कोरोना संकट: वर्तमान और भविष्य की असुरक्षा से जूझतीं घरेलू कामगार महिलाएं
- लॉकडाउन ने घरेलू कामगारों को बुरी तरह से प्रभावित किया है।
- घरेलू कामगार महिलाओं को अपने कार्यस्थल पर शोषण, र्दुव्यवहार, भेदभाव एवं हिंसा का शिकार होना पड़ता है।
- 2010 से 2012 के बीच देश में घरेलू कामगारों के प्रति अपराध के 10503 केस दर्ज हुए थे।
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भारत के शहरी मध्यवर्गीय जीवन में घरेलू कामगार महिलाओं की बुनियादी भूमिका है। आज कोरोना वायरस के चलते असंख्य परिवार यह महसूस कर रहे होंगें कि “काम वाली बाइयों” के बिना उनका घरेलू जीवन कितना मुश्किल हो गया है लेकिन उनकी यह मुश्किल घरेलू कामगारों से बड़ी नहीं हैं।
लॉकडाउन ने घरेलू कामगारों को बुरी तरह से प्रभावित किया है उनके लिए यह एक बुरा सपना साबित हो रहा है जिसके चलते वे अपने वर्तमान और भविष्य दोनों को लेकर चिंतित हैं।
आज लॉकडाउन के चलते सभी अपने घरों में रहने को मजबूर हैं, लेकिन घरेलू कामगारों के पास घर से काम करने की सुविधा नहीं है, उनका काम ही ऐसा है कि जिसके लिए उन्हें किसी दूसरे के घर जाना ही होगा जो आज कि स्थिति में यही सबसे बड़ी चुनौती है।
हालांकि प्रधानमंत्री सहित घरेलू कामगारों से जुड़े संगठनों द्वारा लोगों से अपील की गई है कि घरेलू कामगारों की मदद करें और उनका वेतन ना काटें लेकिन इसका कोई खास असर देखने को नहीं मिलता है।
ऐसे बहुत कम लोग होंगें जिन्होंने इन नसीहतों पर अमल किया होगा। घरेलू कामगार हमारे समाज के सबसे निचले तबके से आते हैं। सामान्य समय में भी हमारा राज्य और समाज इनके काम को ना तो मूल्य देता है और ना ही इज्जत, ऐसे में संकट के समय में उनकी कौन परवाह करेगा?
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार भारत में करीब 47 लाख लोग घरेलू कामगार हैं, जिसमे करीब 30 लाख महिलाएं हैं। इनमें से अधिकतर घरेलू कामगार शहरी क्षेत्रों में काम करते हैं। घरेलू कामगार मुख्य रूप से वंचित समुदायों और निम्न आय वर्ग समूहों से होते हैं, इनमें से अधिकतर ऐसे है जो रोजगार की तलाश में पलायन करके शहर आते हैं।
घरेलू कामगारों को मोटे तौर पर तीन भागों में बांटा जा सकता है, पार्ट टाइम, फुल टाइम और कार्यस्थल में रह कर काम करने वाले। घरेलू कामगार मुख्य रूप से बागवानी, बच्चों को संभालना, खाना पकाना, घर की साफ-सफाई, कपड़े-बर्तन धोना, बीमार व वृद्धों की देखभाल आदि काम करते हैं। घरेलू कामगार महिलाओं की बात करें तो उनमें से कई महिलाएं परिवार की एकमात्र कमाने वाली सदस्य होती हैं।
महिलाओं के श्रमशक्ति की एक बड़ी आबादी बिना कामगार का दर्जा पाए काम करने के लिए मजबूर है...
हमारे देश में बढ़ते शहरीकरण के साथ संयुक्त परिवार टूटे हैं, परिवार में पति-पत्नी दोनों के नौकरी करने का चलन भी बढ़ा है। ऐसे में घरेलू काम के लिए कामगारों की मांग लगातार बढ़ी है लेकिन इसके बावजूद भी विदेशों की तरह भारत में उन्हें घर के काम में सहायक के तौर पर नहीं बल्कि नौकर/ नौकरानी का दर्जा दिया जाता है।
हमारी अर्थव्यवस्था में भी उनके काम को गैर उत्पादक कामों की श्रेणी में रखा जाता है। भारत में घरेलू कामगारों को अपने काम का वाजिब मेहनताना नहीं मिलता है और सब कुछ नियोक्ताओं पर निर्भर होता है जो की अधिकार का नहीं मनमर्जी का मामला होता है।
घरेलू कामगार के तौर पर घरों में काम करने वाली ज्यादातर महिलाऐं होती हैं, इस तरह से महिलाओं के श्रमशक्ति की एक बड़ी आबादी बिना कामगार का दर्जा पाए काम करने के लिए मजबूर है। दूसरी तरफ काम से जुड़े उनके अधिकारों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त कानून भी नहीं है और जो भी थोड़े -बहुत प्रावधान है वे भी ठीक से लागू नहीं हो पा रहे है।
घरेलू कामगार महिलाओं को अपने कार्यस्थल पर शोषण, भेदभाव एवं हिंसा का शिकार होना पड़ता है। साथ ही उन्हें कम मजदूरी, काम का समय तय ना होना, कम पैसे में ज्यादा काम करना, नियोक्ताओं का गलत व्यवहार, शारीरिक व यौन-शोषण जैसी समस्याओं को भी झेलना पड़ता है।
आमतौर पर घरेलू कामगारों के प्रति नियोक्ताओं का व्यवहार नकारात्मक होता है, उनके साथ अपमानजनक संबोधन, छुआछूत, चोरी का आरोप, बिना ठोस कारण के वेतन कटौती तो आम हैं, साथ ही घरेलू कामगारों के साथ शारीरिक और मानसिक हिंसा एवं यौन उत्पीड़न की घटनाएं आए दिन सुर्खियां बनती हैं।
महिला बाल विकास विभाग द्वारा 2014 में संसद में दी गई जानकारी के अनुसार वर्ष 2010 से 2012 के बीच देश में घरेलू कामगारों के प्रति अपराध के 10503 केस दर्ज हुए थे। इनकी दिनचर्या बहुत लंबी और थकाउ होती है साथ ही उन्हें छुट्टी भी नहींं मिलती है, काम के अत्यधिक बोझ के कारण अक्सर उन्हें स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना भी करना पड़ता है।
कोरोना वायरस के निपटने के बाद हमारे सामजिक और कामकाजी व्यवहार में बड़ा परिवर्तन होने वाला है....
उपरोक्त से स्पष्ट है कि भारत में घरेलू कामगारों के कामकाज के हालात भी बहुत खराब हैं और जरूरी कानूनों के अभाव में वे बदतर हालातों में काम करने को मजबूर हैं। पिछले कुछ वषों के दौरान सरकार द्वारा घरेलू कामगारों को कानूनी व सामाजिक सुरक्षा देने के लिए कदम उठाए हैं, जिसके अंतर्गत असंगठित क्षेत्र के कामगारों की सामाजिक सुरक्षा कानून 2008, राष्ट्रीय स्वस्थ बीमा योजना और सेक्शुअल हरासमेंट ऑफ विमेन एट वर्कप्लेस (प्रिवेंशन,प्रोहिबिशन एंड रिड्रेसल) कानून 2013 में घरेलू कामगारों को भी शामिल किया गया है।
कुछ राज्य सरकारों द्वारा भी इस दिशा में कदम उठाए गए हैं। कई राज्यों द्वारा घरेलू कामगारों के लिए न्यूनतम मजदूरी तय की गई है।केरल, तमिलनाडू एवं महाराष्ट्र जैसे राज्यों में घरेलू कामगारों के लिए वेल्फेयर बोर्ड का गठन भी किया गया है, जहां घरेलू कामगार अपने को रजिस्टर करके कल्याणकारी योजनाओं का लाभ ले सकते हैं।
2009 में मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री शहरी घरेलू कामकाजी महिला कल्याण योजना लाई गई, जिसमें घरेलू कामगार महिलाओं के परिवारों को उपचार, बच्चों को विशेष शिक्षा प्रोत्साहन योजनाओं का लाभ, छात्रवृत्ति, बीमा, प्रसूति, विवाह सहायता जैसे प्रावधान शामिल हैं, परंतु अभी भी अधिकतर राज्यों में घरेलू कामगारों को श्रमिक के तौर पर पर स्वीकार नही किया गया है और ना ही इन्हें किसी श्रम कानून से जोड़ा गया है।
पिछले कई वर्षों से केंद्र सरकार के स्तर पर घरेलू कामगारों के लिए राष्ट्रीय नीति लाने की बात की जा रही है लेकिन कई वर्गों के विरोध के चलते इस दिशा में अभी तक सफलता नहीं मिली है।
साल 2019 में केंद्रीय श्रम और रोजगार राज्य मंत्री संतोष कुमार गंगवा द्वारा संसद में जानकारी दी गयी थी कि सरकार घरेलू कामगारों को सभी प्रकार के शोषणों से बचाने के लिए घरेलू कामगार नीति बनाने की दिशा में कार्य कर रही है। देखना होगा कि केंद्र सरकार अपने इस प्रयास में कब सफल होती है।
इधर कोरोना वायरस के चलते लॉकडाउन के बाद घरेलू कामगारों के सामने नई चुनौतियां हैं। उन्हें समाज और सरकार दोनों की तरफ से मदद की जरूरत है। सरकार की तरफ से उन्हें आर्थिक मदद दी जानी चाहिए जिससे घरेलू कामगार अपने घरों में रहकर करोना वायरस के संक्रमण से बच सकें साथ ही जिन परिवारों में वे काम करती हैं उन्हें भी इनकी प्रस्थितियों को ध्यान में रखते हुए लॉकडाउन के दौरान इनके वेतन में कटौती नहीं की जानी चाहिए।
कोरोना वायरस के निपटने के बाद हमारे सामजिक और कामकाजी व्यवहार में बड़ा परिवर्तन होने वाला है। घरेलू कामगारों पर इसका भी विपरीत प्रभाव पड़ सकता है सरकार और समाज को इस दिशा में भी सोचने की जरूरत है।
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