कोरोना से जंग: अर्थव्यवस्था पर नहीं पड़ेगा खास प्रभाव, मंदी से ऐसे निपटेगा भारत
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ग्यारह साल पहले आई वैश्विक मंदी ने पूरी दुनिया की आर्थिक बुनियाद को झकझोर कर रख दिया था।, लेकिन उस आर्थिक भूचाल में भी दो देश ऐसे थे जिनकी आर्थिक इमारत पर ज्यादा असर नहीं पड़ा था।
भारत और लाओस अगर उस आर्थिक बवंडर में भी खड़े रह सके तो इसकी बड़ी वजह दोनों ही देशों में तमाम आधुनिकताओं के बावजूद बाकी संयुक्त परिवार की व्यवस्था और कृषि पर देश की ज्यादातर लोगों का केंद्रित होना था।
इन दोनों ही बुनियादों ने दोनों ही देशों में ना तो विकसित देशों जैसे अवसाद के मामले बढ़े, ना ही आर्थिक मजबूरियों के चलते लोगों को आत्महत्याएं करनी पड़ीं। जब कोरोना के चलते दुनिया की करीब ढाई अरब की आबादी ठप्प पड़ी है, करीब एक तिहाई देशों में कामकाज और आर्थिक गतिविधियां बंद पड़ी हैं, ऐसे में वैश्विक आर्थिक चूलें हिलने को लेकर चिंता होना स्वाभाविक है।
दुनियाभर के अर्थशास्त्री मानने लगे हैं कि नब्बे साल पहले यानी 1930 की तरह की मंदी का दुनिया को सामना करना पड़ सकता है। विश्व बैंक के साथ ही व्यापार और विकास पर संयुक्त राष्ट्र कांफ्रेंस जैसी संस्थाओं और समितियों का मानना है कि कोरोना के चलते वैश्विक अर्थव्यवस्था को करीब छह खरब डॉलर का नुकसान होगा।
विश्व व्यापार संगठन ने तो कह ही दिया है कि दुनिया ऐसी मंदी की ओर बढ़ रही है, जैसी उसने अब तक नहीं देखी है। रही बात भारत की, उसे लेकर भी आशंकाएं जताई जा रही हैं। क्रेडिट रेटिंग एजेंसी एक्यूट के मुताबिक भारत को करीब नब्बे अरब से लेकर सौ अरब यानी करीब 7.6 लाख करोड़ का नुकसान हो सकता है। जो भारत की जीडीपी के करीब चार फीसद के बराबर होगा।
ऐसी सूचनाओं और विश्लेषणों के दौर में चिंताएं बढ़ना स्वाभाविक है। महाबंदी के दौर में बेरोजगारी और भूख की आशंका से डरकर मजदूरों का एक बड़ा तबका गांव लौट ही गया है। इनकी वापसी ने भी बेरोजगारी की आशंका को बल ही दिया है।
महाबंदी के दौर में प्रधानमंत्री ने लोगों से अपील की कि वे अपने साथी कर्मचारियों को सहयोग दें। इसके बावजूद बड़े संस्थान भी या तो वेतन में कटौती करने लगे हैं या कर्मचारियों को घर की राह दिखाने लगे हैं। ऐसे में मंदी का डर बढ़ना ही है और मंदी का यह डर ही बेरोजगारी की आशंका की वजह बनता है।
विपत्ति तो ज्यादातर बिना बुलाए ही आती है, लेकिन उससे निबटने की राह कई बार अतीत के अनुभवों से भी मिल जाती है। जब चौतरफा नकारात्मक माहौल बना हो, उसमें धैर्यवान ही सकारात्मक राह देख सकता है। वैसे भी सोशल मीडिया के राक्षस ने जिस तरह वैचारिक माहौल बना रखा है, उसमें कौवा कान ले गया के उलट अलग राय रखना गुनाह ही माना जाएगा।
भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था कोरोना से खास प्रभावित नहीं है...
ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या सचमुच भारतीय अर्थव्यवस्था इतनी डूब जाएगी कि लोगों के भूखे मरने की नौबत आ जाएगी? इसका जवाब तो निश्चित तौर पर ना में है।
बहुराष्ट्रीय बीज, रसायन और खाद कंपनियों की एडवोकेसी के चलते नगदी फसल उगाने के चक्कर में फंसने और कुछ इलाकों में आत्महत्या के लिए मजबूर होने के बावजूद भारतीय किसानों की जो उपलब्धि है, वह गर्व करने लायक है।
तमाम दुख और झंझावात के बावजूद भारतीय किसानों के श्रम स्वेद की वजह से भारत का अन्न का भंडार भरा हुआ है। खाद्य और उपभोक्ता मामलों के मंत्री राम विलास पासवान कह चुके हैं कि भारत के अन्न भंडारों में अकेले चावल ही 539 लाख टन है।
भारतीय खाद्य निगम के मुताबिक भारत में उसके ही गोदामों में अप्रैल अंत तक करीब दस करोड़ टन अनाज होगा। इसके साथ ही इस साल करीब 29.2 करोड़ टन का अनाज पैदा होने का अनुमान है।
यह भी जानकर ताज्जुब होना चाहिए कि भारत में सालाना अनाज की खपत पांच से छह करोड़ टन की होती है। एक अनुमान के मुताबिक भारत पूरी दुनिया की आबादी को अपने अन्न भंडार के चलते छह महीने तक खाना खिला सकता है।
यह स्थिति तब है, जब हर साल भारत में करीब 2.1 लाख टन अनाज बर्बाद हो जाता है। जाहिर है कि भारत के सामने जिस भुखमरी का हल्ला खड़ा किया गया है, वह फिजूल है। बस जरूरत इस बात की है कि अनाज का वितरण सही तरीके से हो सके।
नकारात्मक बने माहौल में भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर अच्छी बात कही है, एचडीएफसी बैंक के प्रबंध निदेशक आदित्य पुरी ने। हाल ही में एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा है कि कोरोना से निबटने के बाद भारत की अर्थव्यवस्था को वैसा नुकसान नहीं होने वाला है, जैसी आशंका जताई जा रही है।
उन्होंने कहा है कि चूंकि भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था कोरोना से खास प्रभावित नहीं है, लिहाजा वह मजबूती से चल रही है और आगे भी चलती रहेगी। इसके साथ ही उनका तर्क है कि चूंकि भारत के छोटे व्यापारियों और छोटी दुकानों को भले ही कोरोना की महाबंदी के दौर में लाभ नहीं हुआ, लेकिन उन पर ज्यादा कर्ज भी नहीं है, लिहाजा उनकी बहुत अधिक देनदारी भी नहीं है। लिहाजा जैसे ही दुकानें खुलेंगी, उनका कारोबार चल निकलेगा।
एक बार फिर भारत की शस्य और ग्रामीण संस्कृति और व्यवस्था से ही उम्मीद की जा सकती है...
भारत त्योहारों और मेले-ठेले के साथ अपनी सांस्कृतिक परंपराओं को निभाने वाला देश है। 2008-09 की वैश्विक मंदी में मनरेगा से गांवों तक पहुंचे पैसे और गांवों की उत्सवधर्मी संस्कृति ने भारतीय अर्थव्यवस्था को बचाने और उबारने में बड़ी मदद दी थी। यानी एक बार फिर भारत की शस्य और ग्रामीण संस्कृति और व्यवस्था से ही उम्मीद की जा सकती है।
भारत के विदेशी मुद्रा भंडार का दो तिहाई हिस्सा अकेले पेट्रोलियम आयात पर खर्च होता है। चूंकि कोरोना की वजह से पेट्रोलियम की कीमतों में कमी आई है, लिहाजा उससे हुई बचत भी भारतीय अर्थव्यवस्था को उबारने में मदद करेगी।
आदित्य पुरी ने अपने साक्षात्कार में इस तथ्य को भी स्वीकार किया है। जिस तरह हाल के दिनों में हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वीनिन को लेकर भारत की तरफ अमेरिका समेत पूरी दुनिया ने उम्मीद लगाई और भारत ने उसे पूरा करने में मदद की, उससे भारतीय दवा कंपनियों की साख बढ़ी है।
इसकी वजह से कोरोना काल के बाद भारतीय दवा उद्योग की मांग बढ़ेगी। आदित्य पुरी के मुताबिक बीसीजी के टीके, एंटी मलेरिया दवाएं समेत तमाम दवाओं की दुनियाभर में मांग बढ़ेगी।
कोरोना के बारे में एक तथ्य साबित हुआ है कि जिनकी जीवनी शक्ति मजबूत है, उन्हें कोरोना से नुकसान नहीं हुआ। दिल्ली में हुई कोरोना से मौतों को लेकर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी कह चुके हैं कि इन मौतों में से 95 लोगों की मौत दूसरे रोगों की वजह से हुई।
बहरहाल, यह स्थापित हो चुका है कि भारतीय आयुर्वेदिक दवाएं और प्राकृतिक चिकित्सा जीवनी शक्ति यानी इम्यून सिस्टम को मजबूत करती हैं। जाहिर है कि इसकी तरफ एक बार फिर दुनिया का रुझान बढ़ेगा।
इससे अगर भारत में आयुर्वेदिक हब कम पड़ने लगें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। कोरोना की वजह से चीन अब दुनिया के सामने बदनाम हो गया है। अमेरिकी, जापानी और दक्षिण कोरियायी बड़ी कंपनियों ने वहां से अपना उत्पादन समेटना शुरू कर दिया है। जाहिर है कि सस्ते श्रम की वजह से वे भारत आएंगी। भारत भविष्य में इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद का हब बन सकेगा।
यह सच है कि कोरोना के आफत काल के बाद भी विमानन और पर्यटन उद्योग पर असर पड़ेगा। लेकिन यह भी तय है कि हालात इतने भी बुरे नहीं होने जा रहे कि हम हाय तौबा ही मचाते रहें। बस जरूरत यह है कि हम धैर्य रखें और कोरोना से बचने के लिए शारीरिक दूरी को बनाए रखें।
हमें सामाजिक दूरी खत्म करनी होगी और मानसिक रूप से एक-दूसरे का साथ देने के लिए तैयार रहना पड़ेगा। अगर हम अपना राष्ट्रीय स्वास्थ्य बनाए रखे तो निश्चित है कि सौ अरब डालर का घाटा आने वाले दिनों में हम जल्द पाट पाएंगे और मजबूत आर्थिक बुनियाद पर एक मजबूत राष्ट्र के तौर पर खड़े हो सकेंगे।
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