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दिव्या दत्ता का ब्लॉगः जीवन में परिवार बहुत मायने रखता है

Wed, 11 Sep 2019 06:58 PM IST
Divya Dutta दिव्या दत्ता
Updated Wed, 11 Sep 2019 06:58 PM IST
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divya dutta life story and her philosophy of life
पंजाब के लुधियाना में हमारे आसपास भी कोई ऐसा नहीं था जो मुझे फिल्मों का क ख ग बता सके। - फोटो : Social Media

भले लोग मुझे अब भी पिछले साल अभिनय के लिए मिले राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीतने की बधाई देते रहते हों, लेकिन मेरी अभिनय यात्रा किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। हिंदी सिनेमा में मुझे 25 साल पूरे हो रहे हैं।

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आज मुड़कर पीछे देखती हूं तो लगता है कि बिना किसी सहारे, बिना किसी जान-पहचान और बिना किसी गॉडफादर के इस फिल्म इंडस्ट्री में इतनी दूर निकल आई तो इसके पीछे घरवालों का सहारा और ईश्वर का आशीर्वाद ही मेरा सबसे बड़ा हौसला रहा है। मेरी मां ही मेरी सबसे बड़ी गुरु रहीं।
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पंजाब के लुधियाना में हमारे आसपास भी कोई ऐसा नहीं था जो मुझे फिल्मों का क ख ग बता सके। चार साल की थी मैं जब मुझे एक दिन लगा कि मैं एक्टिंग बढ़िया कर लेती हूं। होता ये था कि उन दिनों अमिताभ बच्चन की डॉन रिलीज हो चुकी थी और फिल्म का गाना खइके पान बनारसवाला खूब बजा करता था। मैंने भी उनका पान खाकर नाचने वाला स्टाइल देख रखा था तो घर पर मैं इसी गाने पर खूब नाचा करती।
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मम्मी का दुपट्टा लेकर मैं उसे कमर में बांध लेती और होठों पर पान वाली लाली लाने के लिए खूब सारी लाल लिपस्टिक लगा लेती। बस कैसेट लगाकर बजता गाना, खइके पान बनारस वाला और मैं खूब नाचती।

हमारे घर पर बाकायदा इसका शो हुआ करता था। पड़ोसी आते। खूब समोसे और रसगुल्ले मंगाए जाते। उनकी पार्टी चलती और मेरा डांस। उन दिनों मिली तालियों की आवाजें मुझे अब तक याद हैं, यूं लगता है कि जैसे कल की ही तो बात है।
 

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मैं खूब सपने देखा करती थी। पढ़ाई के बीच बीच में एक्टिंग किया करती - फोटो : Social Media

मुझे एक्टिंग में शुरू से इतना ही आनंद आता था। तभी से मेरे मन में सिर्फ एक ही बात रही और वह थी एक्टिंग। लोगों की प्रतिक्रियाएं हीं मेरे सपनों की उड़ान का रनवे बनीं।

मैं खूब सपने देखा करती थी। पढ़ाई के बीच बीच में एक्टिंग किया करती और मैं तो यहां तक तैयारी किया करती थी कि जब स्टेज पर मेरा नाम लेकर बुलाया जाएगा और एंकर कहेगा, एंड द फिल्मफेयर बेस्ट एक्टर अवार्ड फीमेल गोज टू....., तो मेरी स्पीच क्या होगी। लेकिन ये सब इतना आसान कभी नहीं रहा। जिंदगी आसान नहीं होती और कामयाबी का रास्ता तो कभी सरल नहीं होता। मेरे करियर का रास्ता भी ऐसा ही उतार-चढ़ाव भरा रहा है।

इस दौरान जो कुछ भी मैंने झेला या जो भी दर्द महसूस किया, उस पर भी मुझे गर्व है क्योंकि उसकी वजह से ही मैं आज जो भी हूं, बन सकी। बिना किसी फिल्मी जान-पहचान के भी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में नाम कमाया जा सकता है, ये मेरा विश्वास है।

मेरा पालन पोषण एक बहुत ही सुरक्षित माहौल में हुआ है। मैं यहां जिससे भी मिलती सब पर भरोसा करती। सबसे दिलचस्प बात हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की ये है कि यहां कोई आपको आपके सामने काम के लिए मना नहीं करता।

शायद इसलिए कि पता नहीं कि कब आप एक स्टार बन जाएं और जिसके पास आज आपके लिए काम नहीं है, कल उसे ही आपकी जरूरत पड़ जाए। तो सब कहते, हम जल्दी ही साथ काम करेंगे। और, मैं उस पर भरोसा कर लेती। मैं तो मां को फोन भी कर देती थी कि उनकी बेटी ने यहां अपनी जगह बना ली है। उन दिनों मुझे तकरीबन 22 फिल्मों के लिए ऐसा ही भरोसा मिला था। मुझे लगता कि मैंने तो 22 फिल्में साइन कर ली हैं।

मां को भी बता देती कि आपकी बिटिया स्टार बन चुकी है। 22 फिल्में कर रही हैं। लेकिन, इनमें से एक भी फिल्म कम से कम मेरे साथ शुरू नहीं हुई। ये नकारे जाने से मेरा पहला परिचय था। मैं घर की बहुत लाड़ली रही हूं। जो भी मांगा तुरंत मिल गया। ना तो सुना ही नहीं था मैंने। मुझे लगता कि ये कहां आ गई हूं मैं? ये जो लोग मुझसे इतने सारे वादे कर रहे हैं, पूरे क्यों नही कर रहे?

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मेरा ये मानना है कि जीवन में परिवार बहुत मायने रखता है। - फोटो : social media

मेरा ये मानना है कि जीवन में परिवार बहुत मायने रखता है। मुझे संघर्ष के दिनों में परिवार औऱ खासतौर से मां का बहुत सहारा मिला। जब भी मैं नकारे जाने के बाद रोते हुए घर आती थी तो मां मेरा सिर गोद में रखकर मेरा हौसला बढ़ाती थीं। वह मुझे समझाया करतीं कि नाकामी से कुछ खत्म नहीं होता।

दुनिया बहुत बड़ी है और जीवन भी किसी एक घटना से रुक नहीं जाता। मां मुझे बतातीं कि अपनी खूबसूरती की बजाय अपने अभिनय से दोस्ती करो। लोगों को ये नहीं लगना चाहिए कि मैं बस एक और लड़की हूं जो अपनी खूबसूरती के बूते यहां काम मांगने चली आई है। तो मैंने हर तरह के किरदार करने शुरू कर दिए। ऐसे किरदार जो कहानी में मायने रखते थे।

मां की इस सीख ने मेरा जीवन ही नहीं मेरे सफर का रास्ता भी बदल दिया। यश जी की फिल्म वीर जारा देखने के बाद लोग मेरे बारे में पूछताछ करने लगे कि ये लड़की कौन है? इस किरदार में मैंने अपने तमाम एहसास पिरो दिए थे और इसी रोल ने मेरा ये भरोसा मजबूत किया कि फिल्म में रोल की लंबाई से कोई फर्क नही पड़ता, फर्क पड़ता है कि जितनी देर आप परदे पर दिखे, क्या आप दर्शकों का ध्यान खींचने में कामयाब रहे? 

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में 25 साल गुजारने के बाद पीछे मुड़कर देखती हूं तो बस एक ही ख्याल मन में आता है कि लोग मेरे साथ अब भी काम करना चाहते हैं और ये एहसास ही सबसे बड़ा एहसास है। लोग मेरे पास आकर जब कहते हैं कि ये किरदार आपको ही ध्यान में रखकर लिखा गया है, तो वही इस इंडस्ट्री में मेरी पहचान है। और, तब मेरा सिर इस इंडस्ट्री के लिए और ईश्वर के लिए आभार में झुक जाता है।  


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है. आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं. लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें.

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