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कोरोना संकट और हमारी शिक्षा: कोविड-19 की चुनौतियों के बीच शिक्षा प्रक्रिया में कैसे होंगे बदलाव..!

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coronavirus in india and covid impact on indian education system
कोविड-19 के बाद शिक्षा प्रक्रिया में बदलाव होगा. - फोटो : pixabay

कोविड-19 की चुनौतियांं और शिक्षा प्रक्रिया का परिवर्तित स्वरूप: एक विवेचना भारत ही नहीं सम्पूर्ण विश्व ‘कोविड-19’ महामारी के चलते एक अभूतपूर्व कठिनाई का सामना कर रहा है। 

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लॉकडाउन के कारण सारे शैक्षणिक संस्थानों को बंद करना पड़ा, जिससे शिक्षण-प्रक्रिया बाधित हुई है। ज्ञान के निर्बाध प्रसार को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से विद्यालय से लेकर विवि तक समस्त शैक्षणिक संस्थानों को वैकल्पिक शैक्षणिक ऑनलाइन अधिगम अपनाना पड़ा है, जिसे डिजिटल लर्निंग, ई-लर्निंग, वेबवेस्ड लर्निंग, वर्चुअल स्पेस लर्निंग, रिमोट लर्निंग, दूरस्थ शिक्षा या गृह शिक्षा इत्यादि नामों से भी जाना जाता है। अकादमिक विमर्श भी ऑनलाइन हो रहे हैं और प्रशासनिक व अकादमिक निर्णय लेने हेतु बैठकें भी ऑनलाइन हो रही हैं।
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इस तरह ‘कोरोना’ ने हमें परम्परागत रियल-वल्र्ड प्लेटफॉर्म  (जिसमें हम अधिक सहज हैं) के स्थान पर वर्चुअल प्लेटफॉर्म (जो अधिकांश के लिए नया है) से कार्य करने को विवश कर दिया है। बड़ी संख्या में शिक्षकों और विद्यार्थियों ने कई सीमाओं के बावजूद ऑनलाइन शिक्षा के नये तरीके को अपनाने में उत्साह दिखाया है।
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परिचर्चा, गृहकार्य, डिजिटल अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराने और कुछ सीमा तक मूल्यांकन आदि प्रकारों से वे ऑनलाइन शिक्षण से जुड़ रहे हैं, इसलिए कुछ स्तर तक ही सही परन्तु ऑनलाइन शिक्षा को स्वीकारने के लिए वे अभिनन्दन के पात्र हैं। 

डिजिटल शिक्षा के लिए डिजिटल अधोसंरचना व सहायक सेवाएं जैसे, संस्थानवार अधिगम प्रबंध प्रणाली (एलएमएस - जिस पर ऑनलाइन पाठ्यसामग्री उपलब्ध कराई जा सके) और शिक्षकों के लिए ऑनलाइन शिक्षण हेतु प्रशिक्षण इत्यादि के अलावा शिक्षक, विद्यार्थी और अभिभावकों की मनोस्थिति में परिवर्तन की आवश्यकता है। 

coronavirus in india and covid impact on indian education system
आभासी दुनिया में प्रत्येक विद्यार्थी की प्रगति का मूल्यांकन करना असम्भव है। - फोटो : Pexels

इस नए प्रयोग के साथ ही ऑनलाइन शिक्षा के उपयोग और व्यवहार्यता को लेकर एक बहस शुरू हो चुकी है। इसका विरोध करने वाले अभिमत देते हैं कि ऑनलाइन शिक्षण वर्चुअल अधिगम मंच पर होता है जो कभी भी वास्तविक शिक्षण-मंच का स्थान नहीं ले सकता क्योंकि इसमें परस्पर मानवीय संवाद की संभावना कम है, और इसीलिए यह विद्यार्थियों में अलगाव का भाव पैदा करती है। 

आभासी दुनिया में प्रत्येक विद्यार्थी की प्रगति का मूल्यांकन करना असम्भव है और यह टालमटोल की प्रवृत्ति को जन्म देती है। चूंकि यह बड़े समूहों में परिचर्चा का आयोजन प्रभावी तरीके से नहीं कर सकती इसीलिए यह विद्यार्थियों के छोटे समूह पर ही उपयोगी है।

यह नवाचार संचालित नहीं है। इसमें सुरक्षा संबंधी गंभीर चिंताएं हैं और यह प्रायोगिक विषयों के लिए कारगर नहीं है। प्रशिक्षक के पास विद्यार्थियों से काम पूरा कराने का कोई साधन नहीं है। ऑनलाइन मूल्यांकन भी अधिकांशतः बहुविकल्पीय प्रश्नों तक ही सीमित है। इसमें यह पता लगाना भी कठिन है कि पंजीकृत विद्यार्थी ने ही दिए गए कार्य/परियोजना को संपूर्ण किया है।

परिसरों में संचालित ऑफ़लाइन शिक्षण में विद्यार्थी आधारभूत मानवीय गुण जैसे मित्र बनाना, धैर्यवान बनना, निराशा से मुक्त होना आदि विकसित करता है। इसमें वह सामूहिक रूप से अधिगम करता है जो आभासी साथियों के सीखने में काफी उत्प्रेरक होता है।
 

coronavirus in india and covid impact on indian education system
ऑनलाइन शिक्षा के विस्तार के लिए नई नीतियां बनानी होंंगी। - फोटो : Pexels

चूंकि ऑनलाइन शिक्षा सुविधाजनक एवं लचीली है और युवाओं को अधिक स्वतन्त्रता देती है इसलिए इसमें विद्यार्थियों में अनुशासनहीनता विकसित होने की बहुत संभावना है। इतना ही नहीं कुछ विद्यार्थियों को सफल होने के लिए शिक्षक से व्यक्तिगत सम्पर्क की भी आवश्यकता होती है।

ऑनलाइन कक्षाओं के लिए विद्यार्थी को काफी समय तक कम्प्यूटर, टैबलेट या स्मार्टफोन के सामने रहना होता है, इससे नजर कमजोर होने, तनाव या अन्य शारीरिक समस्याएं आ सकती हैं।

इसके साथ-साथ भारत में विद्यार्थियों के लिए डिजिटल संसाधनों व उपकरणों की कमी के अलावा इंटरनेट सुविधा और इलेक्ट्रोनिक गैजेट रिचार्ज कराने जैसी समस्याएं भी हैं। अधिकांश ई-लर्निंग संसाधन अंग्रेजी माध्यम में होने के कारण भाषा भी एक बड़ी रुकावट है। 

जो ऑनलाइन शिक्षा के पक्षधर हैं उनका तर्क है कि इससे विद्यार्थी को अपने समय व स्थान पर स्वतंत्र होकर अध्ययन करने की सुविधा है। इसमें विद्यार्थी अपना गृहकार्य शीघ्रता से करके अपनी रुचियों और अतिरिक्त कौशल विकास पाठ्यक्रमों को पूरा करने के लिए समय निकाल सकता है।

यह माध्यम विद्यार्थी के अन्दर जिम्मेदारी और आत्मानुशासन के गुण विकसित करने में सहयोगी है। विद्यार्थी अपने साथियों से डिस्कशन बोर्ड और चैट के माध्यम से अपनी बात साझा करते हुए अपने संदेहों का निवारण कर सकते हैं। 

ऑनलाइन शिक्षा का सुविधा-स्तर ‘फेस-टू-फेस’ शिक्षा की अपेक्षा अधिक अच्छा है। यह माध्यम सस्ता है क्योंकि इसमें विद्यार्थी के आवासीय व परिवहन खर्च में कमी आती है और उन्हें अनजान शहर की विपरीत परिस्थितियों में रहने से भी मुक्ति मिलती है।

इसके अलावा यह विभिन्न आवश्यकताओं के अनुरूप हो सकती है क्योंकि यह सभी अधिगम व्यवहारों और प्राथमिकताओं जैसे, दृश्य, श्रव्य या गतिकी के अनुरूप स्वयं को ढाल सकती है।

इसका कारण यह है कि इसमें विविध अधिगम विधियांं व साधन उपलब्ध हैं। वेब आधारित अधिगम प्रणाली आवश्यकतानुरूप वातावरण उपलब्ध कराती है जिससे विद्यार्थी अपनी क्षमता और गति के अनुसार प्रगति कर सकते हैं।

इसमें लाइव सेशन में उपस्थित होने की आवश्यकता नहीं है, कोई भी, कभी भी और कहीं से भी इन ई-लर्निंग संसाधनों का उपयोग कर सकता है। यदि किसी को दिन में घर और बच्चों की देखभाल करनी है तो वह रात में भी सीख सकता है। ऑनलाइन मंच जीवन-पर्यन्त अधिगम का अवसर भी उपलब्ध कराता है। ये सारी सुविधायें ऑफ़लाइन अधिगम मंच पर उपलब्ध नहीं हैं।

इसके अतिरिक्त वर्तमान ऑनलाइन शिक्षण मंच व उपकरण विगत वर्षों से अधिक समृद्ध हुए हैं और उसी तरह भविष्य के ऑनलाइन शिक्षण मंच वर्तमान मंचों से अधिक समृद्ध होंगे और अपनी कमियों को भी दूर करेंगे।

सतत् विकसित हो रही आईसीटी तकनीक अधिक उपयोगिता और उपकरण उपलब्ध कराएगी जिससे ऑनलाइन शिक्षण न केवल समृद्ध होगा बल्कि प्रभावी भी होगा। 

मानव संसाधन विकास मंत्रालय (एमएचआरडी) ने विद्यार्थियों में समानता, पहुंंच तथा जीईआर में वृद्धि सुनिश्चित करने के लिए उन्हें विविध ई-कंटेंट्स और पाठ्य सामग्री उपलब्ध कराने में सराहनीय प्रगति की है।

मंत्रालय ने शिक्षकों के लिए शिक्षण में वार्षिक पुनश्चर्या पाठ्यक्रम (अर्पित) और विद्यार्थियों के लिए व्यापक मुक्त ऑनलाइन पाठ्यक्रम (मूक्स) संचालित करने के लिए स्वयंं नामक अपना एक अधिगम मंच तैयार किया है। 

स्वयंप्रभा के अंतर्गत 32 चैनलों के माध्यम से चैबीसों घंटे सातों दिन श्रव्य-दृश्य व्याख्यान प्रसारित किए जा रहे हैं जिन्हें डीटीएच सुविधा से देखा जा सकता है। 

एनपीटीईएल इंजीनियरिंग, बेसिक साइंस, कुछ मानविकी व समाजविज्ञान विषयों के पाठ्यक्रमों के लिए विश्व का सबसे समृद्ध ऑनलाइन संग्रह है।

राष्ट्रीय डिजिटल पुस्तकालय विभिन्न पाठ्यक्रमों के ई-कंटेंट्स को उपलब्ध कराता है तो ई-पीजी पाठशाला के मंच पर स्नातकोत्तर स्तर तक की निःशुल्क ई-पुस्तकें तथा लगभग सभी विषयों के 700 पाठ्यक्रमों का पाठ्यचर्या आधारित ई-कंटेट उपलब्ध हैं। 

सीईसी-यूजीसी के यूट्यूब चैनल्स पाठ्यचर्या आधारित असीमित व्याख्यान तक पहुँच सुनिश्चित करते हैं।

ई-कंटेट कोर्सवेयर इन यूजी सब्जेक्ट्स सीईसी वेबसाइट पर 87 स्नातक विषयों का ई-कंटेंट उपलब्ध कराता है। शोधगंगा में सम्पूर्ण भारत के शोध प्रबंधों को डिजिटल रूप में उपलब्ध कराया जा रहा है।

ई-शोधसिंधु ई-जर्नल्स; ई-यात्रा अंतःस्थापित प्रणाली पर प्रायोगिक अनुभव; आईटी क्षेत्र में स्व-प्रशिक्षण हेतु स्पोकेन ट्यूटोरियल; पाठ्यचर्या आधारित प्रयोगों के लिए वर्चुअल लैब्स; राष्ट्रीय शोध नेटवर्क पर विशेषज्ञ डाटाबेस के लिए विद्वान; साहित्यिक चोरी संसूचन साफ्टवेयर के रूप में शोध शुद्धि; तथा अन्य आईसीटी उपक्रम भी उपलब्ध कराये गये हैं।  

डिजिटल लर्निंग को और अधिक प्रोत्साहन देने के लिए भारत सरकार ने 17 मई, 2020 को आत्मनिर्भर भारत अभियान के अंतर्गत पीएम ई-विद्या कार्यक्रम का शुभारम्भ किया है। यह कार्यक्रम डिजिटल शिक्षा की पहुँच व्यापक करने के लिए है।

इसमें दीक्षा (एक राष्ट्र-एक डिजिटल मंच), एक कक्षा - एक चैनल (बारहवीं कक्षा तक), रेडियो, सामुदायिक रेडियो और पाडकास्ट का व्यापक प्रयोग और दिव्यांग विद्यार्थी वर्ग के लिए विशेष ई-कंटेंट का प्रावधान है। 

ऑनलाइन शिक्षा के विस्तार के लिए शीर्ष सौ विश्वविद्यालय को 30/05/2020 से ऑनलाइन पाठ्यक्रम संचालित करने की स्वतः अनुमति होगी।

इस प्रकार यह इंटरनेट कनेक्शन और इलेक्ट्रोनिक उपकरणों तक पहुंंच से वंचित विद्यार्थियों व शिक्षकों तक ई-लर्निंग संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से डिजिटल गेप को काफी सीमा तक कम करने के लिए एक महत्त्वपूर्ण व सराहनीय कदम है।

दूरदर्शी परिणामों हेतु राष्ट्र को यह सुविधा उपलब्ध कराने के लिए समस्त शिक्षक व विद्यार्थी वर्ग को यशस्वी प्रधानमंत्री माननीय नरेन्द्र मोदी और माननीय मानव संसाधन विकास मंत्री श्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ का साधुवाद एवं आभारी होना चाहिए।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष प्रो. डी.पी. सिंह देश के लिए ऑनलाइन शिक्षा हेतु मार्गदर्शिका देने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील हैं। अपेक्षा है कि यह मार्गदर्शिका गुणवत्ता हेतु पर्याप्त सुरक्षा प्रबंधों के साथ ऑनलाइन शिक्षा के विस्तार व उदारीकरण के लिए नीतिगत रूपरेखा प्रदान करेगी। 


डिजिटल शिक्षा के हानि-लाभ को ध्यान में रखते हुए यह निष्कर्ष निकलता है कि  ऑनलाइन शिक्षा को अधिगम के विस्तार और पूरक के रूप में देखा जाना चाहिए।

वर्तमान में सर्वोत्कृष्ट ऑनलाइन पाठ्यक्रम भी ऑफ़लाइन शिक्षण के समय विद्यार्थियों में विकसित होने वाले मानवीय संबंधों और शिक्षक के साथ व्यक्तिगत संबंधों का स्थान नहीं ले सकता।

ऑनलाइन लर्निंग को परम्परागत कक्षा शिक्षण के स्थान पर क्रमशः प्रतिस्थापित किया जा सकता है जिससे हमें इसमें वास्तविक अधिगम वातावरण में फेस-टू-फेस शिक्षण के अच्छे अभ्यासों/गुणों को समाहित करने के लिए पर्याप्त समय मिल सके।

अवस्थांतरण के समय मिश्रित अधिगम व्यवस्था का पालन किया जा सकता है जिसमें डिजिटल लर्निंग और फेस-टू-फेस शिक्षण के एकीकृत स्वरूप को अभ्यास में लाया जाए।

इस क्रमशः परिवर्तन से शैक्षणिक संस्थानों को भी अपने यहाँ पूर्णतः ऑनलाइन शिक्षा प्रदान करने के लिए आवश्यक सुविधा व क्षमता को विकसित करने और इसकी बारीकियों को समझने एवं अनुभव करने के लिए समुचित समय मिल जाएगा।

इससे राष्ट्र को भी इस विधि से शिक्षा देने में आत्मनिर्भरता के लिए स्वदेशी आईसीटी अधोसंरचना के निर्माण का समय मिल जायेगा। चूंकि हम एक ऐसे परिवर्तनशील संसार में रह रहे हैं जो नई संभावनाओं से भरा हुआ है ऐसे में नित नए कौशलों का विकास भी एक सुखद अनुभव हो सकता है। 

ऑनलाइन कक्षाओं और परीक्षाओं के लिए विद्यार्थी को काफी समय तक कम्प्यूटर, टैबलेट या स्मार्टफोन के सामने रहना होता है, इससे नजर कमजोर होने, तनाव या अन्य शारीरिक समस्यायें आ सकती हैं।

इसके साथ-साथ भारत में विद्यार्थियों के लिए डिजिटल संसाधनों व उपकरणों की कमी के अलावा इंटरनेट सुविधा और इलेक्ट्रोनिक गैजेट रिचार्ज कराने जैसी समस्याएं भी हैं। अधिकांश ई-लर्निंग संसाधन अंग्रेजी माध्यम में होने के कारण भाषा भी एक बड़ी रुकावट है। 

जो ऑनलाइन शिक्षा के पक्षधर हैं उनका तर्क है कि इससे विद्यार्थी को अपने समय व स्थान पर स्वतंत्र होकर अध्ययन करने की सुविधा है। इसमें विद्यार्थी अपना गृहकार्य शीघ्रता से करके अपनी रुचियों और अतिरिक्त कौशल विकास पाठ्यक्रमों को पूरा करने के लिए समय निकाल सकता है। यह माध्यम विद्यार्थी के अन्दर जिम्मेदारी और आत्मानुशासन के गुण विकसित करने में सहयोगी है। विद्यार्थी अपने साथियों से डिस्कशन बोर्ड और चैट के माध्यम से अपनी बात साझा करते हुए अपने संदेहों का निवारण कर सकते हैं। 

ऑनलाइन शिक्षा का सुविधा-स्तर ‘फेस-टू-फेस’ शिक्षा की अपेक्षा अधिक अच्छा है। यह माध्यम सस्ता है क्योंकि इसमें विद्यार्थी के आवासीय व परिवहन खर्च में कमी आती है और उन्हें अनजान शहर की विपरीत परिस्थितियों में रहने से भी मुक्ति मिलती है।

इसके अलावा यह विभिन्न आवश्यकताओं के अनुरूप हो सकती है क्योंकि यह सभी अधिगम व्यवहारों और प्राथमिकताओं जैसे, दृश्य, श्रव्य या गतिकी के अनुरूप स्वयं को ढाल सकती है। इसका कारण यह है कि इसमें विविध अधिगम विधियाँ व साधन उपलब्ध हैं। वेब आधारित अधिगम प्रणाली आवश्यकतानुरूप वातावरण उपलब्ध कराती है जिससे विद्यार्थी अपनी क्षमता और गति के अनुसार प्रगति कर सकते हैं।

इसमें लाइव सेशन में उपस्थित होने की आवश्यकता नहीं है, कोई भी, कभी भी और कहीं से भी इन ई-लर्निंग संसाधनों का उपयोग कर सकता है। यदि किसी को दिन में घर और बच्चों की देखभाल करनी है तो वह रात में भी सीख सकता है। ऑनलाइन मंच जीवन-पर्यन्त अधिगम का अवसर भी उपलब्ध कराता है। ये सारी सुविधायें ऑफ़लाइन अधिगम मंच पर उपलब्ध नहीं हैं।

इसके अतिरिक्त वर्तमान ऑनलाइन शिक्षण मंच व उपकरण विगत वर्षों से अधिक समृद्ध हुए हैं और उसी तरह भविष्य के ऑनलाइन शिक्षण मंच वर्तमान मंचों से अधिक समृद्ध होंगे और अपनी कमियों को भी दूर करेंगे। सतत विकसित हो रही आईसीटी तकनीक अधिक उपयोगिता और उपकरण उपलब्ध करायेगी जिससे ऑनलाइन शिक्षण न केवल समृद्ध होगा बल्कि प्रभावी भी होगा। 

मानव संसाधन विकास मंत्रालय (एमएचआरडी) ने विद्यार्थियों में समानता, पहुँच तथा जीईआर में वृद्धि सुनिश्चित करने के लिए उन्हें विविध ई-कंटेंट्स और पाठ्य सामग्री उपलब्ध कराने में सराहनीय प्रगति की है। मंत्रालय ने शिक्षकों के लिए शिक्षण में वार्षिक पुनश्चर्या पाठ्यक्रम (अर्पित) और विद्यार्थियों के लिए व्यापक मुक्त ऑनलाइन पाठ्यक्रम (मूक्स) संचालित करने के लिए स्वयम् नामक अपना एक अधिगम मंच तैयार किया है। स्वयंप्रभा के अंतर्गत 32 चैनलों के माध्यम से चैबीसों घंटे सातों दिन श्रव्य-दृश्य व्याख्यान प्रसारित किए जा रहे हैं जिन्हें डीटीएच सुविधा से देखा जा सकता है। 

एनपीटीईएल (तकनीकी वर्धित अधिगम का राष्ट्रीय कार्यक्रम) इंजीनियरिंग, बेसिक साइंस, कुछ मानविकी व समाजविज्ञान विषयों के पाठ्यक्रमों के लिए विश्व का सबसे समृद्ध ऑनलाइन संग्रह है।

राष्ट्रीय डिजिटल पुस्तकालय विभिन्न पाठ्यक्रमों के ई-कंटेंट्स को उपलब्ध कराता है तो ई-पीजी पाठशाला के मंच पर स्नातकोत्तर स्तर तक की निःशुल्क ई-पुस्तकें तथा लगभग सभी विषयों के 700 पाठ्यक्रमों का पाठ्यचर्या आधारित ई-कंटेट उपलब्ध हैं। 

सीईसी-यूजीसी के यूट्यूब चैनल्स पाठ्यचर्या आधारित असीमित व्याख्यान तक पहुंंच सुनिश्चित करते हैं।

ई-कंटेट कोर्सवेयर इन यूजी सब्जेक्ट्स सीईसी वेबसाइट पर 87 स्नातक विषयों का ई-कंटेंट उपलब्ध कराता है। शोधगंगा में सम्पूर्ण भारत के शोध प्रबंधों को डिजिटल रूप में उपलब्ध कराया जा रहा है।

ई-शोधसिंधु ई-जर्नल्स; ई-यात्रा अंतःस्थापित प्रणाली पर प्रायोगिक अनुभव; आईटी क्षेत्र में स्व-प्रशिक्षण हेतु स्पोकेन ट्यूटोरियल; पाठ्यचर्या आधारित प्रयोगों के लिए वर्चुअल लैब्स; राष्ट्रीय शोध नेटवर्क पर विशेषज्ञ डाटाबेस के लिए विद्वान; साहित्यिक चोरी संसूचन साफ्टवेयर के रूप में शोध शुद्धि; तथा अन्य आईसीटी उपक्रम भी उपलब्ध कराये गये हैं।  


डिजिटल लर्निंग को और अधिक प्रोत्साहन देने के लिए भारत सरकार ने 17 मई, 2020 को आत्मनिर्भर भारत अभियान के अंतर्गत पीएम ई-विद्या कार्यक्रम का शुभारम्भ किया है।

यह कार्यक्रम डिजिटल शिक्षा की पहुँच व्यापक करने के लिए है। इसमें दीक्षा (एक राष्ट्र - एक डिजिटल मंच), एक कक्षा - एक चैनल (बारहवीं कक्षा तक), रेडियो, सामुदायिक रेडियो और पाडकास्ट का व्यापक प्रयोग और दिव्यांग विद्यार्थी वर्ग के लिए विशेष ई-कंटेंट का प्रावधान है। 

ऑनलाइन शिक्षा के विस्तार के लिए शीर्ष सौ विश्वविद्यालय को 30/05/2020 से ऑनलाइन पाठ्यक्रम संचालित करने की स्वतः अनुमति होगी। इस प्रकार यह इंटरनेट कनेक्शन और इलेक्ट्रोनिक उपकरणों तक पहुँच से वंचित विद्यार्थियों व शिक्षकों तक ई-लर्निंग संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से डिजिटल गेप को काफी सीमा तक कम करने के लिए एक महत्त्वपूर्ण व सराहनीय कदम है।

दूरदर्शी परिणामों हेतु राष्ट्र को यह सुविधा उपलब्ध कराने के लिए समस्त शिक्षक व विद्यार्थी वर्ग को यशस्वी प्रधानमंत्री माननीय श्री नरेन्द्र मोदी और माननीय मानव संसाधन विकास मंत्री श्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ का साधुवाद एवं आभारी होना चाहिए।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष प्रो. डी.पी. सिंह देश के लिए ऑनलाइन शिक्षा हेतु मार्गदर्शिका देने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील हैं। अपेक्षा है कि यह मार्गदर्शिका गुणवत्ता हेतु पर्याप्त सुरक्षा प्रबंधों के साथ ऑनलाइन शिक्षा के विस्तार व उदारीकरण के लिए नीतिगत रूपरेखा प्रदान करेगी। 

डिजिटल शिक्षा के हानि-लाभ को ध्यान में रखते हुए यह निष्कर्ष निकलता है कि  ऑनलाइन शिक्षा को अधिगम के विस्तार और पूरक के रूप में देखा जाना चाहिए। वर्तमान में सर्वोत्कृष्ट ऑनलाइन पाठ्यक्रम भी ऑफ़लाइन शिक्षण के समय विद्यार्थियों में विकसित होने वाले मानवीय संबंधों और शिक्षक के साथ व्यक्तिगत संबंधों का स्थान नहीं ले सकता।

ऑनलाइन लर्निंग को परम्परागत कक्षा शिक्षण के स्थान पर क्रमशः प्रतिस्थापित किया जा सकता है जिससे हमें इसमें वास्तविक अधिगम वातावरण में फेस-टू-फेस शिक्षण के अच्छे अभ्यासों/गुणों को समाहित करने के लिए पर्याप्त समय मिल सके।

अवस्थांतरण के समय मिश्रित अधिगम व्यवस्था का पालन किया जा सकता है जिसमें डिजिटल लर्निंग और फेस-टू-फेस शिक्षण के एकीकृत स्वरूप को अभ्यास में लाया जाए।

क्रमशः परिवर्तन से शैक्षणिक संस्थानों को भी अपने यहाँ पूर्णतः ऑनलाइन शिक्षा प्रदान करने के लिए आवश्यक सुविधा व क्षमता को विकसित करने और इसकी बारीकियों को समझने एवं अनुभव करने के लिए समुचित समय मिल जायेगा।

इससे राष्ट्र को भी इस विधि से शिक्षा देने में आत्मनिर्भरता के लिए स्वदेशी आईसीटी अधोसंरचना के निर्माण का समय मिल जायेगा। चूंकि हम एक ऐसे परिवर्तनशील संसार में रह रहे हैं जो नई संभावनाओं से भरा हुआ है ऐसे में नित नए कौशलों का विकास भी एक सुखद अनुभव हो सकता है। 


प्रो. राघवेन्द्र प्रसाद तिवारी, डॉक्टर हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (म.प्र.) में कुलपति हैंं और  विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, नई दिल्ली  के सदस्य हैं. 


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।


 

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