World environment day 2020: क्या प्रदूषण पर भी लॉकडाउन संभव है?
- विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) का एक अनुमान है कि वायु प्रदूषण के चलते हर साल करीब 70 लाख मौतें होती हैं।
- दिल्ली में कोरोना संक्रमितों का आंकड़ा 15 हजार को पार करने की कगार पर है।
- ट्रैफिक वाहनों का धुआं हो या तमाम औद्योगिक इकाइयों के बंद होने से उनसे होने वाला उत्सर्जन शून्य के बराबर हो गया।
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5 जून विश्व पर्यावरण दिवस है। पर्यावरण की चिंता करने वाले और उसे लेकर अपने स्तर पर लगातार प्रयास करने वाले व्यक्तियों और संस्थाओं के लिए लॉक डाउन का यह समय आंतरिक खुशी प्रदान करने वाला रहा है। प्रकृति साफ हुई और नदियां, समद्र, जीव-जंतु सभी के जीवन में एक हरियाली लौटी है।
हालांकि इस हरियाली और राहत की एक कीमत भी मनुष्य सभ्यता ने चुकाई है। एक महामारी के चलते, जिसका आज भी इलाज नहीं मिल पाया है और जिसने पूरी दुनिया में मृत्यु का तांडव मचाया हुआ है हैरान करता है। इस महामारी के चलते सब ठप हुआ है, लॉक डाउन ने दुनिया भर के करोड़ों लोगों को घर में कैद करके रख दिया है।
यकीनन इस शांति ने हमारे पर्यावरण को बदला है, लेकिन इसकी कीमत से समझौता नहीं किया जा सकता। सवाल यह है कि क्या प्रदूषण को मनुष्य महामारी के बहाने नहीं बल्कि अपने स्तर पर, आदतों द्वारा और उसका सरंक्षण करते हुए नहीं बचा सकता। क्या पर्यावरण को बचाने के लिए प्रदूषण पर हमेशा के लिए लॉक डाउन नहीं लग सकता।
भले ही देश भर में कोरोना वायरस की रोकथाम के लिए लगे लॉकडाउन ने अर्थव्यवस्था व सामाजिक ढांचे को तहस-नहस करने का काम किया हो, लेकिन मौजूदा देशव्यापी लॉकडाउन का सबसे सकारात्मक प्रभाव वायु प्रदूषण में नाटकीय ढंग से आई कमी है।
वैश्विक आंकड़े बता रहे हैं कि पिछले 60 वर्षों में किए गए तमाम प्रयासों और जलवायु परिवर्तन के असंख्य वैश्विक समझौतों के बावजूद पर्यावरणीय स्थिति में वो सुधार नहीं हो पाया था जो पिछले 60 दिनों में वैश्विक लॉकडाउन के चलते हुआ है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) का एक अनुमान है कि वायु प्रदूषण के चलते हर साल करीब 70 लाख मौतें होती हैं। लॉकडाउन के कारण जहरीली गैसों के उत्सर्जन में अस्थाई कमी आना निश्चित रूप से एक बड़ी राहत है, लेकिन यह कमी भारत जैसे देश के लिए कोई स्थायी समाधान नहीं है।
पांच खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के लिए देश जिस लक्ष्य को लेकर चला है वो कार्बन उत्सर्जन को बढ़ावा दिए बगैर हासिल नहीं हो सकता दूसरी तरफ हम बिना सांस लिए भी आगे नहीं बढ़ सकते।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के डिपार्टमेंट ऑफ पब्लिक हेल्थ एंड एनवायरनमेंट की डायरेक्टर डॉक्टर मारिया नीरा के मुताबिक, 'अगर देशों में प्रदूषण का उच्च स्तर होता है तो कोविड-19 से उनकी लड़ाई में इस पहलू पर भी विचार करना जरूरी है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वायु प्रदूषण के चलते कोविड-19 मरीजों की मृत्यु दर में इजाफा होने की आशंका है।'
अमेरिका में 90 प्रतिशत मौत उन शहरों में हुई जहां वायु प्रदूषण अधिक है। इटली में हुए इस तरह के शोध में यह बात सामने आई है कि जिन जगहों पर वायु प्रदूषण अधिक है वहां कोरोना के चलते होने वाली मौतों में इजाफा हुआ है।
इटली के उत्तरी भाग में वायु प्रदूषण अन्य इलाकों की अपेक्षा काफी ज्यादा है और यहां कोरोना से मरने वालो की संख्या भी करीब तीन गुना ज्यादा है।
इटली के उत्तरी भाग में कोविड-19 की मृत्युदर 12 फीसदी है, जबकि इसके अन्य हिस्सों में मृत्युदर 4.5 फीसदी ही है। हम भूल जाते हैं दुनिया के 30 सबसे प्रदूषित शहरों में से 21 शहर तो भारत के ही हैंं इनमें बहुत से शहरों में हवा की गुणवत्ता, विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा तय मानकों से दस गुना से भी ज्यादा खराब है।
दिल्ली में नुकसानदेह छोटे कणों यानी पार्टिकुलेट मैटर यानी पीएम 2.5 का स्तर लॉकडाउन लागू होने के बाद काफी गिरा...
अकेले वायु प्रदूषण के कारण ही भारत में प्रतिवर्ष 10 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हो जाती है। इन प्रदूषित शहरों पर कोरोना का प्रभाव बड़े पैमाने पर पड़ सकता है।
कोरोना संक्रमितों की संख्या भी देश के महानगरों में अन्य जगहों से अधिक है। मुंबई में यह आंकड़ा 30 हजार से ऊपर जबिक 1 हजार से ऊपर लोगों की यहां मृत्यु हो चुकी है।
दिल्ली में कोरोना संक्रमितों का आंकड़ा 15 हजार को पार करने की कगार पर है, कोलकाता में 1700 से ऊपर तथा चेन्नई में यह आंकड़ा 11 हजार से ऊपर चला गया है। मुंबई जैसे प्रदूषित शहरों में वायु प्रदूषण लंबे समय से काफी ज्यादा है। ऐसे में सांस संबंधी बीमारियों वाले लोगों की संख्या भी ज्यादा है।
कोरोना के कारण सबसे ज्यादा मरने वालों की संख्या भी महाराष्ट्र में ही हैं। गौर करने वाली बात यह भी है कि जहां कोरोना वायरस फेफड़ों पर आक्रमण करता है वहीं वायु प्रदूषण फेफड़ों को कमजोर करता है, मतलब जहां वायु प्रदूषण ज्यादा होगा कोरोना का खतरा भी वहां खतरनाक रूप में रहेगा।
देश भर में लाॅकडाउन के कारण जो पर्यावरण और हवा साफ हुई है देखने वाली बात होगी कितने दिनों तक यह साफ रहती है। नासा की हाल ही की एक रिपोर्ट बताती कि उत्तर भारत में वायु प्रदूषण पिछले 20 साल में सबसे कम हो गया है।
दिल्ली में नुकसानदेह छोटे कणों यानी पार्टिकुलेट मैटर यानी पीएम 2.5 का स्तर लॉकडाउन लागू होने के बाद काफी गिरा, 20 मार्च को दिल्ली की हवा में पीएम 2.5 की मात्रा 91 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर (mg/m3) थी, जो 27 मार्च को घटकर 26 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर (mg/m3) रह गई।
ट्रैफिक वाहनों का धुआं हो या तमाम औद्योगिक इकाइयों के बंद होने से उनसे होने वाला उत्सर्जन शून्य के बराबर हो गया। निर्माण और खनन बंद होने से पर्यावरण को राहत मिली, नगरों से निकलने वाला कचरा कम हुआ, नदियों में पहुंचने वाले प्रदूषक तत्वों की मात्रा में भारी कमी दर्ज की गई।
वैश्विक लॉकडाउन ने वायुमंडल के लिए वह काम कर दिया जो अब तक....
वायु गुणवत्ता सूचकांक बेहतर स्थिति में पहुंचता हुआ नजर आया। यहां तक की नदियों में घुलित आक्सीजन की मात्रा में अपेक्षाकृत आश्चर्यजनक वृद्धि होने से यह पानी पीने योग्य हुआ। क्या गंगा क्या यमुना आदि अन्य महत्वपूर्ण नदियों व झीलों का जल साफ व पीने योग्य हो गया।
पंजाब के जलंधर से 200 किलोमीटर दूर हिमालय के धौलाधार पहाड़ व उनपर पड़ी बर्फ साफ दिखाई देनी लग गई। दिल्ली की हवा साफ हुई तो आसमान भी चटख नीला दिखने लगा। चारों ओर परिंदों की चहचहाहट सुनाई देने लग गई।
यह सच है कि कोविड-19 की महामारी के बाद एक बार फिर से इस बात की ओर ध्यान केंद्रित होने लगा है कि कोरोना महामारी से अर्थव्यवस्था को जो झटके लगेंगे उससे बहुत सी इंसानी जिंदगियां तो बर्बाद होंगी ही साथ ही अरबों खरबों डॉलर के आर्थिक उत्पाद भी बर्बाद हो जाएंगे।
इस की क्षतिपूर्ति यदि कहीं से दिखाई देती है तो वो है पर्यावरण, क्योंकि गर्म हो रहे वायुमंडल से दुनिया को एक गहरा अघात लगेगा। उससे निपटने के लिए नीति निर्माता, वित्तीय संस्थाएं व निवेशक यह सोचने पर मजबूर हुए हैं कि पर्यावरण संरक्षण के लिए आर्थिक पैकेज तैयार रखने होंगे।
वैश्विक लॉकडाउन ने वायुमंडल के लिए वह काम कर दिया जो अब तक तमाम बड़े-बड़े हरित प्रोजेक्ट नहीं कर सके। देश की 40 फीसदी आबादी गंगा नदी पर निर्भर करती है। गंगा को साफ करने के लिए 20 हजार करोड़ रुपये के बजट प्रावधान से 'नमामि गंगे' प्रोजेक्ट शुरू किया गया। देश में पिछले 60 दिनों से लगे लॉकडाउन ने जिस तरह से गंगा को साफ किया है उसकी लागत 20 हजार करोड़ रुपये से भी कहीं ऊपर बनती है।
पर्यावरण पर लॉकडाउन के पड़े इस सकारात्मक प्रभाव ने दुनिया को इस बात के लिए सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्यों न पूरे विश्व में हर साल या प्रत्येक माह में कुछ दिन एक साथ आवश्यक सेवाओं और अनवरत चलने वाली इकाइयों को छोड़कर अन्य सभी गतिविधियों को बंद कर सम्पूर्ण लॉकडाउन लगाया जाए। इसके लिए एक वैश्विक समझौते पर सहमति बनानी होगी।
सहमति इस बात पर भी बननी चाहिए कि लोग निजी वाहनों का सयुंक्त उपयोग करें। सार्वजनिक साधनों की उपलब्धता सुनिश्चित होनी चाहिए। निजी और सरकारी निवेश को हरित प्रोजेक्ट की ओर बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
हमें इस बात को भी नहीं भूलना चाहिए कि हमारे देश में कोरोना से भी खतरनाक है प्रदूषित वातावरण कोरोना देर सवेर अच्छे-बुरे अनुभव दे कर चला जाएगा लेकिन उसके बाद हम पर निर्भर करता है कि हम इससे क्या सीख लेते हैं।
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