जन्मदिन विशेष: भारतीय अर्थव्यवस्था में डॉक्टर मनमोहन सिंह का अप्रतिम योगदान
देश के लिए डॉक्टर मनमोहन सिंह का सबसे बड़ा योगदान वित्त मंत्री के रूप में आर्थिक सुधारों की शुरुआत करना है। वर्ष 1991 में भारत का अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संतुलन निराशाजनक घाटे में था। 1991 में इसका विदेशी कर्ज 35 बिलियन डॉलर से दोगुना होकर 69 बिलियन डॉलर हो गया था।
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भारत के वित्तमंत्री और प्रधानमंत्री के पद पर रहे मनमोहन सिंह भारत में आर्थिक उदारीकरण के प्रणेता के तौर पर जाने जाते हैं। जब अर्थव्यवस्था की बात हो तो डॉक्टर मनमोहन सिंह का जिक्र होना लाजमी ही है। भारत के प्रधानमंत्री के रूप में उनके दो कार्यकालों पर लोगों की भले ही आलोचनात्मक राय हो सकती है, लेकिन इस तथ्य से कोई इनकार नहीं कर सकता कि भारतीय अर्थव्यवस्था को बचाने व बढ़ने में उनका योगदान अहम है।
इतने पद पर रह चुके हैं मनमोहन सिंह
डॉक्टर सिंह विदेश व्यापार मंत्रालय में आर्थिक सलाहकार, वित्त मंत्रालय में मुख्य आर्थिक सलाहकार और वित्त मंत्रालय के सचिव के रूप में कार्य किया। उन्होंने 1976 से 1980 तक भारतीय रिजर्व बैंक के निदेशक और फिर 1982 से 1985 तक गवर्नर के रूप में कार्य किया। वह योजना आयोग के उपाध्यक्ष और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष भी रह चुके हैं, उन्होंने कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) के तहत भारत के 14वें प्रधानमंत्री के रूप में कार्य किया।
वह 2004 से 2009 और 2009 से 2014 तक लगातार दो बार प्रधानमंत्री पद पर रहे। प्रधानमंत्री बनने से तेरह साल पहले वह भारत के वित्त मंत्री थे, लेकिन मनमोहन सिंह अपने बायोडाटा में दी गई योग्यताओं से कहीं बढ़कर थे।
जब बतौर वित्त मंत्री की आर्थिक सुधारों की शुरुआत
देश के लिए डॉक्टर मनमोहन सिंह का सबसे बड़ा योगदान वित्त मंत्री के रूप में आर्थिक सुधारों की शुरुआत करना है। वर्ष 1991 में भारत का अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संतुलन निराशाजनक घाटे में था। 1991 में इसका विदेशी कर्ज 35 बिलियन डॉलर से दोगुना होकर 69 बिलियन डॉलर हो गया था। भारत के पास पैसा और समय दोनों बहुत कम थे। इसके पास विदेशी मुद्रा भंडार $6 बिलियन से भी कम था - जो देश के केवल दो सप्ताह के आयात को पूरा करने के लिए पर्याप्त था। विदेशी पूंजी निवेश पर सरकारी नियंत्रण था। आयात के लिए जटिल लाइसेंसिंग सिस्टम था।
चीन और पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध, शेयर बाज़ार में हो रहे घपले, उत्पादन के क्षेत्र में सरकारी नियंत्रण आदि अर्थव्यवस्था की रफ्तार को थामे हुए थे, देश आर्थिक पतन के कगार पर था और इसे बचाने के लिए उन्होंने जुलाई 1991 में रुपये का दो बार अवमूल्यन का निर्णय लिया, पहले लगभग 9 प्रतिशत, उसके बाद 11 प्रतिशत का अवमूल्यन किया गया।
रुपये के अवमूल्यन के साथ, हमारा निर्यात सस्ता हो गया, जो हमारे बिगड़ते व्यापार असंतुलन के लिए एक आवश्यक सुधार है। हमारे चालू खाते के घाटे से निपटने के लिए एक आपातकालीन उपाय के रूप में, भारतीय रिज़र्व बैंक ने चालू खाते के घाटे को कम करने के लिए लगभग $400 मिलियन जुटाने के लिए बैंक ऑफ इंग्लैंड के पास अपनी सोने की हिस्सेदारी गिरवी रख दी।
इसके बाद भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधारों की एक श्रृंखला डॉक्टर सिंह ने शुरू की जिसे उन्होंने "मानवीय चेहरे के साथ सुधार" कहा। औद्योगिक नीति, 1991 की शुरुआत के साथ लाइसेंस राज को खत्म करने की प्रस्तावना लिखी गई। इस संकट से उबरने के लिए मनमोहन सिंह ने इस बजट में भारतीय बाज़ार को विदेशी कंपनियों के लिए खोल दिए।
इस कदम से सरकार को चंद महीनों में ही पहली सफलता मिली, जब दिसंबर 1991 में भारत सरकार विदेशों में गिरवी रखा सोना छुडवा कर आरबीआई को सौंपने में कामयाब रही। विदेशी पूंजी के इस प्रवाह ने देश को बदलना शुरू किया, लोगों के पास ज्यादा पैसा आया, जीवनशैली बदली।
दुनिया के बड़े ब्रांड्स ने भारत में दस्तक दीय़ नौकरियां और उद्योग बढ़े। ग्लोबलिजेशन की यह नयी व्यवस्था ‘सर्वाइबल आफ द फिटेस्ट’ की व्यवस्था है। जब देश का राजकोषिय घाटा सकल घरेलू उत्पाद के 8.5 फीसदी के आस-पास था, तब सिंह ने उसे सिर्फ एक साल के अंदर 5.9 फीसदी तक ला दिया था। देश में ग्लोबलाइजेशन की शुरुआत 1991 में सिंह ने ही की थी। उन्होंने भारत को दुनिया के बाजार के लिए तो खोला ही, बल्कि निर्यात और आयात के नियमों को भी सरल बनाया।
मनमोहन सिंह ने तीन कैटेगरी में बड़े बदलाव किए - उदारीकरण, वैश्वीकरण और निजीकरण जिसके तहत विदेश व्यापार उदारीकरण, वित्तीय उदारीकरण, कर सुधार और विदेशी निवेश जैसे बदलाव किये गए थे। आसान शब्दों में कहें तो किसी वस्तु का कितना उत्पादन होगा और उसकी कितनी कीमत होगी, इसका फैसला सरकार नहीं बल्कि बाज़ार पर छोड़ दिया गया।
स्वर्णिम 10 वर्ष
2004 से 2014 जब वो प्रधानमंत्री थे, भारतीय अर्थव्यवस्था के 10 स्वर्णिम वर्ष थे। इस उल्लेखनीय दशक में भारत की जीडीपी औसतन 8.1% की दर से बढ़ी। 2006-07 में वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि रिकॉर्ड 10.08% तक पहुंच गई। 2007 में, भारत ने 9% की अपनी उच्चतम सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर हासिल की और दुनिया में दूसरी सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था के रूप में उभरा।
2005 में, सिंह की सरकार ने वैट कर लागू किया जिसने जटिल बिक्री कर का स्थान ले लिया। सूचना का अधिकार अधिनियम 2005, राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) 2005, भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई/आधार) 2009 , महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, 2005 (मनरेगा), बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (आरटीई) ), 2011 में शहरों में गरीबों और बेघरों को आवास प्रदान करने वाली राजीव आवास योजना (आरएवाई), राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013, आदि उनके प्रमुख कदम हैं जिन्होंने देश को बदल दिया।
डॉक्टर मनमोहन सिंह ने भारतीय अर्थव्यवस्था में बड़े पैमाने पर आर्थिक सुधारों की कवायद की और उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था की ओवरहॉलिंग में महत्वपूर्ण योगदान दिया है इससे कोई इंकार नहीं कर सकता।
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