दिल्ली चुनाव 2020ः क्या बदले हुए तेवर के साथ मोदी के लिए नई चुनौती बनेंगे केजरीवाल?
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दिल्ली चुनावों में आप ने एक बार फिर भाजपा को जोर की पटखनी दी है। खास बात यह है कि दिल्ली में जीत के साथ ही मुख्यमंत्री केजरीवाल ने एक बार फिर नए रूप में देश के सामने खुद को नरेंद्र मोदी के विकल्प के रूप में पेश किया है।
नई दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में उनके भाषण का लुब्बो-लुआब यही है कि अकेले वे ही हैं जो विपक्षी चेहरों में मोदी के बरअक्स खड़े हो सकते हैं और इस बार विनम्रता से अंतरराष्ट्रीय अपील के साथ वे मोदी को चुनौती देने को तैयार हैं, अब बारी बाकी गैर भाजपा दलों की है कि वे चाहें तो मोदी के तूफान के मुकाबले के लिए उनके चेहरे को समूचे विपक्ष का चेहरा बना सकते हैं।
अरविंद केजरीवाल और विपक्ष का चेहरा
केजरीवाल का यह रूप पांच साल पहले अन्ना आंदोलन पर सवार होकर 70 में से 67 सीटें जीतकर भाजपा को तीन और कांग्रेस को शून्य पर लाने वाले केजरीवाल से भिन्न है। भिन्न इसलिए कि वे उस वक्त देश भर में अपनी हवा की काल्पनिक दुनिया की तुफैल में मोदी के खिलाफ लगभग हर मंच पर हर भाषण और हर ट्वीट में सीधे मोदी से टकराने की नीति पर चल रहे थे।
उन्होंने अपनी आम आदमी पार्टी का विस्तार पंजाब, हरियाणा जेसे दिल्ली के पड़ोसी राज्यों से आगे निकलकर गुजरात तक में भाजपा का विकल्प बनने तक की कवायद कर डाली थी। देर से ही सही लेकिन उन्हाेंने अपनी बयानबाजी, विवादों और देश भर में पार्टी के विस्तार को स्थगित कर दिल्ली तक खुद को समेट लिया और आखिरकार दिल्ली के 2020 के चुनाव के बहुत पहले ही यह सुनिश्चित कर लिया था कि उनकी ही सरकार वहां लोटेगी।
यह काम के आधार पर भी था और रणनीति के आधार पर भी। उन्हें 2015 की तरह कांग्रेस को शून्य पर लाने में दिल्ली की जामा मस्जिद के इमाम के फतवे की जरूरत ही नहीं पड़ी और कांग्रेस शून्य पर कायम रही।
हालांकि 2015 में भी बाद में फतवे की जरूरत को खारिज कर चुके थे, लेकिन सब जानते हैं कि कांग्रेस का अल्पसंख्यक वोट आम आदमी पार्टी को शिफ्ट हो चुका था, जो अब केजरीवाल के लिए फिलहाल बड़ा मददगार साबित हो रहा है।
पेशकश तो ठीक लेकिन क्या यह हो पाएगा?
केजरीवाल ने अपनी शपथ के तुरंत बात जो भाषण दिया उसमें उन्होंने चुनाव के वक्त की तल्खियां भुलाने यानी माफ करने का एलान करने और प्रधानमंत्री मोदी से दिल्ली के विकास के लिए आशीर्वाद मांगने के अलावा अपने दिल्ली मॉडल से भारत की विश्व में नई पहचान का डंका मनवाने का भी एलान किया। साफ है कि वे अपनी जीत को काम के दम पर मनवाने के बाद अब टकराव के बजाए विकास की, सिर्फ दिल्ली की नहीं देश की राजनीति में नए मुहावरे की सफलता की उम्मीद जगा रहे थे।
विपक्ष के लिहाज से देखें तो देश में भाजपा के बाद दूसरी बड़ी पार्टी कांग्रेस नेतृत्व के संकट से जूझ रही है, वह तीन राज्यों को छोड़कर देशभर में तीसरे या चौथे नंबर की पार्टी बनकर रह गई है। राहुल गांधी बतौर पार्टी नेता फेल हो चुके हैं और अंतरिम अध्यक्ष के तौर पर फिर सोनिया के अलावा कांग्रेस के पास कोई विकल्प नहीं हैं। बिहार में नीतिश कुमार फिर मोदी की शरण में यानी एनडीए में हैं।
सजायाफ्ता लालू प्रसाद यादव के परिवार में संघर्ष चरम पर है और उनके पुत्र करिश्माई साबित नहीं हो सके हैं। महाराष्ट्र में शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी की सरपरस्ती में जा चुकी है और खुद कांग्रेस वहां चौथे नंबर की पार्टी है। कर्नाटक, आंध्रप्रदेश और तैलंगाना के उत्तराधिकारी चेहरे भी राष्ट्रीय पहचान वाले नहीं हैं और उनकी जीत भी केजरीवाल की तरह चमकदार नहीं हैं।
पिछड़ती हुई कांग्रेस के पास क्या है विकल्प?
उत्तर पूर्व के राज्यों में मामला भाजपा बनाम कांग्रेस नहीं रह गया है और वहां से गैर भाजपाई चेहरा राष्ट्रीय पहचान बन सकेगा ऐसी संभावना फिलहाल दूर-दूर तक नहीं है। बंगाल में माकपा को पछाड़ चुकी ममता बनर्जी अब भगवा दल की चुनौती से रूबरू है और संभावना ऐसी तो कतई नहीं है कि वे केजरीवाल की तरह भाजपा को हाशिए पर ला सकेंगी।
ऐसे में अकेले केजरीवाल ही विपक्ष के चमकते सितारे बनकर उभरे हैं लेकिन सवाल यह है कि ममता बनर्जी, शरद पवार, लालू दल से लेकर चंद्रबाबू नायडू तक विपक्षी नेताओं की यह पूरी श्रृंखला केजरीवाल को अपना नेता मान पाएगी? फिर केजरीवाल बीते दो लोकसभा चुनाव में भाजपा को दिल्ली में सात से छह सीटों पर भी लाने में सफल नहीं हो पाए हैं।
विधानसभा चुनाव में भी मोदी सर्वेक्षणों में 78 फीसदी के साथ शीर्ष पर बने रहे यानी दिल्ली भी देश के नेतृत्व के तौर पर अभी केजरीवाल को आगे नहीं रख रही है। विधानसभा चुनाव में तीन से आठ सीटों पर ही पहुंच सकी भाजपा को वोट बैंक वापस लौटा है यह आंकड़े तस्दीक कर रहे हैं।
शपथ के जलसे को विपक्षी एकता का मंच बनाने से किया परहेज
याद कीजिए हरदनहल्ली डोड्डेगौड़ा कुमार स्वामी के कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद के शपथग्रहण समारोह को। कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ने और कांग्रेस के ही समर्थन से सीएम बने कुमार स्वामी की ताजपोशी में सोनिया गांधी से लेकर ममता बनर्जी और मायावती तक मौजूद थीं।
केजरीवाल भी थे और चंद्रबाबू नायडू भी, लेकिन बाद में कुमार स्वामी सरकार भी गिर गई और अब वह एकता का दृश्य नहीं दिखता। हालांकि केजरीवाल बाद में कोलकाता में ऐसे ही विपक्षी समागम वाले ममता बनर्जी के मंच पर भी दिखे थे। लेकिन उन्होंने अपने शपथ में यह प्रदर्शन नहीं करके दो संकेत साफ दे दिए हैं कि वे फिलहाल मोदी सरकार या भाजपा से टकराव के रास्ते से दूर ही रहेंगे, उन्हें दिल्ली में काम करना है जो केंद्र सरकार से तनातनी बनाकर संभव नहीं होगा।
दूसरे लोकसभा चुनाव को अभी चार साल बाकी हैं। जाहिर है केजरीवाल ने अपने काम करने की मंशा, केंद्र से टकराव न करने का एलान के अलावा बड़ी चतुराई से गैर भाजपा विपक्ष के सामने चार साल बाद की संभावना का निमंत्रण दे दिया है।
देखना ये है कि केजरीवाल बिहार और बंगाल चुनाव में क्या मुद्रा अपनाते हैं और बाकी विपक्ष उसमें किस तरह से सामने आता है।
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