कोरोना ने तबाह की बच्चों की दुनिया: अनाथ बच्चों का कौन बनेगा सहारा?
इस विनाशकारी वायरस ने हमारे देश के कई अबोध बच्चों की ज़िन्दगियों पर भी कुप्रभाव डाला। कुछ बच्चों ने अपने पिता को खोया तो कोई मां के आंचल से दूर हो गया और कई ऐसे भी मामले आये जहाँ मासूमों ने अपने माता-पिता दोनों को खो दिया।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
देश ने कोरोना की दूसरी लहर में जो मंजर देखा उसे किसी ने कुस्वप्न में भी नहीं देखा होगा। एक ऐसा खौफनाक दौर जहां कोरोना के रचाए मौत के चक्रव्यूह में फंसीं लाखों ज़िंदगियां अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करती नज़र आईं।
वर्ष 2020, जब कोरोना ने पहली बार चीन में दस्तक दी, तब तक दुनिया मानवता पर आने वाले महासंकट से अनभिज्ञ थी। कोरोना की इस सर्वव्यापी महामारी से पहले हम यानी मानव जाति बड़ी-बड़ी मिसाइलों, एटम बमों और शत्रु देशों के बीच जंगों को ही मानवता का सबसे बड़ा दुश्मन समझते थे, लेकिन इस आपदा ने सारे पूर्वाग्रहों को ध्वस्त कर दिया।
एक अदृश्य शत्रु 'कोरोना वायरस' इतना विध्वंसकारी और विनाशक साबित होगा इसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी। वर्तमान की परिस्थितियों को देखते हुए इसे मानव इतिहास का सबसे बड़ा, विध्वंसक और शक्तिशाली शत्रु कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा।
कोरोना की यह लहर कितनी घातक है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि केवल इस लहर में अभी तक लगभग डेढ़ लाख लोगों ने अपनी जान गंवाई है। कई हंसते-खेलते परिवार उजड़ गए। किसी ने अपना बेटा खोया, तो किसी ने अपना पति, कई माताओं की गोद सूनी हो गई।
मासूम बच्चों के सिर से छिन गया माता-पिता का साया
इस विनाशकारी वायरस ने हमारे देश के कई अबोध बच्चों की ज़िन्दगियों पर भी कुप्रभाव डाला। कुछ बच्चों ने अपने पिता को खोया तो कोई मां के आंचल से दूर हो गया और कई ऐसे भी मामले आये जहाँ मासूमों ने अपने माता-पिता दोनों को खो दिया।
यह बच्चे हमारे देश का भविष्य हैं, आने वाली पीढ़ियों के जनक हैं, अगर देश को अपना भविष्य सुरक्षित रखना है तो इन बच्चों के वर्तमान को संवारने और बेहतर बनाने की जिम्मेदारी अपने कन्धों पर लेनी होगी।
सरकारों की सहायता कितनी प्रभावी?
इस दिशा में सरकार और राज्य सरकारों ने कुछ जरूरी और महत्वपूर्ण कदम तो उठाएं हैं लेकिन क्या वे काफी हैं? कोरोना ने बच्चों की दुनिया को अनाथ, भयाक्रांत और असामाजिक कर दिया है। ऐसे में सरकारों के प्रयास किस स्तर पर प्रभावी होंगे यह देखने वाली बात होगी। हालांकि सरकार ने वयस्क होने तक मासिक भत्ता की हो या फिर निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था की है, लेकिन जमीन यह कितने प्रभावी हैं यह तो आने वाला समय ही बताएगा।
इधर कोरोना ने बच्चों की हरी भरी दुनिया उजाड़ दी। कई बच्चों के अभिभावक नहीं रहे तो ऐसे में राज्य सरकारों ने उनके पालन-पोषण की जिम्मेदारी लेने की बात कही है। हालांकि यह पर्याप्त नहीं है। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने आधिकारिक तौर पर बताया है कि कोरोना की इस दूसरी लहर ने देश में अब तक 577 बच्चों के सिर से माता-पिता का साया छिन लिया है। मसलन यह सरकारी आंकड़े हैं, वास्तविक स्थिति इससे भी भयानक हो सकती है।
अनाथ बच्चों को चिन्हित कर योजनाओं को पहनाया जाए अमलीजामा
जब देश के ज्यादातर राज्यों ने कोरोना महामारी के प्रकोप से अनाथ हुए बच्चों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए कई घोषणाएं की हैं। ऐसे में सरकारों की पहली प्राथमिकता ऐसे बच्चों को चिन्हित कर उन्हें इन योजनाओं और घोषणाओं से जोड़ने की होनी चाहिए। सरकारों द्वारा ऐसे स्पेशल टास्क फोर्स का गठन होना चाहिए जो यह सुनिश्चित करें कि इन कल्याणकारी योजनाओं का जमीनी स्तर पर सही अमलीजामा पहनाया जा रहा है।
स्पेशल टास्क फोर्स रखे बच्चों के सर्वांगीण विकास पर नजर
बच्चों के लिए बनी स्पेशल टास्क फोर्स को यह दायित्व भी सौंपना चाहिए कि वह निरंतर ऐसे बच्चों के सर्वांगीण विकास पर अपनी नजर बनाए रखे और एक निर्धारित समय पर इसकी विस्तृत रिपोर्ट सरकार को भेजती रहे। इससे सरकार हर बच्चे की प्रगति से अवगत होती रहेगी। साथ ही अगर किसी मामले में जरूरी कदम उठाने की आवश्यकता होगी तो बच्चे के हित को ध्यान में रखते हुए वह कदम उठा सकती है।
किशोरावस्था के बच्चों की हो काउन्सलिंग
ऐसे अनाथ बच्चे जो किशोरावस्था में हैं। वे अपने माता-पिता को खो कर एक 'ट्रॉमा' में जी रहे होंगे। ऐसे बच्चों को आवश्यक रूप से काउन्सलिंग करने की आवश्यकता है। सरकारों द्वारा इस दिशा में कदम उठाना जरूरी हो गया है। इन बच्चों के लिए बिना समय गंवाए कॉउंसेलरों की व्यवस्था की जानी चाहिए। जिससे उन्हें जो मानसिक आघात पहुंचा है उससे उन्हें उबारा जा सके।
सरकार और एनजीओ मिल कर करें काम
बच्चों के पुनर्वास और उनको सरकार की कल्याणकारी योजनाओं से जोड़ने के लिए दोनों (सरकार और एनजीओ) अगर एक साथ काम करें तो सकरात्मक और प्रभावी नतीजे देखने को मिल सकते हैं। देश में लाखों एनजीओ हैं बस उन्हें लामबंद और प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है।
नोबेल पुरस्कार विजेता एवं बाल अधिकार कार्यकर्ता कैलाश सत्यार्थी ने हाल में ही विश्व स्वास्थ्य संगठन के 74वें सम्मेलन में कहा कि कोरोना महज स्वास्थ्य व आर्थिक संकट नहीं है, बल्कि यह न्याय, सभ्यता और मानवता का संकट है। महामारी ने दुनिया में जो तबाही मचाई है, उससे बच्चों को बचाने के लिए हमें उन्हें साथ में लेना ही होगा।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।