देव आनंद जन्मदिन विशेष: जिंदगी का हर पल साथ निभाने वाला चितेरा
सदाबहार अभिनेता देव आनंद ताजिंदगी फिल्मी पर्दे पर रोमांस के देवता की तरह नजर आते रहे और दर्शकों की कई पीढ़ियों को अपनी दिलकश अदाओं से लुभाते रहे। फिल्मी पर्दे से अलग एक और देव आनंद भी थे जो ऊर्जा से लबरेज होने के साथ ही एक गंभीर दार्शनिक और अपने आप में एक वैरागी भाव लिए हुए थे। उन देव आनंद के मैंने अनगिनत बार दर्शन किए, उनकी उन्हीं मधुर स्मृतियों को नमन करते हुए यह संस्मरणात्मक आलेख।
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विस्तार
देव आनंद मुझे हर मुलाकात में एक गंभीर दार्शनिक, महान कर्मयोगी और संन्यासी की तरह लगते रहे। दुनिया की हर चीज से 'डिटैच्ड' यानी निस्संग। अपने आखिरी दिनों में उन्होंने मुझसे एक मुलाकात के दौरान कहा भी कि मैं अब तो गाइड के स्वामी जैसा ही जीवन जी रहा हूं। उनकी सदाशयता और उनका मनुष्यत्व उनके अभिनेता पर हमेशा से भारी रहा। देव आनंद एक व्यक्ति के तौर पर इतने बड़े इंसान थे कि आपके लिए यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि उनके अभिनय पक्ष पर बात करें या उनके इंसानी पहलू पर बात की जाए। क्योंकि इंसानी पहलू काफी बड़ा था।
सामने वाले को सम्मान देने की कला थी उनमें
मैंने उनके इस पक्ष को उनसे बातें करते हुए अक्सर महसूस किया। 22 मई 2007 की शाम की बात है। उनके पाली हिल, बांद्रा वाले आनंद रिकॉर्डिंग रूम के उनके पेंट हाउस में उनसे लंबा साक्षात्कार हुआ। उनकी फिल्म ‘गाइड’ पर लंबी बातचीत हुई। बातचीत खत्म होने के बाद अचानक उन्होंने कहा कि 'दीप हम तो गाइड में खो गए। हम तो यह भी भूल गए कि हमें चाय भी पीनी है। चार महीने बाद उनके जन्मदिन पर उनकी आत्मकथा लांच होने वाली थी।
मेरी उनसे एक जमाने से मुलाकातें होती आ रही थीं पर इंटरव्यू का ये मौका पहला था। मुझे विदा करते वक्त उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहा-
‘दीप मेरी ऑटोबायोग्राफी मेरे बर्थ डे यानी 26 सितंबर को रिलीज होने जा रही है और तुम्हें यहां आना है। पहले मेरी किताब आने दे, उसके बाद अपनी किताब छपवाना।’
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देव आनंद को मालूम था कि मैं एक किताब लिख रहा हूं और उनके इंटरव्यू के इंतजार में ही इसका प्रकाशन लंबित था। मेरी किताब के प्रकाशन से भला उनका क्या लेना देना होता, लेकिन यह उनकी सज्जनता थी कि वह अपने सामने बैठे व्यक्ति को भी बराबरी का दर्जा देते थे।
ऐसे मिला इंटरव्यू
फिल्म-‘लव एट टाइम्स स्क्वेयर’ रिलीज हो चुकी थी। मैं उनसे मिलने पाली हिल गया था। उन्होंने कहा, ‘मैं अभी अभी न्यूयॉर्क से लौटा ही हूं और थका हूं। कल नहीं, परसों नहीं, तरसों वीरवार को मिलेंगे हम।’ उसके बाद मैं अभिनेता चंद्रशेखर के यहां इंटरव्यू करने चला गया। लंच पर देव साहब का जिक्र चला और मैंने उन्हें बताया कि देव साहब मिलते जरूर है पर इंटरव्यू के लिए टाइम कभी नहीं देते। चंद्रशेखर के कहने पर मैंने उनके घर से फोन लगाया और उनकी इंटरव्यू के लिए तय किए गए दिन की याद दिलाई। वह तपाक से बोले,
‘मैं तो हिन्दुस्तान टाइम्स और टाइम्स ऑफ इंडिया को इंटरव्यू दे चुका हूं और अब मैं नई फिल्म पर काम कर रहा हूं।’
उनकी नई फिल्म प्रख्यात सितार वादक पंडित रविशंकर की पुत्री नोरा जोंस को लेकर थी। बाद में यह फिल्म बन नहीं सकी। एक बार उनके पीए अशोक सिन्हा की मार्फत भी उनका इंटरव्यू लेने की मैंने कोशिश की पर बात बनी नहीं। बाद में फिल्मकार शक्ति सामंत की सिफारिश पर मुझे देव आनंद का विस्तृत इंटरव्यू मिला।
शिकायत भी पूरे मन से सुनी
देव आनंद आत्मकथा मुंबई में लांच हुई तो मैं वहां नहीं पहुंच सका। बहुत सुंदर आत्मकथा लिखी थी पर उसमें साहिर लुधियानवी और मोहम्मद रफी को कुछ लाइनों में ही निपटा दिया गया था। एक दिन मैंने उन्हें फोन लगाया। दूसरी तरफ देव साहब आए तो मैंने कहा, ‘आपकी आत्मकथा छह बार पढ़ चुका हूं। आपने अपने संघर्ष के दिनों के साथियों मारिया और नीलोफर को दो-दो पेज दिए हैं, पर अपनी जिन्दगी का थीम सांग लिखने वाले साहिर लुधियानवी और इसे गाने वाले मोहम्मद रफी साहब को कुछ ही पंक्तियों में निपटा दिया। उन्होंने फौरन कहा, बहुत अच्छी बात कह रहे हो। पर मेरे उनके बारे में कम लिखने से उनकी महानता में कोई कमी नहीं होने वाली। दरअसल, लंबा कोई पढ़ता नहीं।’
कभी नहीं टालते थे बात
मैं जब भी उनसे मिलने मुंबई जाता तो उनके ड्राइवर प्रेम दुबे से अपना संदेश भीतर भेजता। फौरन उनका जवाब आता, दीप को बुलाओ। प्रेम दुबे ही मेरे और देव साहब के बीच अरसे तक संदेशवाहक का काम करते रहे। देव साहब के पास जाने पर मैंने हमेशा एक बात नोट की, मैं जब भी अकेला गया तो मेरा भरपूर स्वागत हुआ। अगर मेरे साथ कोई दूसरा व्यक्ति चला जाए तो वह असहज हो जाते थे और आसानी से मिलते नहीं थे।
ऐसा ही एक वाक्या लेखक प्रहलाद अग्रवाल का है। वह देव आनंद पर किताब लिखना चाहते थे और देव साहब का मानना था कि छुटपुट मुलाकातों से भला कोई कैसे उन पर किताब लिख सकता है। तमाम कोशिशें की मैंने उनसे प्रहलाद अग्रवाल को मिलाने की लेकिन बात बनी नहीं। आखिरी दांव मैंने यही चला कि बस एक बार वह उनको देखना चाहते हैं। देव साब मिले। एक घंटे का वक्त भी दिया। बहुत हंसी खुशी हम वहां से विदा हुए।
पहाड़ों में बसता था मन
मेरा और देव साहब का कुछ ऐसा आत्मीय रिश्ता बन गया था कि जब भी मेरा मन करता मैं उनके मोबाइल पर फोन कर लेता और एक भी दिन ऐसा नहीं हुआ कि जब उन्होंने फोन न उठाया हो। एक दिन मैंने उन्हें फोन किया तो वह घर पर ही थे पर थोड़ा उद्विग्न से थे। बोले, ‘भट्ट आई हैव फीवर, आई एम टेकिंग हॉट मिल्क।’ मैंने माफी मांगते हुए फोन काट दिया।
एक दिन तो गजब हुआ। मैंने उन्हें फोन किया। वह घर पर ही थे। बोले, ‘दीप मैं अभी थोड़ी देर में बहुत दूर उड़ जाने वाला हूं।’ और उन्होंने वैसी ही आवाज भी निकाली जैसे कि वह बस उड़ने ही वाले हों। मैंने सोचा कहीं बाहर जा रहे रहे होंगे। शाम को मैंने उनके ड्राइवर प्रेम को फोन लगाया और पूछा, ‘देव साहब कहां हैं।’ देव साहब ऑफिस में ही थे। उन्हें हवाओं से प्यार था, पहाड़ों से बेइंतहा मुहब्बत थी। नदी का बहाव उन्हें बहुत पसंद था।
एक रोज बातचीत के दौरान उन्होंने कहा, ‘मैं वैसे रहने वाला गुरदासपुर का हूं पर मुझे लगता है मेरी आत्मा कहीं पहाड़ के अंदर ही फंसी पड़ी है। कौन जाने, कौन कहां का है, गॉड नोज।’
हर उम्र में जवां व्यक्तित्व वाले देव साब
देव आनंद साहब की मोहब्बत के मैंने बहुत रंग देखे हैं। जब उनकी फिल्म ‘चार्जशीट’ रिलीज हुई तो हल्द्वानी की प्रेम टाकीज में फिल्म का एक बड़ा सा कपड़े का पोस्टर लगा। मैंने उन्हें फोन पर बताया कि चार्जशीट मेरे अपने शहर में भी प्रदर्शित होने जा रही है। उनको लगा कि फिल्म लग गई है तो बोले ‘फिल्म देखकर उसपर कुछ लिखो।’
मैंने उन्हें बताया कि अभी सिर्फ पोस्टर लगा है। फिल्म आएगी तो देखूंगा और लिखूंगा भी। मैं जब भी देव आनंद साहब से मिलने उनके ऑफिस गया तो मैंने कभी बूढ़े देव आनंद के दर्शन नहीं किए। मुझे हर बार जोशो-खरोश, भरपूर ऊर्जा और प्यार से लबालब देव आनंद के दर्शन होते रहे।
मैं जब उनकी तस्वीरें देखता तो उनकी उम्र उन पर हावी नजर आती पर मुझे लगता कि जिस देव आनंद को मैं देखता हूं वह तो एकदम जवान है। मुझे आज भी लगता है कि कैमरे के लैंस उनकी जवानी और ताजगी को पकड़ने में अक्षम थे। जिस उम्र में मैं उनसे मिलता रहा वह उनकी परिपक्व उम्र थी। पर तब भी मेरा हाल यह था कि उन्हें देखते ही नशा सा हो जाता था।
मैंने उन्हें जब भी देखा एक दूल्हे की तरह सजा धजा देखा। उनकी धज में कभी कोई कमी नहीं देखी। उनके कपड़ों के रंग देखने लायक होते थे। जितने उजले उनके कपड़े थे उतना ही उजला उनका मन भी था। इतनी अनगिनत मुलाकातों में मैंने उनके चेहरे पर न उदासी देखी और न किसी प्रकार की मलिनता। तभी तो लोग उन्हें कहते थे, एवरग्रीन हीरो, सदाबहार देव आनंद!
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