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3 कारण जिनसे भाजपा की लोकप्रियता हो रही कम और फीका पड़ रहा मोदी का जादू

Fri, 14 Dec 2018 01:36 PM IST
Updated Fri, 14 Dec 2018 01:36 PM IST
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demonetisation modis bjp's popularity declining reason of bjp defeat in mp chhatisgadh rajasthan
BJP - फोटो : PTI

5 विधानसभा चुनाव परिणामों से यह स्पष्ट है कि बीजेपी के लोकप्रियता में कमी आई है। भाजपा में सिर्फ क्षेत्रीय नेतृत्व ही नहीं, अपितु केंद्रीय नेतृत्व के करिश्मे में भी कमी दिख रही है। 2013 विधानसभा चुनावों तथा 2014 के लोकसभा चुनावों को मापदंड बनाया जाए तो भाजपा के गिरते लोकप्रियता को आसानी से समझा जा सकता है। यही नहीं ये चुनाव परिणाम यह भी बताते चुनाव प्रचार में पहुंचने के बाद भी पीएम मोदी का जादू फीका पड़ रहा है। कुछ ऐसे कारण रहे हैं जिन्होंने भाजपा की लोकप्रियता और पीएम मोदी के जादू को कम कर दिया है। 

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पहला कारण-नोटबंदी 
इन कारणों में नोटबंदी के विफलता को प्रथमत: रखा जाना चाहिए। नोटबंदी अपने किसी भी वांछित लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पाई,न तो कालाधन की वापसी हुई और न ही अर्थव्यवस्था में नकदी तंत्र समाप्त हुआ। उल्टे आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार पिछले दो वर्षों में अर्थव्यवस्था में नकद व्यवस्था तंत्र पुनः मजबूत हुआ। लेकिन इससे भारतीय अर्थव्यवस्था पर व्यापक नकारात्मक प्रभाव पड़ा। 
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अर्थव्यवस्था जब नोटबंदी से संघर्ष कर रही थी, तभी लगभग बिना किसी तैयारी के जीएसटी के क्रियान्वयन ने लघु उद्योगों की कमर तोड़ दी। इससे भारी मात्रा में मजदूर बेरोजगार होकर वापस अपने घर पहुंचे। सरकार ने सामाजिक क्षेत्र के कई योजनाओं में बजट कटौती की, जिसके चपेटे में मनरेगा भी आया। बेरोजगार होकर गांव आए मजदूरों को मनरेगा भी रोजगार देने में आत्मसात नहीं कर पाया। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में भी बैचेनी फैली तथा बीजेपी के प्रति नाराजगी में वृद्धि हुई। छत्तीसगढ़ में रमण सिंह ने मनरेगा के 100 दिन के रोजगार गारंटी के स्थान पर 150 दिन कर दिया था, परंतु केंद्र सरकार द्वारा बजट कटौती के कारण वे इसे क्रियान्वित नहीं कर पाए। 

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किसानों के आक्रोश को मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनाव परिणामों में देखा जा सकता है। - फोटो : अमर उजाला

दूसरा कारण-नाराज और परेशान किसान 
इसके अतिरिक्त किसानों में भी आक्रोश चरम स्तर पर था। किसानों के आक्रोश को मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनाव परिणामों में देखा जा सकता है। केंद्र सरकार ने घोषणा कर दी कि लागत का डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य दिया जाएगा, लेकिन सबसे दुखद बात यह है कि सरकार अधिकांश फसलों को खरीद ही नहीं पाती तथा किसानों को कोड़ियों के भाव फसल बेचने को मजबूर होना पड़ता है। कांग्रेस ने सरकार बनने के 10 दिन के भीतर किसानों के ऋण माफी का आश्वासन दिया,जिससे किसान कांग्रेस की ओर आकर्षित हुए।

तीसरा कारण- त्रिस्तरीय एंटी इनकमबेंसी  
भाजपा की हार का तीसरा अहम कारण रहा त्रिस्तरीय एंटी-इंक्मबेंसी। राजस्थान को छोड़ दिया जाए तो मप्र और छत्तीसगढ़ में भाजपा की 15 सालों से सरकार रही है ऐसे में सरकारों को एंटी इनकमबेंसी का सामना भी करना पड़ा। लोगों की प्रथमतः नाराजगी अपने विधायकों से रही, जो लंबे समय से जनता से कट चुके थे। राजस्थान में तो वसुंधरा के केवल 5 वर्षों के शासन से भी जनता की नाराजगी काफी हो गई थी। तीसरी नाराजगी लोगों की केंद्र सरकार से भी रही। नोटबंदी, मंहगाई ,किसानों के समस्या इत्यादि में केंद्र की नीतियां से जनता सहमत नहीं रही।

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राजस्थान में वसुंधरा राजे पिछले 20 वर्षों से लगातार सत्ता परिवर्तन के रुझान को तोड़ने में असफल रही। - फोटो : PTI

हर राज्य की अलग कहानी- राजस्थान  
राजस्थान में वसुंधरा राजे पिछले 20 वर्षों से लगातार सत्ता परिवर्तन के रुझान को तोड़ने में असफल रही। उन्होंने भामाशाह हेल्थ इंन्श्योरेंस द्वारा जनता की नाराजगी दूर करने का असफल प्रयास किया। इसके अतिरिक्त वसुंधरा के व्यवहार संबंधी इमेज ने भी भाजपा को नुकसान पहुंचा। महारानी छवि के कारण वे जनता से सही तरीके से संबद्ध नहीं हो पाईं। राजस्थान में भाजपा के परंपरागत मतदाता रहे,राजपूत समुदाय के लोग भी उनसे नाराज हैं। इतना ही नहीं, सौंदर्यीकरण के कारण अनेक जगहों पर अवैध अतिक्रमणों को हटाया गया,जिसमें काफी मंदिर भी हटाए गए,जिससे हिंदुओं में नाराजगी आई। रोजगार के मुद्दे पर भी सरकार असफल रही।

छत्तीसगढ़ में जनता नाराज 
इन चुनावों में बीजेपी का सबसे खराब प्रदर्शन छत्तीसगढ़ में रहा। रमन सिंह का यूं सूफड़ा साफ होने की उम्मीद भी किसी को नहीं थी। रमन सिंह भले ही राज्य में चावल वाले बाबा के नाम से प्रसिद्ध थे, परंतु किसान उनसे नाराज थे। कांग्रेस ने कर्जमुक्त मास्टरस्ट्रोक द्वारा इसका भरपूर लाभ उठाया। रमन सिंह के हार का प्रमुख कारण नक्सलियों पर नाकामी रही। नक्सलवादी क्षेत्रों में लगातार हमले होते गए और इस बार वहां मतदान भी बंपर हुआ।

स्पष्ट है कि ये बंपर वोटिंग रमन सिंह सरकार के खिलाफ ही थी। छत्तीसगढ़ में कुल 31.8 % मतदाता आदिवासी समुदाय से हैं और 11.6% दलित मतदाता है। स्पष्ट है कि सत्ता की चाभी उनके पास ही है। दलित-आदिवासी बहुल क्षेत्रों में भाजपा का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा। भाजपा केवल शहरी क्षेत्रों में ही अच्छा प्रदर्शन कर पाई।

मप्र में कांटे का मुकाबला
15 वर्षों के सत्ता विरोधी आक्रोश के बावजूद मध्यप्रदेश में कांग्रेस और बीजेपी के बीच कांटे की टक्कर दिखी। पूरे मतगणना के दौरान कभी भाजपा तो कभी कांग्रेस आगे हो रही थी। यह संपूर्ण मुकाबला 20-20 रोमांचक क्रिकेट मैच की तरह रहा। 2013 में शिवराज सिंह चौहान ने ऐतिहासिक 165 सीटें प्राप्त की थी,परंतु इस बार बीजेपी उस ऐतिहासिक आंकड़े से काफी नीचे आई है। लेकिन यह अवश्य कहा जा सकता है कि उन्होंने भारी नाराजगी के बीच मध्य प्रदेश के मुकाबले को काफी कठोर बनाया।

अब प्रश्न उठता है कि शिवराज के समकालीन रमन सिंह को भारी पराजय का सामना करना पड़ा तथा केवल 5 वर्षों में वसुंधरा के प्रति राजस्थान में जबरदस्त नाराजगी आई,लेकिन 15 वर्षों के एंटी इंक्मबेंसी के बावजूद शिवराज की स्थिति मजबूत कैसे बनी रही?इसका सर्वप्रमुख कारण है ,उनका किसान पृष्ठभूमि से आना। इसके अतिरिक्त ओबीसी समुदाय से होना तथा जनता से सहज जुड़ने की निपुणता ने भी शिवराज के स्थिति को मजबूत बनाया।

तेलंगाना की कहानी 

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इन चुनाव परिणामों से विपक्ष सहित कांग्रेस में राहुल गांधी के स्वीकार्यता में वृद्धि होगी। - फोटो : Amar Ujala


इन सबके अतिरिक्त तेलंगाना में टीआरएस ने भी अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की। 119 सदस्यीय विधानसभा में टीआरएस को रुझानों में 86 सीटें मिलती दिख रही है।स्पष्ट है कि टीआरएस प्रमुख के. चंद्रशेखर राव का विधानसभा समय पूर्व भंग करने का निर्णय बिल्कुल सही रहा। पूर्वोत्तर राज्यों में मिजोरम में ही अब केवल कांग्रेस की सरकार बची थी। मिजोरम में एमएनएफ ने कांग्रेस  को सत्ता से बाहर कर दिया है। इस तरह से पूर्वोत्तर अब कांग्रेस मुक्त हो गया है,लेकिन इन चुनावों के बाद अब पुनः देश में विपक्ष के रुप में कांग्रेस को सम्मानित स्थान मिल सकेगा।

राहुल गांधी की बढ़ी लोकप्रियता 
इन चुनाव परिणामों से विपक्ष सहित कांग्रेस में राहुल गांधी के स्वीकार्यता में वृद्धि होगी। लगातार असफलताओं से जूझ रही कांग्रेस को इन चुनाव परिणामों से काफी ऊर्जा मिलेगी तथा कार्यकर्ताओं में भी जोश आएगा। इससे कांग्रेस अब सकारात्मक रूप से 2019 के चुनावों के लिए तैयार हो सकेगी।

भाजपा को भी इन चुनाव परिणामों को एक वेक अप कॉल के रूप में लेना चाहिए। अति आत्मविश्वास, टिकट वितरण की गड़बड़ियों से भाजपा को अवश्य सबक लेना चाहिए। इन परिणामों से अब भाजपा को सावधान होकर 2019 के चुनावों में जाने का मौका मिलेगा।इसके अतिरिक्त शिवसेना के बयान से स्पष्ट है कि भाजपा को अब एनडीए सहयोगियों से मिलने वाले चुनौतियों से भी निपटने के लिए भी तैयार रहना होगा।अंततः यह कहा जा सकता है कि इन चुनाव परिणामों ने भारतीय लोकतंत्र को स्वस्थ और मजबूत बनाया है।

 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है. आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं. लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें.

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