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डॉ. बी.आर. अंबेडकर पुण्यतिथि विशेष: एक अर्थशास्त्री के रूप में भी याद किए जाते हैं बाबा साहेब

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Dr. babasaheb ambedkar death anniversary know facts and life in hindi
डॉ. भीमराव अंबेडकर एक अर्थशास्त्री भी थे। - फोटो : सोशल मीडिया

छह दिसंबर यानी आज डॉ. बीआर अंबेडकर का महापरिनिर्वाण दिवस है। बाबासाहेब अम्बेडकर को ज्यादातर भारत के संविधान के लिए मसौदा समिति के अध्यक्ष के रूप में उनके अद्वितीय योगदान के लिए याद किया जाता है, परन्तु उनके एक पहलू का जिक्र बहुत ही कम होता है कि वह एक अर्थशास्त्री भी थे।

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डॉ. अम्बेडकर अर्थशास्त्र के विषय में औपचारिक उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले शुरुआती भारतीयों में से एक थे। उन्होंने 1917 में कोलंबिया विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में पीएचडी की पढ़ाई की और बाद में उन्हें 1921 में लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स द्वारा अर्थशास्त्र में डीएससी से सम्मानित किया गया।

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डॉ. अंबेडकर ने 1915 में एमए की डिग्री के लिए कोलंबिया यूनिवर्सिटी में 42 पेज का एक डेज़र्टेशन सबमिट किया था। “एडमिनिस्ट्रेशन एंड फाइनेंस ऑफ द ईस्ट इंडिया कंपनी” नाम से लिखे गए इस रिसर्च पेपर में उन्होंने बताया था कि ईस्ट इंडिया कंपनी के आर्थिक तौर-तरीके आम भारतीय नागरिकों के हितों के किस कदर खिलाफ हैं।

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बाबा साहेब की आर्थिक मुद्दों पर समझ 

बाबा साहेब की मौद्रिक प्रणाली की समझ उनकी पुस्तक, “द प्रॉब्लम ऑफ रुपी: इट्स ओरिजिन एंड सॉल्यूशन” से स्पष्ट होती है, जिसे उनके डीएससी शोध प्रबंध के हिस्से के रूप में लिखा गया है। यह पुस्तक उस समय भारतीय मुद्रा की समस्या का विश्लेषण करती है जब ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार और भारतीय व्यापारिक हितों के बीच टकराव हुआ था।


दरअसल, इस पुस्तक के तहत उन्होंने विनिमय दर और कीमतों में स्थिरता के लिए तर्क दिया। यहां तक कि उन्होंने हिल्टन यंग कमीशन के सामने अपनी दलीलें भी पेश कीं, जिन्हें भारतीय रिजर्व बैंक बनाते समय ध्यान में रखा गया था।

डॉ.अम्बेडकर का सार्वजनिक वित्त के क्षेत्र में एक अग्रणी कार्य था और उनके विस्तृत और वस्तुनिष्ठ विश्लेषण ने केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों में एक अंतर्दृष्टि प्रदान की। उनके अध्ययन ने केंद्र और राज्यों के बीच आधुनिक संबंधों के लिए एक आधार प्रदान किया है और स्वतंत्र भारत में कई वर्षों के लिए

वित्त आयोगों के लिए एक अंतर्निहित मार्गदर्शक रही है। उन्होंने तर्क दिया कि उच्च उत्पादन कर, भूमि राजस्व कर, उत्पाद शुल्क की उपस्थिति के कारण भारतीय कर प्रणाली दोषपूर्ण है और यह भी विभिन्न वर्गों के बीच भेदभाव और असमानता के सिद्धांत पर आधारित है।

 

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डॉ. अम्बेडकर ने स्वतंत्र मजदूर पार्टी, 1936 के घोषणापत्र में कराधान पर अपने विचार व्यक्त किए। - फोटो : PTI

कृषि अर्थशास्त्र में योगदान 19वीं शताब्दी के प्रारंभ में भारतीय कृषि की प्रमुख समस्या निम्न उत्पादकता थी। 1917 में एक समिति नियुक्त की गई और इसने सुझाव दिया कि भूमि जोत को समेकित किया जाना चाहिए।

अम्बेडकर ने अपने पेपर, “स्मॉल होल्डिंग्स इन इंडिया एंड देयर रेमेडीज (1918)” में तर्क दिया कि समेकित भूमि राज्य के स्वामित्व वाली होनी चाहिए और बिना किसी भेदभाव के मूल किसानों को समान रूप से वितरित की जानी चाहिए।

डॉ. अम्बेडकर ने स्वतंत्र मजदूर पार्टी, 1936 के घोषणापत्र में कराधान पर अपने विचार व्यक्त किए। वे भू-राजस्व प्रणाली, इसकी प्रणाली और अन्य करों के विरोध में थे क्योंकि उनका बोझ मुख्य रूप से समाज के गरीब वर्गों पर पड़ता था। उन्होंने कहा कि कराधान के सिद्धांत भुगतान करने वालों की क्षमता पर आधारित होने चाहिए न कि आय पर।
 

डॉ.अम्बेडकर ने एक महान नीतिगत पहल की है, जब वे श्रम, सिंचाई, बिजली के कैबिनेट मंत्री थे, जिसने केंद्रीय जल आयोग (केंद्र सरकार भारत सरकार के तहत एक शीर्ष निकाय) के माध्यम से वर्तमान जल-साझाकरण विवाद को सुलझाया और नेतृत्व भी किया। उन्होंने संविधान का निर्माण करते समय इस दृष्टिकोण के लिए एक कानूनी दृष्टिकोण की रूपरेखा दी। बाद में, उन्होंने नीतिगत ढांचे के अनुसार काम को लागू किया जिसके कारण दामोदर घाटी परियोजना (बिहार और पश्चिम बंगाल में) की स्थापना हुई।


आंबेडकर ने सन् 1949 में संविधान के मसविदे में कराधान के विषय पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। भारत के संविधान में नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक की नियुक्ति के संबंध में प्रावधान का औचित्य बताते हुए उन्होंने कहा-
 

‘‘सरकारों को जनता से संचित धन का इस्तेमाल न केवल नियमों, कानूनों और विनियमों के अनुरूप करना चाहिए, वरन् यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि सार्वजनिक प्राधिकारी, धन के व्यय में विश्वसनीयता, बुद्धिमत्ता और मितव्ययिता से काम लें।


यद्यपि डॉ अम्बेडकर ने औद्योगीकरण और शहरीकरण के पक्ष में बात की, उन्होंने पूंजीवाद की बुराइयों के बारे में भी चेतावनी दी, यह तर्क देते हुए कि निरंकुश पूंजीवाद उत्पीड़न और शोषण की ताकत में बदल सकता है।

वे उन चन्द आर्थिक सिद्धांतकारों में से एक थे, जिनका आर्थिक नीतियों और योजनाओं के प्रति दृष्टिकोण व्यावहारिक और लोकहितकारी था। इस प्रकार चाहे आंबेडकर वित्तीय विषयों पर लिख रहे हों या मौद्रिक सिद्धांतों पर, उनका मूल लक्ष्य ऐसे निष्कर्षों तक पहुंचना था जो व्यावहारिक और लोकहितकारी दोनों हों।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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