कोरोना वायरस: यूरोपीय देशों के समाज में परिवारों के भीतर इस चलन से बजुर्ग हुए बेहाल
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कोरोना वायरस का संक्रमण प्रत्येक आयु वर्ग के लोगों में देखने को मिल रहा है, लेकिन वरिष्ठ नागरिकों को इससे सबसे ज्यादा खतरा है। दुनिया भर में कोरोना वायरस के संक्रमण से मरने वालों में बुजुर्गों की संख्या सबसे ज्यादा है, इसलिए यह जरूरी है कि हम उनकी शारीरिक देखभाल के साथ मानसिक देखभाल का भी पूरा ख्याल रखें।
दुनिया के अधिकांश देशों में भारत जैसी संयुक्त परिवार की व्यवस्था को मान्यता नहीं होने के कारण भी आज बुजुर्गों की हालत सबसे नाज़ुक है। कोरोना वायरस के कारण स्वीडन में मौत का आंकड़ा बुधवार को सात सौ के करीब पहुंच गया। इससे संक्रमित लोगों कि संख्या 8500 से ज्यादा हो चुकी है। इनमें 75 फ़ीसदी लोगों की आयु 70 साल से उपर है।
इसके बावजूद यहां लोगों का सार्वजनिक स्थलों, रेस्तरांं, बार या शॉपिंग सेंटर में जाना जारी है। कोरोना से संक्रमित ज्यादातर लोग उम्रदराज़ हैं। इसके बाद भी सड़कों पर, किसी दुकान में या फिर रेस्तरां में बैठे बुजुर्ग आसानी से दिख जाते हैं।
हालांंकि यहां कि सरकार बुजुर्गों को घर से नहीं निकलने और उनकी जरूरत की व्यवस्था करने पर जोर दे रही है। जबकि सरकार के साथ कई समाजसेवी भी उनकी सहायता के लिए आगे आए हैं, लेकिन वरिष्ठ नागरिक कोरोना के गिरफ्त में आसानी से चले जा रहे हैं।
आखिर इसके कारण क्या हैं?
स्वीडन के लोगों के इस व्यवहार की आलोचना दुनिया भर में हो रही है। स्वीडन में रहने वाले दूसरे मुल्कों के लोग उनके इस आचरण को समझ नहीं पा रहे हैं और सरकार के साथ उनकी भी जमकर आलोचना कर रहे हैं, लेकिन यहां की सामाजिक व्यवस्था उनके इस व्यवहार का बड़ा कारण है।
आपको जानकर हैरानी होगी कि यहा के अधिकांश घरों में लोग अकेले रहते हैं या फिर उम्र ढलने के साथ ओल्ड एज होम में रहने चले जाते हैं। ऐसा वे किसी जबरदस्ती या परिवार से दुखी होकर नहीं करते बल्कि वे अपनी मर्जी से ऐसा करते हैं। बच्चे बड़े होते ही (करीब 17-18 साल से) अपने माता-पिता से अलग रहने लगते हैं।
ऐसा इसलिए ताकि वे अपनी जिम्मेदारियों को समझें और उसे ताउम्र अच्छे से निभा सके। इससे बच्चों में आत्मविश्वास बढ़ता है और उन्हें जीवन को अपने नजरिए से समझने व जीने का मौका मिलता है। उन्हें मिली यह स्वतंत्रता युवाओं को बेहतर इंसान बनाती है, लेकिन साथ ही साथ उन्हें परिवार से अलग भी कर देती है।
जीवन की लंबी पारी अकेले या छोटे परिवार के साथ गुजारने के कारण उनकी सोच बदलने लगती है। उम्र के साथ उन्हें प्रत्येक कार्य खुद से करने की आदत हो जाती है, इसलिए उन्हें सहायता के प्रस्ताव देने के बावजूद वे अपने तरीको पर डटे रहना चाहते हैं, जबकि कई दफा नहीं चाहते हुए भी उनका घर से निकलना जरूरी हो जाता है।
स्वीडन में लॉकडाउन नहीं होने से यहां दिन प्रतिदिन स्थिति बिगड़ती जा रही है....
अकेलापन व सूनापन दूर करने के लिए भी लोग बाहर निकलते हैं। जैसा कि मैंने आपको बताया स्वीडन में अधिकांश लोग अकेले या फिर परिवार के काफी कम सदस्य एक घर में साथ रहते हैं, इसलिए उनके लिए आइसोलेसन और सोशल डिस्टेंसिंग कोई नई बात नहीं है।
यही वजह है कि सरकार अबतक लॉकडाउन की जगह इन चीजों पर ज्यादा जोर दे रही है और इसे ही बचाव के लिए कारगर मान रही है। सरकार पिछले कई दिनों से 70 साल से अधिक उम्र के लोगों को घर से बाहर नहीं निकलने का अनुरोध कर रही है।
इनकी रोगप्रतिरोधक क्षमता कम होने के कारण उन्हें सर्वाधिक जोखिम वर्ग माना जा रहा है। इसके बावजूद स्थिति नहीं बदल रही और बुजुर्गों की मौत का सिलसिला जारी है। स्वीडन में ओल्ड एज होम्स कोरोना वायरस के संक्रमण से सर्वाधिक प्रभावित है। इस वजह से सरकार ने यहां जाने पर पाबंदी लगा दी है, ताकि संक्रमण बढ़ने का ख़तरा कम से कम रहे।
वहीं बुजुर्गों से कहा गया है कि वे बहुत जरूरी हो तभी बाहर निकले। वे सड़कों के किनारे टहल सकते हैं, लेकिन किसी के साथ संपर्क नहीं करें और निश्चित दूरी बना कर रखें। दुनिया भर में इस वायरस की वजह से सबसे ज्यादा मौत बुजुर्गों की ही हुई है।
लेकिन अधिकांश देशों में लॉकडाउन की वजह से लोगों के घर में रहना पड़ रहा है, जिससे मरने वालों की संख्या को काबू में किया जा सका। इसके उलट स्वीडन में लॉकडाउन नहीं होने और जनता से जिम्मेदार नागरिक की तरह व्यवहार करने का अनुरोध भर किया गया है। जिससे यहां दिन प्रतिदिन स्थिति बिगड़ती जा रही है। केवल राजधानी स्टॉकहोम में करीब सौ ओल्ड एज होम में कोरोना के मरीज पाए गए हैं। इन जगहों पर संक्रमण का खतरा सबसे ज्यादा है।
स्वीडिश पब्लिक हेल्थ एजेंसी ने साफ शब्दों में कह दिया है कि लॉकडाउन करना मुमकिन नहीं है
यही हाल यूरोप के दूसरे देशों का भी है। आंकड़े बताते हैं कि इटली में सर्वाधिक 120000 से ज्यादा संक्रमण के मामले उजागर हुए हैं, जबकि 15 हजार लोगों की मौत हो चुकी है। स्पेन में मरने वालों की संख्या 12 हजार को पार कर चुकी है। यहां केयर होम्स में रहने वाले करीब तीन हजार से अधिक लोगों की मौत कोरोना वायरस से हो चुकी है।
इसके अलावा भी वरिष्ठ नागरिक ही सबसे ज्यादा संक्रमित और उनकी मौत हुई है। फ़्रांस में वरिष्ठ नागरिकों के संक्रमण व मौत का आंकड़ा हजार से अधिक है। यहां छोटे परिवार होने की वजह से कई दूसरी समस्याएं भी आ रही हैं। यह समस्या अब सरकार के लिए भी सिरदर्द बन चुकी है।
जहां सारी दुनिया स्वीडन के लॉकडाउन नहीं करने की आलोचना कर रही है, वहीं स्वीडिश पब्लिक हेल्थ एजेंसी ने साफ शब्दों में कह दिया है कि ऐसा करना मुमकिन नहीं है। ऐसा किया गया तो स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े कर्मियों की संख्या 25 फीसदी तक कम हो सकती है। जिसकी भरपाई करना काफ़ी मुश्किल होगा।
लॉकडाउन की वजह से अगर स्कूल बंद हुए तो आखिरकार अनिवार्य सेवाओं में जुटे कर्मचारियों के बच्चे घर पर किसके साथ रहेंगे। छोटे बच्चों को घर पर अकेले नहीं छोड़ा जा सकता। जबकि ओल्ड एज होम में तेजी से बढ़ रहे संक्रमण के कारण बच्चों को वहां छोड़ने या वहां से बुजुर्गों को घर पर लाना जोखिम भरा है, इसलिए भी यहां के नर्सरी और प्राथमिक विद्यालयों में छुट्टी की संभावना काफी कम है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।