फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   coronavirus covid 19 warriors volunteer in india bhopal baccha rasoi community kitchen childrens making food

बच्चा रसोई: कोरोना संकट में बच्चों ने समझी बच्चों की जरूरत

Sun, 24 May 2020 11:31 PM IST
Sachin Shrivastava सचिन श्रीवास्तव
Updated Sun, 24 May 2020 11:31 PM IST
सार

  • भोपाल के कम्यूनिटी किचन जरूरतमंदों के बीच खाना पहुंचाने का काम कर रहे हैं।
  • बच्चा रसोई की ओर से 0 से 3 साल तक करीब 30 बच्चों और पांच से छह गर्भवती महिलाओं को दूध दिया जाता है।
  • बच्चा रसोई में सुबह नौ बजे काम शुरू हो जाता है और 1 बजे तक खाना बन जाता है।

विज्ञापन
coronavirus covid 19 warriors volunteer in india bhopal baccha rasoi community kitchen childrens making food
भोपाल के ऐशबाग इलाके में एक बच्चा रसोई शुरू की गई है - फोटो : Social Media

विस्तार

कोरोना संकट के दौरान देश के विभिन्न शहरों की तरह भोपाल में भी कई समूहों, संगठनों, संस्थाओं और व्यक्तियों ने जरूरतमंदों के हाथों में खाना पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। जाहिर है इस दौरान सरकार की लापरवाही से भुखमरी के जो हालात बन रहे थे, उन्हें किसी हद तक इन कोरोना फूड वॉरियर ने असामान्य नहीं होने दिया।

विज्ञापन


इस बीच भोपाल में बच्चों की जरूरत और उन पर आए दोहरे संकट को समझते हुए भोपाल के ऐशबाग इलाके में एक बच्चा रसोई शुरू की गई। इस अनूठी पहल को अंजाम दिया निगहत खान, अमरीन, फरहा, साहिबा, मदीहा, अनम, आफरीन, सुजा और बाबर जैसे किशोरों और युवाओं की टीम ने। भोपाल जनसंपर्क समूह की कहानियों की सीरीज में आज बच्चा रसोई की कहानी...
विज्ञापन



जनता कर्फ्यू और फिर उसके बाद पहले लॉकडाउन की शुरुआत से ही भोपाल के कम्यूनिटी किचन किसी तरह जरूरतमंदों के बीच खाना पहुंचाने का काम कर रहे थे। इन कम्यूनिटी किचन और इनसे जुड़े समूहों, व्यक्तियों का लक्ष्य इतना भर था कि हर भूखे पेट में अन्न के कुछ दाने पहुंच जाएं।
विज्ञापन
विज्ञापन


इसके लिए पुलिस-प्रशासन की उलझनों से लेकर संसाधन जुटाने तक के काम जारी थे। इन्हीं हालात में भोपाल जनसंपर्क समूह से जुड़ी निगहत और मदीहा स्थानीय जम जम किचन और अन्य स्रोतों से खाने के पैकेट लेकर ऐशबाग इलाके में वितरित कर रही थी।

इसी बीच वे बच्चों और गर्भवती महिलाओं की मुश्किलों से दो-चार हुईं। दिहाड़ी मजदूर और रोजमर्रा के छोटे-छोटे कामों से गुजारा करने वाले इन परिवारों के बच्चों और गर्भवती महिलाओं को पौष्टिक आहार की जरूरत थी, लेकिन कम्यूनिटी किचन के फूड पैकेट इसे पूरा करने में असमर्थ थे। ऐसे में निगहत, मदीहा ने अपने अन्य साथियों के साथ मिलकर इस पर बातचीत शुरू की। 

  • 13 अप्रैल से शुरू हुई बच्चा रसोई

शुरुआती बातचीत के बाद फरहा, साहिबा, मदीहा, अनम, आफरीन, सुजा आदि के बीच बच्चों के लिए एक खास रसोई की शुरुआत करने पर सहमति बनी। इस सोच को जब अन्य साथियों के बीच साझा किया गया तो शाहिद ने रसोई के लिए खाना बनाने की जिम्मेदारी का भरोसा दिया और परिंदे समूह ने बच्चों के दूध की जिम्मेदारी ली। इसी तरह जैन कम्यूनिटी की ओर से राशन आदि की व्यवस्था की गई और आखिर 13 अप्रैल को ऐशबाग की चारमीनार मस्जिद के करीब बच्चा रसोई की शुरुआत हुई। 

 

  • बंटे हुए हैं सबके काम 

यूं तो इस किचन की मुख्य जिम्मेदारी निगहत उठाती हैं, लेकिन अन्य साथियों के बीच काम बराबरी से बंटा हुआ है। शाहिद सब्जी आदि में छौंक के साथ स्वाद और पौष्टिकता के समन्वय की जिम्मेदारी निभाते हैं, तो अमरीन अनाज और फंड आदि की व्यवस्था को देखती हैं।

बाबर सब्जी काटने और वक्त वेवक्त कोई भी जरूरी सामान लाने की जिम्मेदारी निभाते हैं, तो सब्जी लाने और बाहर के पूरे काम की जिम्मेदारी आफरीन की है। लॉकडाउन के बाद क्या इसे बंद कर देंगे? इस सवाल पर फरहा, आफरीन समेत सभी साथियों की राय है कि अब यह बच्चा रसोई बंद नहीं होगी, बच्चों को पौष्टिक आहार मिले यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी अब समूह की है। 

  • 35 नन्हीं जानों तक पहुंचता है दूध, 65 से 70 बच्चों को खाना


बच्चा रसोई की ओर से 0 से 3 साल तक करीब 30 बच्चों और पांच से छह गर्भवती महिलाओं को दूध दिया जाता है। शुरुआत में बच्चों को 500 ग्राम दूध दिया गया, लेकिन बाद में इसे 300 ग्राम कर दिया गया है। महिलाओं को 200 ग्राम दूध दिया जाता है। इसी तरह 20 बच्चों से शुरू हुआ खाना वितरण का सिलसिला अब 65 से 70 बच्चों तक पहुंच गया है। 13 अप्रैल से पहले खाना वितरण शुरू हुआ, उसके बाद 15 अप्रैल से दूध और बिस्कुट देना शुरू किया। 

  • जरूरतमंद परिवारों को किया गया चिन्हित

बच्चा रसोई की शुरुआत से पहले इस समूह ने आसपास के उन बच्चों की लिस्टिंग की, जो सबसे ज्यादा मुश्किल में थे। 6 साल से लेकर 13 साल तक के इन बच्चों में ज्यादातर वे थे, जिनकी मां खुद काम करती थीं, लेकिन लॉकडाउन में उनका काम छूट गया है। इनमें विभिन्न संस्थानों और कैटरर्स में रोटी बनाने वाली महिलाएं हैं, तो कुछ सिंगल पैरेंट्स मदर हैं, कुछ बच्चे अपने नाना—नानी के यहां रह रहे हैं।

पति की ज्यादती से तंग आकर मायके में रह रही महिलाओं के बच्चे से लेकर कुछ बिना मां-बाप के बच्चे भी इस रसोई में लिस्टेड हैं। ये वे कुपोषित और अति कुपोषित बच्चे हैं, जो न तो आंगनवाड़ी के दायरे में आते हैं, और न ही स्कूलों के मध्यान्ह भोजन योजना का लाभ उन्हें मिलता है। इन्हें तयशुदा वक्त पर खाना पहुंचाने की जिम्मेदारी समूह ने उठाई है। 

इस बच्चा रसोई का एक पहलू यह भी है कि यहां जरूरत का सामान स्थानीय स्तर...

coronavirus covid 19 warriors volunteer in india bhopal baccha rasoi community kitchen childrens making food
इस बच्चा रसोई का एक पहलू यह भी है कि यहां जरूरत का सामान स्थानीय स्तर पर ही खरीदा जाता है - फोटो : अमर उजाला
  • 1650 रुपए आता है प्रतिदिन का खर्च

बच्चा रसोई के खर्च का प्रबंधन करने वाली अमरीन बताती हैं कि अभी एक दिन का खर्च लगभग 1650 रुपए आता है। इसमें खाने पर लगभग 1000 रुपए खर्च होते हैं, इसमें सब्जी, दाल, चावल, आटा, तेल और मसाले का खर्च शामिल है। दूध का खर्च 550 रुपए रोजाना का है। इसके साथ करीब 100 रुपए के बिस्कुट रोज बच्चों को दिए जाते हैं। इसमें सिलेंडर का खर्च अलग है। एक सिलेंडर करीब 10 दिन चल जाता है। 

  • कम्यूनिटी की आर्थिक मदद भी

इस बच्चा रसोई का एक पहलू यह भी है कि यहां जरूरत का सामान स्थानीय स्तर पर ही खरीदा जाता है, ताकि आसपास के लोगों के रोजगार को भी सहारा मिले। निगहत बताती हैं कि मंडी से प्याज की बोरी 400 रुपए में मिल जाती है, लेकिन उसे मंडी से सेंटर तक लाने का खर्च भी 50 से 100 रुपए होता है, जबकि स्थानीय स्तर पर हमें यह बोरी 450 में मिल जाती है और एक मेहनतकश परिवार को कुछ योगदान भी हो जाता है। इसी तरह रोटी बनाने के लिए हम दो-तीन स्थानीय महिलाओं की मदद लेते हैं, ताकि थोड़ा पैसा उनकी अंटी में भी पहुंच सके। 

  • कई संस्थाओं और समूहों ने की मदद

अमरीन बताती हैं कि इस रसोई को संचालित करने में परिंदे समूह की बड़ी भूमिका रही है। हर रोज जो कच्चा माल आता है और गैस सिलेंडर का खर्च है उसे परिंदे समूह वहन करता है। इसे अलावा साथी उजैर अकाउंट मैंटेनेंश, डॉक्यूमेंटेशन आदि में मदद करते हैं, तो पोस्टर और फंड इकट्ठा करने में सना की मदद मिलती है।

बच्चों के दूध के लिए नकद राशि की व्यवस्था प्रसीदा ने की। इसी तरह जैन कम्यूनिटी की ओर से अनाज की व्यवस्था की गई। साथ ही रेखा श्रीधर, जमा, अर्शी, दानिश खान, कुमार अंबुज, अनिल गुलाटी, मोहन जोशी, पलाश सुरजन, शिवशंकर मौर्य आदि ने समय—समय पर बेहद जरूरी मदद की है। 

  • नौ बजे सुबह से शाम पांच बजे तक चलती है बच्चा रसोई

बच्चा रसोई के कामकाज के बारे में निगहत बताती हैं कि शुरू में हम खाना बांटने घरों तक जाते थे, लेकिन बाद में बच्चे खुद ही यहां आने लगे। यहां डिस्टेंसिंग का पूरा ख्याल रखा जाता है और खाना लेने आए बच्चों को भी साफ—सफाई और डिस्टेंसिंग की हिदायत दी जाती है। उन्होंने बताया कि आजकल धूप तीखी होने लगी है, तो कुछ बच्चों के पैरेंट भी खुद ही आकर खाना ले जाते हैं।

वे बताती हैं कि यहां सुबह नौ बजे काम शुरू हो जाता है और 1 बजे तक खाना बन जाता है। इसके बाद पैकिंग आदि का सिलसिला शुरू होता है और चार से पांच बजे तक अगले दिन की तैयारी आदि के बाद सभी अपने अपने घरों को चले जाते हैं।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed