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देश की राजनीति और नई बहस: समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता तथा कृष्ण कथा

Thu, 03 Jul 2025 07:49 PM IST
Mohan Singh Mohan Singh
Updated Thu, 03 Jul 2025 07:49 PM IST
सार

  • दत्तात्रेय होसबले का हालिया बयान कि आपातकाल के दौरान संविधान में जोड़ा गया समाजवाद और धरमनिर्पेक्षता शब्द को हटाए जाने पर विचार करना चाहिए। एक नए विवाद को जन्म दे गया।

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Dattatreya Hosabale questions socialist, secular in Preamble of the Constitution
दत्तात्रेय होसबले के बयान को लेकर विवाद - फोटो : एएनआई (फाइल)

विस्तार

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले का हालिया बयान कि आपातकाल के दौरान संविधान में जोड़ा गया समाजवाद और धरमनिर्पेक्षता शब्द को हटाए जाने पर विचार करना चाहिए, एक नए विवाद को जन्म दे गया। ठीक वैसे ही जैसे बिहार विधानसभा  चुनाव के पहले संघ प्रमुख मोहन भागवत का यह कहना कि आरक्षण की व्यवस्था पर पुनर्विचार करना चाहिए। इन दोनों बयानों को नए राजनीतिक संदर्भ में संघ परिवार की संविधान बदलने की मंशा से जोड़ा जाना लगभग तय है।

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कृष्ण कथा को लेकर भी जिस तरह की जातीय लामबंदी दिख रहीं है, वह भी एक नए तरह के राजनीतिक- सामाजिक ध्रुवीकरण  का संकेत है। खासकर ऐसे समय में जब अस्मिता का सवाल अपने परवान पर  चढ़ा है। आमजन अपना इतिहास पढ़ने -समझने  को लेकर उत्सुक दिख रहा है  ऐसे बयान न सिर्फ उनके संवैधानिक हक़ छीन जाने का भय पैदा करते हैं , बल्कि उन्हें अपने इतिहास के साथ अपमान भी नज़र आता है।
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समाजवाद और पूंजीवाद के सन्दर्भ में हरिजन पत्रिका में एक लेख में महात्मा गांधी लिखते है कि -पूंजीवाद और समाजवाद शब्दों  के अस्तित्व में आने के पहले ईशावास्योपनिषद में पूंजी और संसाधनों पर एकाधिकार से त्याग का सन्देश दिया गया। कहा यह भी गया है कि - प्राकृतिक संसाधन हमारी पुश्तैनी  संपत्ति नहीं, आने वाली पीढ़ी की अमानत है। इसलिए उनका त्यागपूर्वक उपभोग करें। आसक्ति और लालच पूर्वक नहीं।समाजवाद के मूल में है किसी भी तरह के लोभ  का त्याग।
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लोभ से छुटकारे का तरीका भारतीय दर्शन में अस्तेय और अपरिग्रह का पालन करना बताया गया है। अन्य किसी भी सामाजिक- सांस्कृतिक संगठन की तुलना में भारत की प्राचीन सभ्यता -संस्कृति पर बहस चलाने के लिए विख्यात- कुख्यात रहें संघ परिवार के लिए ईश्वास्योपनिषद से क्या  कोई संदेश मिलता है? 

किफायतसारी, सादगी और सदाचार हमारे जीवन मूल्य हैं। श्रेष्ठ समाजवादी विचारकों के लिए भी समाजवाद  केवल रोजी-रोटी  से जुड़ा मामला नहीं है। रोजालक्समबर्ग के शब्दों में कहें तो " समाजवाद रोटी -मक्खन का सवाल नहीं है, बल्कि एक सांस्कृतिक आंदोलन है,  जो संसार में एक महती विचारधारा को प्रवाहित करता है।" मानवता समाजवाद का आधार है।

संवैधानिक अधिकारों में फेरबदल और विवाद

भारत के दलित-पिछड़े समाज को अब न सिर्फ रोटी की बल्कि शौर्य, आत्मविश्वास स्वतन्त्रता और आत्मसम्मान की पहले के किसी भी समय के मुकाबले ज्यादा जरूरत अब महसूस होने लगी है, इसलिए संवैधानिक अधिकारों की किसी फेरबदल की कोई कोशिश यहां  तक की उस विषय पर किसी भी तरह के पुनर्विचार की चर्चा भी; उन्हें अपने इतिहास का अपमान नजर आने लगता है।

इस संदर्भ में  कार्ल मार्क्स का यह कहना सर्वथा उचित प्रतीत होता है कि "समाजवाद  मनुष्य को विवशता के क्षेत्र से हटाकर स्वाधीनता के राज्य में ले जाना चाहता है, इसलिए समाजवाद का आदर्श हर व्यक्ति से उसकी योग्यता  के अनुसार काम लेकर उसके आवश्यकतानुसार  वस्तुओं का प्रबन्ध करना है।" 

रही बात धर्मनिरपेक्षता की तो महात्मा गांधी भी उसे सर्वधर्म सद्भाव के अर्थ में ही ग्रहण करते थे। संघ परिवार का राजनीतिक संगठन भाजपा भी कम से कम अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवानी के समय तक इसे इसी रूप में ग्रहण किया जाता रहा है। ये  वे लोग हैं , जिन्होंने आपातकाल का दंश झेला है।

जनता पार्टी की सरकार में शामिल होने के बावजूद तब कभी इन शब्दों को अस्पृश्य नहीं माना गया। आपातकाल  के पचास साल पूरा होने पर इन दोनों शब्दों को संविधान से निकालने की चर्चा करना  संघ के मंशा पर सवाल तो खड़ा करता है। इस लिए जरूरी है कि  समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता को सही तरीके से समझा जाए। 

भारतीय परिवेश में समाजवाद के सर्वश्रेष्ठ व्याख्याकार आचार्य नरेन्द्र देव का कहना है कि "मनुष्य धर्म को बनाता है न कि धर्म मनुष्य को। धर्म के बोझ तले मानव दबा पड़ा है, समाजवाद धर्म की सच्ची मीमांसा कर धर्म की कैद से मनुष्य को निजात दिलाता है और इस तरह से मानवता के गौरव को बढ़ाता है।" महाभारत के उद्योगपर्व में धर्म की परिभाषा करते हुए महर्षि  वेदव्यास कहते है कि -

                             नमो धर्माय  महते धर्मो धारयति प्रजा:।                            
                             यत् स्यात् धारण संयुक्तं स धर्म इत्युदाहृत:।।


अर्थात् उस महान धर्म को नमस्कार है, जो सम्पूर्ण प्रजा को धारण करता है। जो धारण करने योग्य है, वहीं धर्म कहलाता है। इस श्लोक से यह भी ज्ञात होता है कि जो समाज को एक सूत्र में बांधता है, वहीं सच्चे अर्थों में धर्म कहलाता है।

समाजवाद के लिए धर्म और भाषा के सवाल सर्वाधिक महत्वपूर्ण सवाल रहे हैं। भारत अनेक धर्मों को मानने वाले, अनेक भाषाओं को बोलने वाले  और अनेक  की सभ्यताओं के मेल से बना समाज है। इनमे से किसी एक का वर्चस्व कभी नहीं रहा है। यहीं भारतीय समाज की ख़ूबसूरती है। इस लिए अनेकता में एकता भारतीय परंपरा में महज एक नारा नहीं हमारे समाज की कुदरती विशेषता है। इस विशेषता की शिनाख्त अथर्ववेद में भी किया गया है -

                               जनं बिभ्रति  बहुधा विवाचसं।
                               नाना धर्माणं पृथ्वी यथौकसम्।।


अर्थात् यह पृथ्वी अनेक धर्मों के अनुयायियों, अनेक भाषाओं को बोलने  वालों और विभिन्न स्थानों पर निवास करने वाले मनुष्यों को धारण करती है। इस अनेकता में एकता के सूत्र को तलाशना और उसे समग्रता के सूत्र में पिरोना भारतीय संस्कृति की अनूठी विशेषता है। यह हमारे जीवन में वैदिक काल से रची -बसी है। इसे बांधकर रखना आवश्यक है-

                           ता न: प्रजा: सं दुहृयतां  समग्रा :।
                            वाचो मधु  पृथवि धेहि मह्यम्।।


 हमारे शास्त्रों में बताया गया है कि इस एकता की कुंजी हमारे मधुर वाणी में है। सम्राट अशोक ने भी अपने  शिलालेखों में समुदायों के बीच आपसी कटुता को दूर कर एकता और सद्भाव स्थापित करने के लिए मीठे वचन बोलने की शिक्षा दी है। वाणी के इस महत्व को अपने जीवन में उतार कर हमने वाणी का नाम राष्ट्री दिया है - "राष्ट्री वसूनां संगमनी चिकितुषी" कहा है।

ऋग्वेद में भी इसकी अनुगूज सुनायी देती है- "भ्रातारो मनुजा: सर्वे स्वदेशो भुवन त्रयम् " डॉ राधाकृष्णन् इस आधार पर ही दावा करते है कि -"हमारी सभ्यता के यहीं नैतिक  और आध्यात्मिक मूल्य एक वृहत्तर मानवीय भ्रातृत्व का आधार प्रदान कर सकते हैं।" आजकल समय -समय पर  भारत की इस  सामासिक तंतु को तहस -नहस करने की कोशिश हो रही है।

कथावाचक के साथ गलत व्यवहार

हाल ही में  एक जाति विशेष  से जुड़े कृष्ण कथा वाचकों को इस लिए प्रताड़ित किया गया कि उस जाति के लोगों  को कथावाचक होने का अधिकार नहीं है। स्वामी विवेकानन्द की यह वाजिब शिकायत थी कि इस छूआछूत की भावना के कारण  ही  मद्रास  प्रान्त के दलित जातियों को  बड़ा समुदाय को ईसाई धर्म स्वीकार करने के लिए विवश होना पड़ा।

इस संकीर्णता के कारण ही हिन्दू धर्म का  उतना विस्तार दुनिया में कभी नहीं हुआ, जितना आज भी बौद्ध धर्म का है।धर्म के इस रूढ़िवादी दृष्टिकोण के कारण  ही समाज का आपसी सम्बन्ध तार-तार हो रहा है। समाज का बहुरंगी स्वरूप एकांगी नज़र आ रहा है। गीता में अर्जुन को  धर्म पालन करने की शिक्षा देने वाले कृष्ण का जन्म तो यदुवंश में हुआ है। 

भारतीय ज्ञान परम्परा में प्रस्थान त्रयी के लिए ब्रह्मसूत्र, उपनिषद और गीता को  आधार ग्रंथ बताया गया है। फिर भारतीयता  की ऐसी कौन सी परिभाषा है, जिसमें किसी यादव कूल में पैदा हुए कथावाचक को कृष्ण कथा कहने का अधिकार नहीं है? महर्षि वाल्मीकि और महाभारतकार वेदव्यास किसी क्षेष्ठ ब्राह्मणकुल में नहीं पैदा हुए। फिर भी 'वाल्मीकि भये ब्रह्म समाना ' कहकर हमारे शास्त्रों में आदर दिया गया है। इसलिए यह कहना ज्यादा उचित है कि आने वाले समय में समाज ऐसे संकीर्ण विचारों को स्वयं खारिज कर देगा।मानवतावादी विचार ही  भविष्य का दिशा तय करने वाला दर्शन होगा।

तकनीक के इस नित् नये बदलते दौर में तकनीकी विशेषज्ञता ही हमारी पहचान और भाग्यविधाता होने वाली है। इस रहस्य को हम जितना जल्दी पकड़ लें, उतना ही भारत का भविष्य उज्जवल और तेजस्वी होगा।

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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