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कोरोना से जंग: ये गांवों में बदलाव का समय है, विस्थापन से शहरों पर बढ़ते बोझ को कम करने का भी

Fri, 10 Apr 2020 05:28 PM IST
Ashish Tiwari आशीष तिवारी
Updated Fri, 10 Apr 2020 05:28 PM IST
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coronavirus in india is a chance for government to reform and change in villages
लोगों में अपने घर वापस जाने की होड़ मची हुई है (फाइल फोटो) - फोटो : PTI

इस समय कोरोना वायरस से पूरी दुनिया जूझ रही है। चीन कुछ हद तक संभला है लेकिन पूरी तरह नहीं। यूरोप और अमेरिका में संकट है। जहां तक भारत की बात है फिलहाल भारत की स्थिति इस समय बेहतर है। लेकिन हालात गंभीर हैं।

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बहरहाल, कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया में बहुत व्यापक स्तर पर बदलाव किए हैं। पर्यावरण के साथ सामाजिक विषमता और उसके भीतर छिपी चिंताओं को लेकर मनुष्य सभ्यता और जाति को नई तरह से सोचने के लिए विवश किया है। मनुष्य के आपसी संबंध, यंत्रणाएं और महानगरों के यांत्रिक जीवन ने मनुष्य को अकेला कर दिया हैैै। यही एकाकीपन उनमें बदलाव ला रहा है। महामारी के डर से शहरों में विस्थापित आबादी अपने घरों की ओर लौट रही है। जबकि बढ़ता विस्थापन एक बड़ी समस्या हुआ करता था। ऐसे ही नदियों का प्रदूषण, और दिल्ली की खराब हवा बड़ी चिंता थी।
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भारत की बात करें तो प्रदूषण, सामाजिक एकता, आपसी भावना और पूरा देश इस समय एक परिवार की तरह एकजुट दिखाई दे रहा है। जाहिर है विपदा के समय नई तरह से सोचने का सिलसिला शुरू हुआ है। ऐसे में देश बीते दो दशकों में रोजी-रोटी की तलाश में ग्रामीण आबादी के विस्थापन के प्रति एक नया नजरिया सामने आता है।
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उद्योग, फैक्ट्री, रोजगार के साधन के बीच आबादी के बोझ से दबे जा रहे शहरों की समस्याओं के प्रति इस समय सोचने का समय है। साथ गांव, कस्बों से लगातार काम की तलाश में भटक रही आबादी को भी उनके केंद्र में लौटाने की योजना बनाने का भी समय है। गांव की ओर लौटो या फिर गांधी की ग्रामीण अर्थव्यस्था की संभावनाएं यहीं आकार लेती हुई दिखाई देती हैंं। 

यकीनन ये बदलाव हैं लेकिन रोजगार और पलायन के संकट के बदले  ऐसे बदलाव स्वीकार्य नहीं है। ऐसे में ये सीख मिलती है कि स्वाभाविक हुए इन बदलावों से सरकारें सीखें और और नई योजनाएं बनाएं, नए सिरे से गांवों को बदलने की तैयारी करे। 

दरअसल, ये तैयारी होगी उन गांवों को नए सिरे से सजाने और संवारने की। जहां के लोग तमाम सुविधाओं के लिए बड़े-बड़े शहरों की ओर रुख करते हैं। अब जब कोरोना के खौफ में इन गांवों के लोग शहरों से वापस अपने ठिकाने पर लौट आए हैं तो सरकार के पास यही सबसे मुफीद वक्त है कि वह गांव को बेहतर तरीके से तैयार करें। ऐसा गांव जो उनकी जरूरतों को पूरा कर सके। वह जरूरतेंं पूरी करें जिसके लिए गांव के लोग शहरों में जाते हैं। जिसमें रोजी रोटी के अच्छे साधन। अच्छी शिक्षा और स्वास्थ सेवाओं के साथ मनोरंजन के साधन हों।

गांवों में लाना होगा विकास 
यही वह वक्त है जब हमें अपने ग्रामीण इलाकों को अर्बनाइजेशन के पैटर्न पर डेवलप कर सकते हैं। सरकार चाहे तो इंडस्ट्रीज को गांव में स्थापित करे। इसके लिए आवश्यक है अगर छोटी-छोटी इंडस्ट्रीज को दस बीस गांव के बीच में एक छोटे से क्लस्टर में बनाकर लगाया जाए। जैसे स्पेशल इकनोमिक जोन बनाए जाते हैं वैसे ही स्पेशल विलेज इंडस्ट्रीज जोन बनाए जाएं।

देश में सड़कों का बहुत अच्छा नेटवर्क है। उस नेटवर्क के सहारे जब गांव जुड़ सकते हैं तो वहां उद्योग भी खोले जा सकते हैं। इसको इस तरह से सोचिए। जब यूपी, बिहार, झारखंड, छतीसगढ़, पश्चिम बंगाल का मजदूर हज़ारों मील दूर दिल्ली मुम्बई जाकर कमा सकता है तो वो अपने आसपास के दस बीस किलोमीटर के बीच मे बसाए जाने वाले स्पेशल विलेज इंडस्ट्री जोन में जाकर वही काम और पगार क्यों नहींं ले सकता। ऐसा करके गांव के लोग जो शहरों की ओर आते हैं उनको अपने इलाको में ही रोककर सभी सुविधाओं को मुहैया कराया जा सकता है।

coronavirus in india is a chance for government to reform and change in villages
लॉकडाउन के दौरान वाहन ना मिलने पर नोएडा में एनएच 24 पर अपने गंतव्य की ओर जाती लड़की। - फोटो : PTI

शिक्षा और स्वास्थ्य पर हो काम 
रोजीरोटी के बाद दूसरी मूलभूत सुविधा है शिक्षा और स्वास्थ्य। ऐसा नहीं है कि इन गांवों में वह सुविधाएं नहीं है। जो है उनको हमें और बेहतर तरीके से संचालित करने की जरूरत है। इस पूरे बदले परिवेश में हमें एक बात अच्छी तरीके से समझानी होगी कि हम गांव में क्या कायाकल्प करने वाले हैं। हमें मॉडल गांव, मॉडल विलेज क्लस्टर डिवेलप करने होंगे। हमें बताना होगा देश की जनता को देश के लोगों को कि मॉडल विलेज ऐसे होंगे और उसके लिए हमें कितनी मेहनत और कितनी तैयारी करने की जरूरत है।

दरअसल, हमें उस मनोविज्ञान को समझना होगा जो लोग गांव छोड़कर शहरों की ओर आते हैं। हमें उनके मनोविज्ञान के मुताबिक वह ज़रूरी सुविधाएं उनके गांव में उनकी तहसीलों में उनके कस्बों में उनके जिलों में पूरी करनी होंगी। अगर हम ऐसा कर सकते हैं तो यकीन मानिए कि आने वाले वक्त में जो भारत एक नए भारत के तौर पर विश्व गुरु बनकर उभरने वाला है उसकी एक अलग छवि बन कर तैयार होगी।

अगर हम जनसंख्या घनत्व के नजरिए से देखें तो आप पाएंगे देश के गिने-चुने बड़े शहर जिसमें दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, मद्रास, बेंगलुरु जैसे शहर जहां पर जनसंख्या घनत्व बहुत ज्यादा है। अगर हम लोगों को उनकी सुविधाएं उनके गांव घर में देंगे तो जनसंख्या घनत्व कम होगा। इससे लाइफस्टाइल दोनों अर्बन ओर रूरल इलाके के लोगों की बेहतर होगी। हमें यह सच्चे मन से सच्चे दिल से साबित करना होगा और पब्लिक को यह बताना होगा कि हम जो भी उनके लिए करने जा रहे हैं या करेंगे वह वास्तव में वही सुविधाएं होंगी जो आपको दिल्ली में और मुंबई में मिल सकती है।

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अकबलेपुर गांव में लगाए नो एंट्री के बैनर - फोटो : अमर उजाला

सरकार को बनानी होगी योजना 
सरकार के पास इस वक्त बहुत कुछ पाने को है। जो देश की दशा और दिशा बदल देगा। आप कुछ इस तरीके से समझिए कि पूरा रॉ मैटेरियल सामने है। अब निर्माण जिम्मेदारों को करना है। वह निर्माण कैसा होगा यह आपको तय करना है।

आज की तारीख में लोग हर तरीके से साथ देने को तैयार हैं। लोगों को कोरोना के खौफ के बाद इस बात का अंदाजा हो गया है कि वह जितना सुरक्षित अपने गांव में है उतना शायद महानगरों में नहीं हैं। अगर ऐसा ना होता तो शायद कोरोना के खौफ के बाद शहरों की एक बड़ी आबादी अपने गांव की ओर पैदल न चल पड़ती।

पैदल जाने वालों में डर तो था लेकिन एक उम्मीद भी थी अपने गांव से। बस हमें अब वही गांव की उम्मीद को मजबूती से बांधना होगा। सरकार के पास यही एक अच्छा मौका है कि हम उन लोगों को उनके गांव में वह सुविधाएं दे। वह इंफ्रास्ट्रक्चर दें। जिससे वह अपने गांव में बेहतर तरीके से रोजी-रोटी कमा कर एक अच्छी लाइफ स्टाइल जी सकें।

हालांकि इसका यह कतई मतलब नहीं है कि गांव के लोग शहरों में नहीं आए। गांव के लोग शहरों में आएंगे। क्योंकि शहरों की अर्थव्यवस्था के बहुत सारे ऐसे ग्रामीण परिवेश के लोगों के बिना नहीं चल सकते। इसलिए हमें बैलेंस बनाने की बहुत आवश्यकता है। अगर हम बैलेंस बना लेंगे तो हम निश्चित तौर पर आने वाले वक्त में अपने देश को एक नई दिशा दे सकेंगे वह दिशा हमारे देश को एक विकासशील से विकसित देश की ओर स्थापित करने की दिशा में बड़ा कदम होगी।
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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