नशे की गिरफ्त में क्यों आ रहा है मप्र का बचपन? प्रदेश के 5 जिलों के हजारों बच्चे हो रहे शिकार
मप्र के उत्तरी अंचल के 5 जिले शिवपुरी, गुना,अशोकनगर,राजगढ़, औऱ श्योपुर नशे की ऐसी गिरफ्त में समाते जा रहे हैं। जहां से इन जिलों की सामाजिक, आर्थिक व्यवस्था को चुनौतियां तो मिलनी ही हैं साथ ही कानून व्यवस्था के लिए भी गंभीर समस्या भविष्य में खड़ी होने जा रही है।
त्रासदी का आलम यह है स्मेक,चरस, के इस कारोबार में पुलिस महकमा भी शामिल है और पीड़ित वर्ग में 18 साल से कम आयु वर्ग के हजारों बालक हैं। हाल ही में एक 17 साल की बालिका शिवानी शर्मा की मौत स्मेक के ओवरडोज से हुई है। शिवपुरी में बाल अपचारी बालकों द्वारा तीन लोगों की हत्याएं जिला मुख्यालय पर सिर्फ इसलिए की जा चुकी है क्योंकि इन बालकों को नशे की लत थी और सामने वाले व्यक्तियों ने उन्हें पैसे देने से इंकार कर दिया।
हाल ही में शिवपुरी जिला मुख्यालय पर आम नागरिकों का संगठित प्रतिरोध भी इस नशे के कारोबार के विरुद्ध मुखर हुआ है। सांसद, विधायक से लेकर तमाम नागरिक संगठन सड़कों पर उतरकर नशे के विरुद्ध लामबंद हो रहे हैं।
हजारों बच्चे हो रहे शिकार
शिवपुरी, गुना, राजगढ़ जिलों में अनुमान है कि करीब 10 हजार से ज्यादा बच्चे इस समय स्मेक के शिकंजे में फंस चुके है।अकेले शिवपुरी जिला मुख्यालय पर ही करीब 100 से ज्यादा ऐसे बालकों को चिन्हित किया गया है जिनका उपचार उनके परिजन इस लत के बाद करा रहे हैं। सामाजिक त्रासदी यह है कि अधिकतर बच्चों की उम्र 18 साल से कम या थोड़ी बहुत ही अधिक है। जाहिर है समस्या सिर्फ नशे तक नही है बल्कि समाज के भविष्य से भी जुड़ी है।
शिवपुरी जिले में जिस बालिका की मौत स्मेक के ओवरडोज़ से होना बताई गई है उसके छः साथियों को पुलिस ने हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया है। उनका जब एचआईवी परीक्षण किया गया तो सभी पॉजिटिव पाए गए क्योंकि ये सभी समूह में एक ही सिरिंज से स्मेक लेते थे। समझा जा सकता है कि समस्या किस बहुआयामी स्तर पर खड़ी हो रही है, जिस शिवानी शर्मा की मौत हुई है उसके शारीरिक शोषण की बात भी सामने आई है।
शिवपुरी औऱ आसपास के जिलों में हाल ही में पुलिस ने दबाब बढ़ने के बाद करोडों की स्मेक,हेरोइन पकड़ी है। शिवपुरी के पुलिस कप्तान विवेक अग्रवाल की सिफारिश पर आईजी राजाबाबू सिंह ने छः पुलिसकर्मियो को सस्पेंड कर दिया है। इन सभी पर आरोप है की ये नशे के कारोबारियों से जुड़े हुए हैं।सवाल यह है कि क्या अचानक मप्र के इन जिलों में नशे का कारोबार जम गया क्या?
दरअसल, ऐसा नहीं है। करीब तीन साल से इन जिलों में इस अवैध कारोबार ने जड़े जमाई जब कुछ आला पुलिस अफसरों ने इसे अपना सरंक्षण दिया।
पंजाब में कैसे खत्म हो रहा नशे का नेटवर्क
पंजाब में कैप्टिन अमरिंदर की सरकार आने के बाद वहां जिस बड़े पैमाने पर नशे के नेटवर्क पर सख्ती हुई उसके चलते राजस्थान पर कारोबारियों का फोकस बढ़ा जो पाकिस्तान का सीमावर्ती राज्य है। मप्र के ये सभी जिले राजस्थान से सटे हुए हैं और लोकव्यवहार में भी इन जिलों के लिए अंतरराज्यीय सीमा आड़े नहीं आती है।
यही कारण है कि राजस्थान से बड़े पैमाने पर स्मेक,चरस,जैसे नशीले पदार्थ मप्र के इन जिलों में आ रहे हैं पुलिस के कुछ आला अफसर जो कुछ समय पूर्व तक इन जिलों में बड़े जिम्मेदार पदों पर रहे उन्होंने न केवल इस अवैध कारोबार से आंखे फेर रखी थी बल्कि इन गतिविधियों के एवज में बड़ा धन भी कमाया।
ऐसा नहीं की सरकार में बैठे शीर्ष लोगों को जानकारी नहीं थी, लेकिन बीजेपी और कांग्रेस दोनों दलों के नेता मुंह में दही जमाकर बैठे रहे। नतीजतन आज हालात इतने खराब हो चुके हैं की हर परिवार अपने बच्चों को सशंकित भाव से देखने को विवश है।
चौंकाने वाले हैं आंकड़े
शिवपुरी, गुना बाल कल्याण समितियों के आंकड़े बड़े ही चौंकाने वाले हैं। समिति की सदस्य श्रीमती सरला वर्मा के अनुसार दोनो जिलों में बहुत ही भयानक हालात है न केबल एलीट क्लास बल्कि मजदूरी करने वाले कचरा पन्नी बीनने वाले परिवारों के बच्चे भी इस नशे की जद में आ चुके हैं।
श्रीमती वर्मा बताती है कि करीब 100 से ज्यादा बच्चों की काउंसलिंग वह समिति के आगे कर चुकी हूं। समझा जा सकता है कि समस्या किस व्यापक स्तर पर भविष्य के लिए खड़ी होने जा रही है।
जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड से जुड़े रहे बाल अधिकार कार्यकर्ता और पत्रकार रंजीत गुप्ता के अनुसार अंचल में बहुत ही त्रासदपूर्ण हालत हैं। पुलिस ने पहले तो इस कारोबार को खुद ही जमने दिया और बाद में बड़ी संख्या में खुद पुलिस कर्मी इस कारोबार में उतर आए। समस्या उन बच्चों को लेकर बढ़ी है जो बहुत ही गरीब घरों से हैं और मजदूरी या भीख मांगकर जी रहे हैं। सर्वाधिक संख्या इसी तबके की है जो स्मैक का आदी हो चुका है।
अंचल की कानून व्यवस्था के लिए ये बच्चे खतरा बनेंगे ही औऱ बाल सरंक्षण की हमारी संसदीय वचनबद्धता के लिए भी यह स्थिति बेहद शर्मनाक है। समाजसेवी औऱ चिकित्सक डॉ गोविंद सिंह के अनुसार मप्र के इस उत्तरी अंचल में स्मेक के कारोबार ने दबे पांव एड्स की जमीन भी निर्मित कर दी है क्योंकि स्मैक के पावडर को एविल इंजेक्शन के साथ घोलकर सीरिंज से लिया जाता है और जागरूकता के आभाव में बच्चे एक ही सिरिंज से स्मेक का डोज लेकर इस बीमारी को आमंत्रित कर रहे हैं।
शिवानी की मौत के बाद आरोपी बनाए गए शिवपुरी के 6 युवक युवतियों में एचआईवी पॉजिटिव इसीलिए पाया गया कि वे सभी एक या दो सिरिंज से ही स्मैक लेते थे। जाहिर है हजारों की संख्या में ऐसे मामले सामने आ सकते हैं जब ऐसे बच्चों का चिकित्सकीय परीक्षण किया जाएगा, तब ये आंकड़े हमे शर्म से सिर झुकाने के लिए पर्याप्त होंगे।
कहां से आ रहा है ये नशा?
इस इलाके में यह नशा राजस्थान से आ रहा है। एक सुगठित रैकेट इसे इस सुनियोजित तरीके से संचालित कर रहा है कि गांव-गांव तक इसके तलबगार पैदा हो गए हैं। कुछ सम्पन्न परिवार तो जानते हुए भी मजबूर हैं। वे खुद नियमित पैसा इन्हें देते है ताकि बाहर जाकर बदनामी भरे कामों से बच्चे को बचाया जा सके।
स्मैक का डोज यहां टिकिट कोड वर्ड के रूप में मिलता है। परचून की दुकानों से लेकर मेडिकल स्टोर, सरकारी भांग की दुकानों पर सब जगह यह 100 से 500 रुपए के टिकट प्रचलन में है। मेडिकल स्टोर्स पर भी टिकिट के साथ पूरी किट जिसमे एविल का इंजेक्शन निडिल सब उपलब्ध रहती है। अकेले गुना औऱ शिवपुरी जिले में एविल इंजेक्शन की खपत इंदौर, भोपाल जैसे बड़े शहरों से ज्यादा बताई गई है क्योंकि इसी के साथ स्मैक को घोलकर शरीर मे इंजेक्शन के साथ लिया जा रहा है।
हाल ही में वैकल्पिक रूप से शिवपुरी के पुलिस कप्तान के रूप में पदस्थ किए गए विवेक अग्रवाल की छानबीन में पता चला है कि तमाम पुलिसकर्मियों की बातचीत स्मैक का नशा करने वाले औऱ मृतका शिवानी के साथ होती थी। इनमें से 6 पुलिसकर्मियों को अभी निलंबित किया गया है। अगर इन सभी प्रभावित जिलों में इसी तर्ज पर गोपनीय जांच सरकार के स्तर पर हो तो इस नेटवर्किंग को ध्वस्त करने में काफी मदद मिल सकती है क्योंकि यह भी तथ्य है कि बगैर पुलिस सरंक्षण के कोई भी अवैध कारोबार हिंदुस्तान में सम्भव नही है।
अगर वाकई मप्र में सरकार मे बैठे लोग अपने ही सहोदरों के लिए चिंतित हैं तो उन्हें इन सभी जिलों में तत्काल बड़ी कारवाई बगैर दबाव के सुनिश्चित करनी पड़ेगी। विवेक अग्रवाल जैसे नए आईपीएस अफसरों को फ्री हैंड देकर जिलों में काम कराना होगा नहीं तो आने वाले समय मे मप्र का यह उत्तरी अंचल पंजाब की तरह उड़ता नजर आएगा और तब तक बहुत देर हो चुकी होगी जबकि सत्ता के शिखर पर बैठे लोग सिर्फ मातमपुर्सी के लायक ही रह पाएंगे।
(लेखक जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के अधीन गठित चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के अध्यक्ष हैं)
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।