डॉक्टर्स डे विशेष: देश कभी नहीं भूलेगा डॉ. बिधान चंद्र राय का योगदान
प्रत्येक वर्ष 1 जुलाई को राष्ट्रीय चिकित्सा दिवस मनाया जाता है। यह दिवस महान डॉक्टर/चिकित्सक डॉक्टर बिधानचंद्र राय की स्मृति में सम्मान में मनाया जाता है। अजब संयोग है कि 1 जुलाई डॉक्टर विधान चंद्र राय की जन्मतिथि भी है और पुण्यतिथि भी है।
डॉ. बिधानचंद्र राय एक महान चिकित्सक थे, जिन्होंने अपने जीवन में कई लाख मरीजों का इलाज किया और उनकी जान बचाई उन्होंने चिकित्सा के क्षेत्र में रहकर पूरा जीवन देश की सेवा में लगा दिया।
कई चिकित्सालयों को अपने अनुभव और सीखों से उनका कद बड़ा कर दिया। वे गांधी जी के निजी चिकित्सक भी रहे,महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी रहे, दूरदर्शी राजनेता और मुख्यमंत्री भी रहे, आजीवन अविवाहित रहे।
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विस्तार
प्रत्येक वर्ष 1 जुलाई को राष्ट्रीय चिकित्सा दिवस मनाया जाता है। यह दिवस महान डॉक्टर/चिकित्सक डॉक्टर बिधानचंद्र राय की स्मृति में सम्मान में मनाया जाता है। अजब संयोग है कि 1 जुलाई डॉक्टर बिधान चंद्र राय की जन्मतिथि भी है और पुण्यतिथि भी है।
डॉ. बिधानचंद्र राय एक महान चिकित्सक थे, जिन्होंने अपने जीवन में कई लाख मरीजों का इलाज किया और उनकी जान बचाई उन्होंने चिकित्सा के क्षेत्र में रहकर पूरा जीवन देश की सेवा में लगा दिया। कई चिकित्सालयों को अपने अनुभव और सीखों से उनका कद बड़ा कर दिया। वे गांधी जी के निजी चिकित्सक भी रहे,महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी रहे, दूरदर्शी राजनेता और मुख्यमंत्री भी रहे, आजीवन अविवाहित रहे।
डॉ. विधानचंद्र राय का योगदान
दामोदर घाटी और दुर्गापुर इस्पात निगम पश्चिम बंगाल और देश के लिए उनकी बड़ी देन है। ऐसे महान डॉक्टर को याद करने और उन्हें सम्मान देने के लिए ही राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस मनाया जाता है इसकी शुरुआत भारत में 1991 में हुई।
1 जुलाई 1882 में बिहार के पटना जिले में जन्म लेने वाले डॉ बिधानचंद्र राय की मृत्यु 1 जुलाई 1962 कोहुई थी। कोलकाता में चिकित्सा शिक्षा पूर्ण करने के बाद डॉक्टर राय ने एमआरसीपी और एफआरसीएच की उपाधि लंदन में प्राप्त की उन्हें 4 फरवरी 1961 को देश के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
1911 में उन्होंने भारत में चिकित्सीय जीवन की शुरुआत की इसके बाद वे कोलकाता के मेडिकल कॉलेज में व्याख्याता बने। उनकी ख्याति एक शिक्षक और चिकित्सक के रूप में ही नहीं बल्कि स्वतंत्रता सेनानी के रूप में महात्मा गांधी जी के साथ असहयोग आंदोलन में शामिल होने के कारण बढ़ी।
डॉक्टर बिधानचंद्र राय और डॉक्टर्स डे
डॉक्टर बिधानचंद्र राय पश्चिम बंगाल के दूसरे मुख्यमंत्री रहे और लगभग 14 जनवरी 1948 से मृत्युपर्यंत तक मुख्यमंत्री रहे। उन्होंने पश्चिम बंगाल में राजकीय धर्म का भी निर्वहन किया था। आजादी के लिए समर्पित करने वाले, महान चिकित्सक विधान चंद्र राय की अभूतपूर्व सेवाओं को भारत सरकार ने 4 फरवरी 1961 को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से अलंकृत किया इतना ही नहीं केंद्र सरकार ने 1991 में विधान चंद्र राय के जन्म और मरण दिवस को राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस के रूप में मनाने का ऐतिहासिक निर्णय भी लिया तब से प्रतिवर्ष 1 जुलाई को "राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस "(नेशनल डॉक्टर्स डे) मनाया जाता है।
इस दिन देश उन महान चिकित्सा विभूतियों के सम्मान करता है जिन्होंने मेडिकल क्षेत्र में अतुलनीय योगदान दिया हो। डॉक्टर विधान चंद्र राय, अद्भुत क्षमतावान और उत्साही चिकित्सक थे। वे निष्काका कर्मयोगी थे। उनमें 80 वर्ष की वृद्धावस्था की उम्र तक युवाओं के जैसा जोश और उत्साह बना रहा। उन्होंने पश्चिम बंगाल में राजकीय धर्म का भी निर्वहन किया था।
डॉक्टर बिधान चंद्र राय, रोगी के चेहरे को पढ़कर, नाड़ी देखकर उपचार करने वाले महान चिकित्सक थे। बिधानचंद्र राय को देश की नाड़ी का भी बाखूबी ज्ञान था। राष्ट्रीय जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में उनकी बहुमुखी सेवाएं थी। देश के औद्योगिक विकास ,चिकित्सा शास्त्र में महत्वपूर्ण अनुसंधान कार्य तथा शिक्षा की उन्नति में उनका अप्रतिम योगदान था।
कोरोना काल में योद्ध बनें डॉक्टर
वास्तव में चिकित्सकों को धरती का दूसरा भगवान माना जाता है। कोरोना काल में तो जिस तरह से हमारे चिकित्सकों ने अपने शरीर की तनिक परवाह न करते हुए आमजन , मरीजों, कोरोना संक्रमितों की सेवा की उससे उनके प्रति सम्मान और बढ़ जाता है।
न जाने कितने चिकित्सकों ने इस कोरोना महामारी में अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। कई दिनों तक भूखे प्यासे रहकर अपने परिवार से दूर रहकर, कई कई रातें जागकर मरीजों की सेवा की।
चिकित्सा सेवा एक ऐसी सेवा है जिसमे कभी सेवानिवृत्ति नही होती , चिकित्सक जितना अनुभवी हो उतना ही दक्ष और कार्यकुशल माना जाता है।
आज चिकित्सा दिवस के दिन दो पहलुओं पर विचार करना उचित होगा पहला चिकित्सक कठोर परिश्रम से और कई वर्षो की मेहनत से तैयार होते हैं तभी उन्हें सफेद कोट (अप्रइन)पहनने को मिलती है अतः उस पेशेवर चिकित्सक का सम्मान होना ही चाहिए, दूसराजब मेडिकल कॉलेज से स्नातक और परास्नातक चिकित्सक तैयार हो कर निकलते हैं उन्हें जो शपथ दिलाई जाती है उसका बगैर लोभलिप्सा के चिकित्सकों को पालन करना चाहिए।
चिकित्सा नैतिकता के लिए आधुनिक मेडिकल साइंस अर्थात् एलोपैथी के जनक हिप्पोक्रेटस की शपथ एमबीबीएस की डिग्री पूर्ण होने के बाद चिकित्सा स्नातकों को दिलाई जाती है। दरअसल इस हिप्पोक्रेटिक शपथ में एक चिकित्सक को उसका कर्तव्य बोध कराया जाता है।
राष्ट्रीय चिकित्सा दिवस वास्तव में चिकित्सकों को कर्तव्यबोध कराने का दिन भी माना जा सकता है।अतः प्रसंगवश हिप्पोक्रेटिक शपथ की विस्तृत चर्चा करना आज विषयानुकूल होगा।
हिप्पोक्रेटिक शपथ और डॉक्टर
हिप्पोक्रेटिक शपथ ऐतिहासिक रूप से चिकित्सकों और अन्य स्वास्थ्य पेशेवरों द्वारा ली गई शपथ है जो ईमानदारी से दवा का अभ्यास करने की शपथ लेते हैं। यह व्यापक रूप से हिप्पोक्रेट्स द्वारा लिखा गया माना जाता है, जिसे अक्सर पश्चिमी चिकित्सा का जनक माना जाता है, या उनके एक छात्र द्वारा।
शपथ 5वी शताब्दी ईसा पूर्व के अंत में ग्रीक में लिखी गई है। शपथ को कई देशों में चिकित्सा के चिकित्सकों के लिए पारित होने का संस्कार माना जाता है। हालांकि आजकल पाठ का आधुनिक संस्करण उनके बीच भिन्न होता है। हिप्पोक्रेटिक शपथ सबसे व्यापक रूप से यूनानी चिकित्सा ग्रंथों में से एक है। इसके लिए एक नए चिकित्सक की आवश्यकता होती है जो कई उपचार करने वाले देवताओं की शपथ लेता है कि वह कई "पेशेवर नैतिक मानकों" को बनाए रखेगा।
हिप्पोक्रेटिक शपथ आधुनिकसंस्करण (टफ्ट्स विश्वविद्यालय में स्कूल ऑफ मेडिसिन के अकादमिक डीन लुइस लासग्ना द्वारा 1964 में लिखा गया, और आज कई मेडिकल स्कूलों में उपयोग किया जाता है।)" मैं अपनी सर्वोत्तम क्षमता और निर्णय के अनुसार, इस वाचा को पूरा करने की शपथ लेता हूं: मैं उन चिकित्सकों की कड़ी मेहनत से अर्जित वैज्ञानिक लाभ का सम्मान करूंगा जिनके कदमों पर मैं चलता हूं, और खुशी से ऐसे ज्ञान को साझा करता हूं जो मेरा है पालन करना है। मैं बीमारों के लाभ के लिए, अति-उपचार और चिकित्सीय शून्यवाद के उन जुड़वां जालों से बचने के लिए आवश्यक सभी उपायों,को लागू करुंगा।
मेरे अपने अनुभव
मुझे याद होगा कि चिकित्सा के साथ-साथ विज्ञान में भी कला है, और यह कि गर्मजोशी, सहानुभूति और समझ सर्जन के चाकू या रसायनज्ञ की दवा से अधिक हो सकती है। मुझे "मुझे नहीं पता" कहने में शर्म नहीं आएगी और न ही मैं अपने सहयोगियों को बुलाने में असफल रहूंगा जब किसी मरीज के ठीक होने के लिए दूसरे के कौशल की आवश्यकता होगी। मैं अपने मरीज़ों की निजता का सम्मान करुंगा, क्योंकि उनकी समस्याओं के बारे में मुझे नहीं बताया गया है कि दुनिया जानती है। विशेष रूप से मुझे जीवन और मृत्यु के मामलों में सावधानी से चलना चाहिए।
अगर यह मुझे एक जीवन बचाने के लिए दिया जाता है, तो सभी का धन्यवाद। लेकिन यह मेरी शक्ति के भीतर भी हो सकता है कि मैं किसी की जान ले लूं; इस भयानक जिम्मेदारी का सामना बड़ी विनम्रता और अपनी खुद की कमजोरियों के प्रति जागरूकता के साथ करना चाहिए। सबसे बढ़कर, मुझे भगवान के साथ नहीं खेलना चाहिए।
मुझे याद होगा कि मैं बुखार चार्ट, कैंसर की वृद्धि नहीं, बल्कि एक बीमार इंसान का इलाज करता हूं, जिसकी बीमारी व्यक्ति के परिवार और आर्थिक स्थिरता को प्रभावित कर सकती है। मेरी जिम्मेदारी में ये संबंधित समस्याएं शामिल हैं, अगर मुझे बीमारों की पर्याप्त देखभाल करनी है। जब भी मैं कर सकता हूं मैं बीमारी को रोकूंगा, क्योंकि रोकथाम इलाज के लिए बेहतर है अगर मैं इस शपथ का उल्लंघन नहीं करता, तो मैं जीवन और कला का आनंद ले सकता हूं, मेरे रहते सम्मान और उसके बाद स्नेह के साथ याद किया जाएगा। क्या मैं हमेशा अपने बुलावे की बेहतरीन परंपराओं को बनाए रखने के लिए कार्य कर सकता हूं और जो मेरी मदद चाहते हैं उन्हें चंगा करने का आनंद लंबे समय तक अनुभव कर सकता हूं।
"हिप्पोक्रेटिक शपथ सारांश" अपने शिक्षकों का सम्मान करें। दूसरों की सेवा के लिए अपना जीवन समर्पित करें। अपने मरीजों के हितों को अपने से पहले रखें। अपने मरीजों को नुकसान और अन्याय से बचाएं।
सभी मरीजों के साथ समान व्यवहार करें। निर्णय लेने के रोगी के अधिकार का सम्मान करें। आपके द्वारा दी जाने वाली देखभाल में सुधार करना जारी रखें। मरीजों के साथ घनिष्ठता न करें। बीमारी को रोकने के साथ-साथ इलाज का भी प्रयास करें। अपने रोगियों की गोपनीयता की रक्षा करें।
दूसरों को अपना चिकित्सा ज्ञान प्रदान करें।"आज जूनियर डॉक्टरों में धैर्य की कमी अक्सर दिखाई देती है।मरीजों से और उनके परिजनों से आए दिन जूनियर डॉक्टरों के विवाद सुनने में आते हैं जो उचित नहीं है।भगवानों को गुस्सा नहीं आना चाहिए उन्हें तो सदैव मुस्कुराते रहना चाहिए।दूसरा डॉक्टरी की महंगी पढ़ाई कर के कुछ डॉक्टर अति लालची ,गुस्सैल ,और संबेदनाहीन हो जाते हैं जिससे यह पुनीत पेशा बदनाम होता है ।कमीशन लेकर दवा कंपनियों की दवा लिखने वाले चिकित्सक इस गरिमामय पेशे को बदनाम करते हैं इस पर लगाम लगनी चाहिए।
डॉक्टर का फुल फॉर्म ही इस पीड़ित मानवता की सेवा की मिशाल कायम करता है। सफेद कोट में ईश्वर समान ये चिकित्सक इन्हे दिल से सलाम। ईश्वर के बाद किसी से आशा रखी जाती है तो वह है डॉक्टर।भगवान का नाम बाद में पहले डॉक्टर याद आता है। कुछ हुआ तो बड़ी उम्मीद के साथ उसके पास,उसका केवल यह कहना कि चिंता की कोई बात नहीं। मन को सुकून मिल जाता है,आधी बीमारी भाग जाती है ।
प्रसव से लेकर मृत्यु तक साथ निभाने वाला। नन्हे दुधमुंहे बच्चे को भी उसके इलाज पर छोड़कर निश्चिंत, यहां सब कोई बराबर होता है। न कोई अमीर न कोई गरीब,न जात पात न धर्म का बंधन। अपनी जीवन की डोर उस पर सौंपते हैं। रात हो या दिन हर वक्त इलाज को तत्पर ,दंगा फसाद हो या दुर्घटना या हो कोई महामारी।
लाइलाज बीमारी हो या सर्दी जुखाम और वह भी पूरी ताकत और ज्ञान के साथ अगर अच्छा हो जाए तो तमाम दुआए मिलती हैं,है शख्स धन्यवाद देता है,चेहरे खिल उठते हैं, पर अगर वह सफल न हुआ तो गाली गलौज तोड़-फोड़ शुरू हो जाती है। वह ईश्वर तो नहीं है,वह भी जब ऑपरेशन करता होगा तो कामना करता होगा कि उसके हांथ कांपे नहींं तभी तो कहता है कि ऑपरेशन सफल है बाकी ऊपर वाले के हाथ में है।जीवन बचाने वाले का धन्यवाद तो कहना ही चाहिए।
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