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दूसरी पारी: दुनिया की नहीं, अपने दिल की सुनें
Fri, 24 Jul 2026 07:17 AM IST
Devesh Tripathi
क्रिस कोहेन, द न्यूयॉर्क टाइम्स
क्रिस कोहेन, द न्यूयॉर्क टाइम्स
Published by: Devesh Tripathi
Updated Fri, 24 Jul 2026 07:17 AM IST
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डेल सैंडर्स
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अमर उजाला प्रिंट
विस्तार
अक्सर दुनिया मान लेती है कि 60 या 70 की उम्र पार करते ही जिंदगी की रफ्तार धीमी होने लग जाती है। पर, क्या सच में ढलती उम्र सपनों की विदाई का वक्त होता है? 91 वर्षीय डेल सैंडर्स, जिन्हें रोमांच की दुनिया में लोग प्यार से ‘ग्रे बियर्ड’ कहते हैं, की कहानी इस सोच को हमेशा के लिए बदलने वाली है। डेल यह साबित करने निकले हैं कि अगर मन जवान हो, तो जिंदगी में नई शुरुआत करने की कोई उम्र नहीं होती।एक सुबह न्यू हैंपशायर के खतरनाक और पथरीले ‘व्हाइट माउंटेंस’ की तलहटी में डेल सैंडर्स अपने जूतों के फीते कस रहे होते हैं। उनके चेहरे पर वही आत्मविश्वास था, जो किसी युवा के चेहरे पर होता है। डेल दुनिया के सबसे प्रसिद्ध व चुनौतीपूर्ण लंबे ट्रेकिंग मार्गों में से एक अप्लेशियन ट्रेल को फिर से पूरा करने निकले हैं। वह 12 महीनों के भीतर इस पूरी ट्रेल को पार कर सबसे अधिक उम्र में इसे पूरा करने का अपना ही विश्व रिकॉर्ड तोड़ना चाहते हैं।
हालांकि, यह सफर आसान नहीं है। कुछ ही दिन पहले एक भीषण तूफान ने इस पूरे इलाके को अपनी चपेट में ले लिया था। आगे बढ़ना जानलेवा हो सकता था। पर, जैसे ही मौसम ने थोड़ा साथ दिया, वह फिर निकल पड़े। तेज बर्फीली हवाएं, घना कोहरा, लगातार होती बारिश और ऊंची-ऊंची चट्टानें उनके सामने थीं। कई जगह उन्हें हाथों और घुटनों के बल भी चढ़ना पड़ा।
दिलचस्प बात यह है कि डेल सैंडर्स कोई पेशेवर पर्वतारोही नहीं हैं, बल्कि 2002 में नेवी से सेवानिवृत्त हुए हैं। रिटायरमेंट को उन्होंने अपनी नई जिंदगी की शुरुआत बनाया। पहले, वह अपने 80वें जन्मदिन पर पूरी मिसिसिपी नदी को नाव से पार करने वाले दुनिया के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति बने। फिर, 82 वर्ष की उम्र में पहली बार अप्लेशियन ट्रेल पूरा किया और नया रिकॉर्ड बनाया। आज 91 की उम्र में जब वह रास्ते से गुजरते हैं, तो युवा उनके साथ सेल्फी लेते हैं और उन्हें अपनी प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत मानते हैं।
अपनी उम्र को ध्यान में रखते हुए डेल ने समझदारी से अपनी यात्रा की योजना बनाई है। वह रोज लगभग 12 मील चलते हैं, सप्ताह में एक दिन पूरा आराम करते हैं और मौसम का मिजाज देखकर ट्रेल के हिस्सों को अलग-अलग दिशाओं से पूरा करते हैं। जहां अधिकांश युवा हाइकर्स तंबुओं में रात बिताते हैं, वहीं डेल अपने छोटे-से बेसकैंप में रुकते हैं। आगे का रास्ता बेहद खतरनाक है और ‘100 माइल वाइल्डरनेस’ नाम का एक ऐसा सुनसान इलाका आने वाला है, जहां मीलों तक कोई मदद नहीं मिलती, लेकिन डेल के चेहरे पर कोई शिकन नहीं है।
यदि आप भी 60 का पड़ाव पार कर चुके हैं और आपके मन में अब भी कोई अधूरा सपना है, तो उसे केवल इसलिए मत छोड़िए कि लोग कहते हैं, ‘अब बहुत देर हो चुकी है।’ जब तक सांसें हैं, तब तक संभावनाएं हैं। जब तक कदम उठ सकते हैं, तब तक रास्ते खत्म नहीं होते। और, जब तक मन में विश्वास है, तब तक कोई भी उम्र नई शुरुआत करने से नहीं रोक सकती। डेल सैंडर्स भी यही सिखाते हैं।