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चिकित्सा शिक्षा में फैकल्टी की कमी पूरा कर सकते हैं डिप्लोमा डॉक्टर्स

Sun, 03 Nov 2019 11:45 AM IST
Ajay Khemariya अजय खेमरिया
Updated Sun, 03 Nov 2019 11:45 AM IST
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Diploma doctors can fulfill the shortage of faculty in medical education
देश की चिकित्सा शिक्षा को लेकर कई ऐसे पहलू हैं जिन पर सरकारी स्तर पर सुधार की आवश्यकता है। - फोटो : pixabay

देश की चिकित्सा शिक्षा को लेकर कई ऐसे पहलू हैं जिन पर सरकारी स्तर पर सुधार की आवश्यकता है। दरअसल, नए सरकारी मेडिकल कॉलेज तो दनादन खोले जा रहे है लेकिन उनकी गुणवत्ता पर सरकार का कतई ध्यान नहीं है।सभी नए और पुराने कॉलेज फैकल्टीज की समस्या से पीड़ित हैं। एमसीआई ने जो मानक निर्धारित कर रखे है उनकी अनुपालना यदि बरकरार रखा जाए तो देश मे कभी भी फेकल्टी की समस्या का समाधान संभव नहीं है। मसलन पीजी डॉक्टर ही शिक्षकीय कार्य कर सकता है उसे पहले किसी कॉलेज में सीनियर रेजिडेंट के रूप में या फिर सहायक प्राध्यापक के रूप में अनुभव अनिवार्य है।

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इस प्रावधान के चलते देश भर में चिकित्सा शिक्षकों का अकाल इसलिए है क्योंकि कोई भी क्लिनिकल प्रेक्टिस वाला डॉक्टर अपनी मोटी कमाई खुले बाजार में करने की जगह सरकारी सिस्टम में अफसरशाही से अपमानित होने के लिए नहीं आना चाहता है। दूसरी बड़ी विसंगति यह है कि देश भर के पीजी डिप्लोमा डॉक्टर्स को मेडिकल एजुकेशन सिस्टम से बाहर करके रखा गया है। पीजी के समानांतर ये डिप्लोमा भी दो साल में होता है।
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अगर इन डिप्लोमाधारी डॉक्टर्स को फैकल्टी के रूप में अधिमान्य किया जाए तो इस शिक्षकीय टोटे से निबटा जा सकता है।देश मे इस समय लगभग 70 हजार पीजी डिप्लोमा डॉक्टर्स हैं। नए मेडिकल बिल में सरकार ने डिप्लोमा को खत्म कर सीधे डिग्री का प्रावधान कर दिया है। यानी अब केवल डिग्री कोर्स ही चलेंगे मेडिकल एजुकेशन में। लेकिन इन 70 हजार पेशेवर डिप्लोमा डॉक्टर्स पर कोई नीति नही बनाई इधर 75 नए मेडिकल कॉलेज खोलने की अधिसूचना जारी हो चुकी है और जो 80 कॉलेज हाल ही में मोदी सरकार ने खोले थे वहाँ फैकल्टीज की समस्या बनी हुई है।
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Diploma doctors can fulfill the shortage of faculty in medical education
बेहतर होगा सरकार डिप्लोमा डॉक्टर्स को फैकल्टी के रूप में मान्यता प्रदान कर दे - फोटो : pixabay

बेहतर होगा सरकार डिप्लोमा डॉक्टर्स को फैकल्टी के रूप में मान्यता प्रदान कर दे क्योंकि बुनियादी रूप से पीजी (एमडी एसएस) और डिप्लोमा में कोई बड़ा अंतर नहीं है। पीजी औऱ डिप्लोमा डॉक्टर्स दोनों ही साढ़े चार साल का स्नातक पाठ्यक्रम पूरा करते हैं। दोनो समान रूप से मेडिकल कॉलेज में एक बर्ष का इंटर्नशिप पूरा करते हैं।

गांवों के लिए सेवा देने का बांड भी समान रूप से भरने का प्रावधान हो या फिर एक ही प्रवेश परीक्षा नीट पीजी पास कर दाखिला लेना। पीजी और पीजी डिप्लोमा में बड़ा अंतर नहीं है। दोनों की कक्षाएं एक ही है एक ही पाठ्यक्रम एक ही इंटरनल, एक्सटर्नल, कॉलेज लैब, फैकल्टी सब कुछ एक जैसा होता है। बस एक अंतर यह है कि पीजी में दाखिला पाए डॉक्टर को तीसरे साल में एक थीसिस जमा करनी होती है जिसके आधार पर उसे पीजी की डिग्री मिल जाती है और वह मेडिकल कॉलेजों में पढ़ाने के लिए पात्र हो जाता है।

विसंगतियों का प्रावधान देखिये डिप्लोमा धारी डॉक्टर मेडिकल कॉलेज में सीनियर रेजिडेंट बन सकता है वह कॉलेज के अस्पतालों में नए पीजी स्टूडेंट्स को अनोपचारिक रूप से पढ़ा सकता है,  वहां उनको क्लिनिकल, ऑपरेशन और दूसरी विधाओं में ट्रेंड कर सकता है,  लेकिन फैकल्टी नहीं बन सकता है। एक रोचक विसंगति यह भी है कि नॉन मेडिको यानी जो एमबीबीएस भी नही है उसके लिये मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर से लेकर डीन तक बनने के रास्ते खुले हैं।
 

Diploma doctors can fulfill the shortage of faculty in medical education
संभव है कि सरकार आने वाले समय में देश के सभी जिला अस्पताल को मेडिकल कॉलेजों से संबद्ध करेगी। - फोटो : pixabay

फिजियोलॉजी, एनाटोमी, बायोकेमिस्ट्री जैसे विषय जो एमबीबीएस के पहले साल में पढ़ाए जाते हैं उनके सहायक प्रोफेसर सामान्य बीएससी-एमएससी करके भी फैकल्टी बन जाते हैं फिर डीन तक जाते हैं। लेकिन एक पीजी डिप्लोमा प्राप्त डॉक्टर जीवन भर न पढ़ाने की पात्रता हासिल कर पाता है न ही उसे कोई प्रमोशन मिलता है। कुछ साल पहले तक तो विदेश से डॉक्टरी पढ़कर आये लोग सीधे फेकल्टी बन जाते थे।

आज देश भर में इन डिप्लोमा डॉक्टर्स की उपयोगिता को अधिकतम स्तर पर सुनिश्चित किए जाने की आवश्यकता है। मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल मे 80 और इस कार्यकाल में 75 नए मेडिकल कॉलेज खोलने को मंजूरी दी है। फिलहाल देश मे 479 मेडिकल कॉलेज है। जिन 75 नए कॉलेजों को इस साल मंजूरी दी गई उनमें से 31 की अधिसूचना जारी हो चुकी है ये सभी कॉलेज देश के पिछड़े जिलों में खोले जा रहे है यहां पहले से मौजूद जिला अस्पतालों को इनसे संबद्ध कर दिया गया है।

जाहिर है जिला अस्पताल ही अब मेडीकल कॉलेज के अस्पताल के रूप में काम करेंगे। 80 नए मेडीकल कॉलेजों के अनुभव बताते हैं कि सभी जगह काबिल फैकल्टी का संकट है जाहिर है कागजी खानापूर्ति करके एलोपी हासिल करने के लिए फैकल्टी दिखाए जा रहे है ताकि नए कॉलेज शुरू किए जा सके।

चूंकि ये सभी कॉलेज दूरदराज के जिलों में खोले गए है जहां शहरीकरण बड़े महानगरों जैसा नहीं है इसलिये अपने क्षेत्र के ख्यातिप्राप्त डॉक्टर यहां फैकल्टी के रूप में आना नहीं चाहते है जो 75 नए कॉलेज अभी खोले जा रहे है वे और भी पिछड़े जिलों में हैं,  जाहिर है करोडों की धन खर्ची के बाबजूद अगर फेकल्टी नही होंगे तो इन कॉलेजों के माध्यम से जन आरोग्य का मोदी मिशन फेल हो सकता है। इसलिए  सरकार को इस दिशा में बहुत ही गंभीरता के साथ विचार कर पीजी डिप्लोमा डॉक्टर्स को फैकल्टी के रूप में अधिमान्य करना होगा।

फिलहाल देश मे 70 हजार ऐसे डॉक्टर्स है अगर इनमें से आधे भी इस कार्य मे सहमति के साथ काम करने के लिये आगे आते है तब एक बड़ी समस्या मेडीकल कॉलेजों से जुड़ी दूर हो सकती है और इस विधा की गुणवत्ता भी दूषित नहीं होगी। सरकार के स्तर पर एक बुनियादी निर्णय यह भी होना चाहिए कि जब जिला अस्पताल नए मेडिकल कॉलेजों से संबद्ध किये जा रहे तब वहां पदस्थ सभी विशेषज्ञ डॉक्टरों को भी उनकी वरीयता के हिसाब से टीचिंग कैडर दे दिया जाए क्योंकि जो नए शिक्षक भर्ती किये जाते है उनसे ज्यादा क्लिनिकल,औऱ सर्जरी का अनुभव इन डॉक्टरों के पास है।

संभव है कि सरकार आने वाले समय में देश के सभी जिला अस्पताल को मेडिकल कॉलेजों से संबद्ध करेगी। इसलिये बेहतर होगा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर सभी पीजी डॉक्टरों को प्रवेश के साथ ही पदस्थ करे और महीने में तय दिन थ्योरी क्लास के लिये जिला अस्पताल या उस कॉलेज में बुलाए। इससे ग्रामीण भारत मे डॉक्टर्स की कमी स्वतः ही खत्म हो जाएगी क्योंकि तीन- तीन साल बाद रोटेशन से नए पीजी बैच गांव के अस्पताल में आते रहेंगे। फैक्ट यह है कि वर्तमान में देश मे कुल 10.40 लाख डॉक्टर रिजस्टर्ड है इनमें से सिर्फ 1.2लाख ही सरकारी सेवा में है। भारत मे 67 फीसदी नागरिक  इलाज का खर्च खुद अपनी जेब से उठाते है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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