असंतुलित व्यक्तित्व का निर्माण, जो स्वयं उनके लिए ही नहीं, बल्कि परिवार, समाज और देश के लिए भी अनुत्पादक और खतरनाक साबित हो रहा है।

शिक्षा के धरातल पर इन्हीं से निपटने के लिए एक सुचिंतित, सुविचारित और दूरगामी प्रयास है मूल्य संवर्धन पाठ्यक्रम। देश भर के विशेषज्ञों की सहायता से तैयार इन पाठ्यक्रमों का मुख्य उद्देश्य छात्रों का सर्वांगीण व्यक्तित्व विकास और चरित्र निर्माण करना है। व्यक्ति के आचरण, व्यवहार, शिक्षा, योग्यता, शालीनता, पहनावा, उदारता, त्याग, क्षमा, बौद्धिकता जैसे तत्वों को अपनाकर जो अपनी छवि को अन्य से अलग प्रस्तुत करता है इसे ही व्यक्तित्व विकास कहा जाता है।

Educational strategy for character building and holistic development of personality
राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 का एक प्रमुख लक्ष्य विद्यार्थियों का चरित्र निर्माण भी है - फोटो : pixabay

सद्विचारों और सत्कर्मों की एकरूपता है चरित्र

जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में यदि आप किसी को भी प्रभावित करना चाहते है तो आपको बेहतर प्रदर्शन करना होगा इसके लिए आपको किसी को भी आकर्षित करने की कला आनी चाहिए। यह तभी संभव है जब आप के अन्दर श्रेष्ठ गुणों का समावेश हो। यह श्रेष्ठ गुण हैं संतुलित एवं सुन्दर शरीर, उत्तम विचार और आत्मविश्वास। 

सद्विचारों और सत्कर्मों की एकरूपता ही चरित्र है। ‘चरित्र’ शब्द मनुष्य के सम्पूर्ण व्यक्तित्व को प्रकट करता है। ‘अपने को पहचानो’ शब्द का वही अर्थ है जो ‘अपने चरित्र को पहचानो’ का है। हमारा चरित्र ही हमारे आध्यात्मिक विकास का आईना होता है, जो हमें आध्यात्म से जोड़कर आंतरिक ज्ञान से अवगत कराता है। चरित्र एवं व्यक्तित्व एक दूसरे के पूरक हैं। व्यक्ति का संपूर्ण स्वभाव अथवा चरित्र ही व्यक्तित्व कहलाता है। 


राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 का एक प्रमुख लक्ष्य विद्यार्थियों का चरित्र निर्माण भी है, ताकि विद्यार्थियों के जीवन के सभी पक्षों और क्षमताओं का संतुलित विकास हो सके। भारतीय चिंतन परंपरा में चरित्र निर्माण और समग्र व्यक्तित्व विकास शिक्षा का महत्वपूर्ण लक्ष्य माना जाता है। वर्तमान युग में चरित्र निर्माण और समग्र व्यक्तित्व विकास की जरूरत और बढ़ जाती है। इस नीति का उद्देश्य ऐसे नागरिकों का निर्माण करना है जो विचारों से, कार्य व्यवहार से एवं बौद्धिकता से भारतीय बनें। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में शिक्षा के अलग-अलग स्तरों पर सभी विषयों में भारतीय ज्ञान परंपरा, कला, संस्कृति एवं मूल्यों का समावेश करने की बात कही गई है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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