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भूकम्प के खतरे के साए में हिमालयी लोग

Thu, 04 Jan 2024 02:42 PM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Thu, 04 Jan 2024 02:42 PM IST
सार

जापान के लोग भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदाओं के साथ जीना सीख चुके हैं, इसलिए वहां बड़े भूकम्प में भी जन और धन की बहुत कम हानि होती है। जबकि भारत में मध्यम परिमाण का भूकम्प भी भारी तबाही मचा देता है।

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Earthquake Update: Danger of Earthquake in Himalaya
भारत की संपूर्ण हिमालयी बेल्ट 8.0 से अधिक तीव्रता वाले बड़े भूकंपों के लिए अतिसंवेदनशील मानी जाती है। - फोटो : istock

विस्तार

हाल ही में जापान में आए विनाशकारी भूकम्प ने भारतीय हिमालय में बसे लोगों को भी डरा दिया है। डरना भी स्वाभाविक ही है, क्योंकि विश्व की सबसे युवा पर्वत श्रृंखला हिमालय भी भूगर्वीय हलचलों के कारण भूकम्प की दृष्टि से कोई कम संवेदनशील नहीं है। भूवैज्ञानिकों का यहां तक मानना है कि हिमालय के गर्भ में इतनी भूगर्वीय ऊर्जा जमा है कि अगर वह अचानक एक साथ बाहर निकल गई तो उसका विनाशकारी प्रभाव कई परमाणु बमों के विस्फोटों से भी अधिक हो सकता है।

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डराने वाली बात तो यह है कि भूगर्वीय ऊर्जा या साइस्मिक एनर्जी न तो छोटे मोटे भूकम्पों से खाली या कम हो सकती है और ना ही सीमा से अधिक समय तक भूगर्व में जमा रह सकती है। भूगर्वीय चट्ठानों के टकराव और घर्षण से यह ऊर्जा निरन्तर बढ़ती जाती है। चूंकि जापान के लोग भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदाओं के साथ जीना सीख चुके हैं, इसलिए वहां बड़े भूकम्प में भी जन और धन की बहुत कम हानि होती है। जबकि भारत में मध्यम परिमाण का भूकम्प भी भारी तबाही मचा देता है। कारण प्रकृति के साथ सामंजस्य और जन जागरूकता की कमी है।
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15 दिनों में आए 74 भूकम्प

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के भूकम्प के चार्ट पर नजर डालें तो 15 दिसम्बर 2023 से लेकर 1 जनवरी 2024 की 15 दिन की अवधि में भारत में कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक रिक्टर पैमाने पर 1.8 से लेकर 6 परिमाण तक के कुल 74 भूकम्प दर्ज हैं, और इनमें से सर्वाधिक 64 भूकम्प नेपाल और हिमालयी राज्यों में आए हैं। क्योंकि नेपाल उत्तराखण्ड जैसे हिमालयी राज्यों से जुड़ा है और इसकी साइस्मिक स्थिति इन्हीं राज्यों के समान है, इसलिए हम नेपाल की गिनती हिमालयी राज्यों से कर रहे हैं। हिमालयी राज्यों में भी सर्वाधिक 24 भूकम्प जम्मू-कश्मीर और लेह लद्दाख में दर्ज हुए हैं। इनमें भी सर्वाधिक 11 भूकम्पों का केन्द्र किस्तवाड़ रहा है। इनके अलावा उत्तराखण्ड में 6 और
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हिमाचल में 5 भूकम्प दर्ज हुए हैं। इसी तरह पूर्वोत्तर में ईस्ट और वेस्ट गारोहिल्स, मणिपुर, अरुणाचल, मीजोरम और नागालैंड में भूकम्पों की आवृत्ति दर्ज हुई है। नेपाल में 4 नवम्बर से लेकर 8 नवम्बर 2023 तक 2.8 से लेकर 5.6 परिमाण के 17 भूकम्प दर्ज किए गए। वहां एक ही दिन 4 नवम्बर को 2.8 से लेकर 3.7 परिमाण के 8 भूकम्प दर्ज किए गए।

भयंकर भूकम्प की जद में हैं हिमालयी लोग

भारत की संपूर्ण हिमालयी बेल्ट 8.0 से अधिक तीव्रता वाले बड़े भूकंपों के लिए अतिसंवेदनशील मानी जाती है। इसका मुख्य कारण भारतीय प्लेट का यूरेशियन प्लेट की ओर लगभग 50 मिमी प्रति वर्ष की दर से खिसकना है। हिमालय क्षेत्र और सिंधु-गंगा के मैदानों के अलावा, यहां तक कि प्रायद्वीपीय भारत में भी विनाशकारी भूकंपों का खतरा है। देश के वर्तमान भूकंपीय जोनेशन मैप के अनुसार भारतीय भूभाग का 59 प्रतिशत हिस्सा सामान्य से बहुत बड़े भूकम्पों के खतरे की जद में हैं।

भारत में भी संपूर्ण हिमालय क्षेत्र को रिक्टर पैमाने पर 8.0 अंक की तीव्रता वाले बड़े भूकंपों के प्रति प्रवृति माना गया है। इस क्षेत्र में सन् 1897 शिलांग (तीव्रता 8.7), 1905 में कांगड़ा (तीव्रता 8.0), 1934 बिहार-नेपाल (तीव्रता 8.3) और 1950 असम-तिब्बत (तीव्रता 8.6) के बड़े भूकम्प आ चुके हैं। नेपाल में 25 अप्रैल 2015 का 8.1 परिमाण का अब तक का सबसे भयंकर भूकम्प था जिसके कारण 8,649 लोग मारे गए थे और 2,952 घायल हुए थे।

Earthquake Update: Danger of Earthquake in Himalaya
भूकम्प जैसी प्राकृतिक घटनाओं को रोका तो नहीं जा सकता मगर प्रकृति के साथ रहना सीख कर बचाव अवश्य किया जा सकता है। - फोटो : istock

हजारों परमाणु बमों के बराबर होता है एक बड़ा भूकम्प

भूकंप में निकलने वाली ऊर्जा मुख्य रूप से पृथ्वी की सतह के नीचे टेक्टोनिक प्लेटों की गति या हलचल से उत्पन्न होती है। यह गतिविधि भारी मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न करती है। तुलना के लिए, परमाणु विस्फोट से निकलने वाली ऊर्जा, जैसे कि परमाणु बम विखंडन या संलयन प्रतिक्रियाओं के माध्यम से परमाणु ऊर्जा की तीव्र रिहाई से प्राप्त होती है। परमाणु विस्फोट भी शक्तिशाली होते हैं, लेकिन उनका ऊर्जा उत्पादन आमतौर पर किसी बड़े भूकंप की तुलना में बहुत कम होता है। अब तक सबसे शक्तिशाली परमाणु बम विस्फोट जार बॉम्बा का था जिससे उत्पन्न अनुमानित ऊर्जा लगभग 50 मेगाटन टीएनटी (समतुल्य ऊर्जा) मानी गई थी। इसके विपरीत, अब तक दर्ज किए गए सबसे शक्तिशाली भूकंपों में से कुछ ने हजारों परमाणु बमों के बराबर ऊर्जा जारी की है।

उदाहरण के लिए 1960 में चिली में वाल्डिविया भूकंप की तीव्रता रिक्टर पैमाने पर 9.5 थी और इससे हजारों परमाणु बमों के बराबर अनुमानित ऊर्जा निकली थी। भूवैज्ञनिकों के अनुसार भूकम्प की 1.0 की तीव्रता में वृद्धि के साथ भूकंप द्वारा जारी ऊर्जा लगभग 31 गुना बढ़ जाती है। जैसे 8.0 तीव्रता का भूकंप 7.0 तीव्रता के भूकंप द्वारा रिलीज ऊर्जा का लगभग 31 गुना बढ़ जाती है। 6.0 तीव्रता के भूकंप की तीव्रता की कोई ऊपरी या निचली सीमा नहीं है। दरअसल, बहुत छोटे भूकंप की तीव्रता एक ऋणात्मक संख्या भी हो सकती है। आमतौर पर 5.0 से अधिक तीव्रता वाले भूकंपों के कारण जमीन में इतनी तेज गति होती है कि संरचनाओं को काफी नुकसान हो सकता है। बहरहाल भारतीय हिमालय क्षेत्र में जिस विनाशकारी भूकम्प की आशंका जताई जा रही है उसकी शक्ति कई परमाणु बमों से अधिक हाने का आशंका व्यक्त की गई है।

जीना है तो प्रकृति के साथ जीना सीखो

भूकम्प जैसी प्राकृतिक घटनाओं को रोका तो नहीं जा सकता मगर प्रकृति के साथ रहना सीख कर बचाव अवश्य किया जा सकता है। दरअसल आदमी को भूकम्प नहीं बल्कि उसी के द्वारा अपनी सुरक्षा और आश्रय के लिए बनाया गया मकान मारता है। 30 सितंबर 1993 को महाराष्ट्र के लातूर क्षेत्र में 6.2 परिमाण का भूकंप आता है तो उसमें लगभग 10 हजार लोग मारे जाते हैं और 30 हजार से अधिक लोगों के घायल होने के साथ ही 1.4 लाख लोग बेघर हो जाते हैं। जबकि 28 मार्च 1999 को चमोली में लातूर से भी बडा 6.8 मैग्नीट्यूट का भूकंप आता है तो उसमें केवल 103 लोगों की जानें जाती हैं और 50 हजार मकान क्षति ग्रस्त होते हैं। 

इसी तरह 20 अक्टूबर 1991 के उत्तरकाशी के 6.6 परिमाण के भूकंप में 786 लोग मारे जाते हैं और 42 हजार मकान क्षतिग्रस्त होते हैं। जबकि 26 जनवरी 2001 को गुजरात के भुज में रिक्टर पैमान पर 7.7 परिमाण का भूकंप आता है तो उसमें कम से कम 20 हजार लोग मारे जाते हैं और 1.67 लाख लोग घायल हो जाते हैं। लातूर और भुज में हुई तबाही घनी आबादी और विशालकाय इमारतों के कारण हुई जिनमें भूकम्परोधी व्यवस्था नहीं थी। इसलिए जरूरी है कि लोगों को सवाधान करने के साथ ही भूकम्प के प्रति जागरूक किया जाय ताकि वे अपना बचाव स्वयं कर सकें।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकताु, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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