गरीब-अमीर की बढ़ती खाई: अमृतकाल में भी इतनी आर्थिक असमानता क्यों है?
भारत में गरीब, जीवित रहने के लिए मूलभूत आवश्यकताओं को भी वहन करने में असमर्थ हैं। भूखे भारतीयों की संख्या 2018 में 190 मिलियन से बढ़कर 2022 में 350 मिलियन हो गई।
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दावोस, स्विट्जरलैंड में इस साल के वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की शुरुआत के साथ जारी ऑक्सफैम इंटरनेशनल की "सर्वाइवल ऑफ द रिचेस्ट" रिपोर्ट के अनुसार भारतीय अरबपतियों की संख्या 2020 में 102 से बढ़कर 166 हो गई है, जहां ये वर्ष 2000 में केवल 9 थी। भारत में सबसे अमीर 1 प्रतिशत के पास अब देश की कुल संपत्ति का 40 प्रतिशत से अधिक हिस्सा है और सिर्फ 5 प्रतिशत भारतीयों के पास देश की 60 प्रतिशत से अधिक संपत्ति है।
रिपोर्ट के अनुसार, 2021-22 में जीएसटी में कुल 14.83 लाख करोड़ रुपये का लगभग 64 प्रतिशत नीचे की 50 प्रतिशत आबादी से आया, जिसमें शीर्ष 10 से केवल 3 प्रतिशत जीएसटी आया। लैंगिक असमानता पर, रिपोर्ट में कहा गया है कि महिला श्रमिकों को एक पुरुष कार्यकर्ता द्वारा कमाए गए प्रत्येक 1 रुपये के लिए केवल 63 पैसे मिलते हैं।
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जिस वक्त दुनिया एक साथ कोविड महामारी और जलवायु परिवर्तन, रहने की बढ़ती लागत, यूक्रेन-रूस युद्ध जैसे संकटों से घिरी हुई है, फिर भी दुनिया के सबसे अमीर और अमीर हो गए हैं तथा कॉर्पोरेट मुनाफा लगातार बढ़ रहा है। एक दशक में अरबपतियों की संपत्ति लगभग 10 गुना बढ़ गई। मोटे तौर पर 20 प्रतिशत भारतीय अरबपति निजी स्वास्थ्य सेवा और दवा उद्योग से आते हैं, जिसे कोविड -19 महामारी की शुरुआत के बाद बहुत बढ़ावा मिला था। अडानी समूह के अध्यक्ष गौतम अडानी की संपत्ति अकेले महामारी के दौरान आठ गुना बढ़ गई।
शिक्षा-स्वास्थ्य की चुनौतियां
रिपोर्ट में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक समान पहुंच के मामले में, भारत 163 देशों में से 135वें स्थान पर है। गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा तक समान पहुंच के मामले में, भारत को 163 देशों में से 145वें स्थान पर रखा गया था। आवश्यक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच के मामले में देश की रैंक 123 है।
भारत में गरीब, जीवित रहने के लिए मूलभूत आवश्यकताओं को भी वहन करने में असमर्थ हैं। भूखे भारतीयों की संख्या 2018 में 190 मिलियन से बढ़कर 2022 में 350 मिलियन हो गई। लेकिन ये असमानता अचानक से नहीं बढ़ी है, 1991 के बहुप्रचारित उदारीकरण के दौरान श्रम की जगह पूंजी और अकुशल श्रम की जगह कुशल श्रम को बढ़ावा देने वाली नीतियों के चलते ये तेजी से बढ़ रही।
सरकारें, गरीबी मिटाने की बातें तो करती रहीं, परंतु मिटा नहीं पाईं। जब अस्सी करोड़ भारतीयों को अनाज मुफ्त देना पड़ रहा तो हम इस स्थिति को समझ सकते हैं। देश की साठ फीसद से अधिक आबादी ग्रामीण है, कुल साढ़े छह लाख गांव हैं और ढाई लाख पंचायतें, फिर भी कुछ मुट्ठी भर लोगों के पास देश का धन है, विकास की गंगा भी वहीं बह रही, शहर तो स्मार्ट बनाए जा रहे हैं मगर कई बुनियादी समस्याओं से गांव और उसकी पंचायतें आज भी लड़ रहीं।
देश में केवल करोड़पतियों की संख्या बढ़ने से काम नहीं बनेगा। वैश्विक अर्थव्यवस्था में भले भारत की स्थिति पांचवीं हो गई हो, मगर विकास का हिस्सा बहुतों तक अभी पहुंच नहीं रहा है।
चुनौतियों से निपटने के लिए ठोस कदम की जरूरत
नि: संदेह भारत एक अत्यधिक विषमतापूर्ण अर्थव्यवस्था वाला देश है, परन्तु असमानता हद से ज्यादा बढ़ जाए तो समाज में क्लेश-तनाव बढ़ता है और समग्र विकास पर नकारात्मक प्रभाव भी होता है। अपराध की दर बढ़ती है। यह अनिवार्य है कि भारत स्वयं को आय असमानता की बेड़ियों से मुक्त करे ताकि सभी आर्थिक वर्गों में समृद्धि सुनिश्चित की जा सके।
अर्जेंटीना में पिछले साल धनाढ्य लोगों पर खास टैक्स लगाने का कानून पारित हुआ। फिलीपींस, वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे पड़ोसी देशों ने अपनी कुल संपत्ति में शीर्ष 10 प्रतिशत आबादी का हिस्सा नए कॉर्पोरेट करों से कम कर दिया है। केंद्रीय वित्त मंत्री एक फरवरी को बजट पेश करने जा रही हैं तो ऐसे में धनी लोगों पर अतिरिक्त टैक्स लगाकर आर्थिक न्याय की दिशा में ढोस कदम उठाना चाहिए।
सरकार को अपनी कल्याणकारी योजनाओं पर कहीं ज्यादा खर्च करना होगा। स्वास्थ्य और शिक्षा पर कहीं ज्यादा राशि आवंटित करनी होगी। शीर्ष 100 भारतीय अरबपतियों पर 2.5 प्रतिशत कर लगाने या शीर्ष 10 भारतीय अरबपतियों पर 5 प्रतिशत कर लगाने से ही सभी बच्चों को मुफ्त में स्कूली शिक्षा मिल सकती है।
सरकार को 2025 तक स्वास्थ्य क्षेत्र के बजटीय आवंटन को बढ़ाकर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 2.5 प्रतिशत और शिक्षा को सकल घरेलू उत्पाद का 6 प्रतिशत करना चाहिए , जैसा कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति और राष्ट्रीय शिक्षा नीति में प्रतिबद्ध है।
आजादी के 75 वर्ष बाद भी हमारे देश में अमीर और गरीब के बीच आर्थिक असमानता की खाई लगातार बढ़ती जा रही है। गरीब-अमीरों की तुलना में अनुपातहीन रूप से उच्च करों का भुगतान कर रहे हैं, समय आ गया है कि अमीरों और कॉर्पोरेट घरानों पर कर बढ़ाए जाएं। साथ ही आर्थिक असमानता को खत्म करने के लिए अब आम आदमी को भी पहल करनी होगी।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।