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कोरोना के बहाने: पंडितजी ने पैर पटके और यह गुनगुनाते हुए बढ़ गए, जाहि विधि राखै राम, ताहि विधि रहिए..!

Tue, 07 Apr 2020 05:16 PM IST
Vinod purohit विनोद पुरोहित
Updated Tue, 07 Apr 2020 05:16 PM IST
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coronavirus in india satire on lockdown story of common man
घर में पड़े-पड़े और पंडिताइन की खरी-खोटी सुन-सुनकर मानो  एकदम मुरझा गए हैं। - फोटो : Social Media

आज लॉकडाउन में सुबह-सुबह पंडित मोटेराम शास्त्री दूध-ब्रेड लेने घर से निकले। सोचा, इसी बहाने पत्नी से इतर थोड़ी खुली हवा फेफड़ों में भर लें ताकि अगले कुछ दिनों के लिए ऑक्सीजन का स्टॉक हो जाए, जाने कितने दिनों तक घर में ही रहना हो। चार दिन में ही मोटेराम दुबला से गए हैं।

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दरअसल, पंडितजी की तंदुरुस्ती की थ्योरी थोड़ी अलग है। इन्हें कान से खुराक मिलना बेहद जरूरी है। पक्के देवी भक्त हैं। नौ दिन भले भोजन न मिले, कोई दिक्कत नहीं, लेकिन कनसुनी और बतकही जरूरी है। घर में पड़े-पड़े और पंडिताइन की खरी-खोटी सुन-सुनकर मानो  एकदम मुरझा गए हैं।
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घर से निकलते ही मुंडी चग्ग-बग्ग ऐसी घूम रही थी कि मानोंं किसी नए ग्रह पर कदम रखा हो और कम समय में ज्यादा से ज्यादा सब देख लेना चाहते हों। मुंडी इतनी तेज से घूम रही थी कि पंडितजी का बस चलता तो उसे ड्रोन कैमरे से बांध देते। लेकिन हाय री किस्मत अड़ोस-पड़ोस के सारे दरवाजे बंद थे। कुढ़ते हुए बुदबुदाए- मच्छरों के देश में उस वायरस से डर रहे हैं जिसे देखा भी नहीं...डरपोक हैं सब के सब।
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कुछ सोचकर फिर बोले- हां भूत-प्रेत भी कहां दिखाई देते हैं..लेकिन डर तो लगता ही है।

बहरहाल गली के आखिरी छोर पर एक घर की खिड़की खुली थी और घसीटालाल झांक रहे थे। वे भी आंखों से ऑक्सीजन लेने की जुगत में बेसब्र हो रहे थे, लेकिन दूर-दूर तक वीरानी पसरी थी। मोटेराम से आंख मिलते ही चहक उठे और उलाहना दिया- अरे पंडितजी क्या जान की परवाह नहीं है, अपनी नहीं तो अपने परिवार की सोचो। ऐसे कैसे उठाया मुंह और निकल आए। हमें देखो पक्के राष्ट्र्वादी हैं, घर में बंद हैं।

पंडितजी पर इसका कोई असर नहीं हुआ, यहां तक कि अनसुना करते हुए गदगदाएमान हो गए। मानोंं मन की मुराद पूरी हो गई...आज की खुराक का जुगाड़ जम गया।

बोले- अरे जान सलामत रहे इसीलिए तो फरियाने निकला हूं घसीटा। घर में पंडिताइन के रहते क्वारंटाइन मिल ही नहीं पा रहा। मच्छड़ तो थक-हारकर एक घड़ी चुप हो जाता है, उसकी की चक-पक खत्म ही नहीं हो रही। पंडित की बात सुनकर घसीटा का दर्द भी फूट पड़ा। सच कहते हो पंडित, ये तो सजा है और दबे पांव सीढ़ियों से नीचे उतर आए और निंदा पुराण का पहला अध्याय खुल गया।

सुधि भक्त की तरह घसीटा ने पूछा- ये बताओ, मोहल्ले में क्या चल रहा है। पंडित झल्लाकर बोले- क्या खाक चल रहा है, बस कोरोना चल रहा है। घसीटा की पूरी आस्था के साथ जिज्ञासा जारी थी..अरे वो हलके की किसके साथ भाग गई थी पता चला, अब तो रेल-बस सब बंद है, जाने कहां भाग रहे होंगे।

पहला पन्ना पलटा ही था कि घसीटालाल की पत्नी की आवाज आ गई..कहां हो। यह सुनते ही घसीटा की आवाज चली गई और उल्टे पैर सीढ़ियों पर चढ़ गए...और शुरु होने के पहले ही कथा का विसर्जन करना पड़ा। कुढ़ते हुए पंडितजी ने पैर पटके और यह गुनगुनाते हुए बढ़ गए...


जाहि विधि राखै राम, ताहि विधि रहिए।
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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