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जलवायु संकट से गुम होती भिनभिनाहट: खतरे में भौंरों का अस्तित्व

Tue, 06 Jan 2026 02:39 PM IST
Anu scicomm अनु साइकॉम
Updated Tue, 06 Jan 2026 02:39 PM IST
सार

फसलों और जंगली पौधों के प्रजनन में उनकी एक हम भूमिका है, लेकिन बदलते मौसम के कारण उनका अस्तित्व खतरे में है।

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Climate crisis is killing the buzz: bumblebees survival under threat
इन भौंरों का जीवन उतना सुखद भी नहीं रह गया है जितना हमें प्रतीत होता है। - फोटो : Kartick K

विस्तार

पहाड़ की ढलान से उतरते हुए अचानक एक भिनभिनाहट सुनाई दी। मानो जैसे कानों में कोई संगीत गुनगुना रहा हो। नज़र उठाई तो देखा एक फूल से दूसरे फूल पर डोलता एक छोटा सा भौंरा (भंवरा) पास ही में लगे गमलों के फूलों में मदमस्त था।

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उसकी धीमी धीमी सी भिनभिनाहट मानो जैसे यह याद दिलाना चाह रही हो कि वह सिर्फ एक कीट नहीं, बल्कि प्रकृति की सबसे मेहनती परागणकर्ता (पोलिनेटर) है। दुनिया में भंवरों की लगभग 250 से ज्यादा प्रजातियाँ हैं।
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भारत इस दृष्टि से बेहद समृद्ध है। यहाँ करीब 50 से ज्यादा ज्ञात प्रजातियाँ मौजूद हैं, जिनमें से अधिकांश हिमालय की ऊँचाइयों पर जीवन व्यतीत करती हैं। अधिकांशतः ये समशीतोष्ण क्षेत्रों में पाए जाते हैं, पर कुछ प्रजातियां उष्णकटिबंधीय इलाकों में भी बसती हैं। ये कभी भूमिगत बिलों में तो कभी सूखी पत्तियों और लकड़ियों के बीच अपने घर बनाते हैं।
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मौसम की मार और इंसानी हस्तक्षेप

लेकिन इन भौंरों का जीवन उतना सुखद भी नहीं रह गया है जितना हमें प्रतीत होता है। बदलता मौसम, जलवायु एवं इंसानी गतिविधियां मिलकर धीरे-धीरे इनका संसार उजाड़ रही हैं। जलवायु परिवर्तन का असर अब भौंरों पर तेजी से दिखाई देने लगा है, और हम सभी के लिए यह चिंता का विषय भी है क्योंकि भौंरे हमारे पारिस्थितिकी तंत्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण परागणकर्ता हैं।

फसलों और जंगली पौधों के प्रजनन में उनकी एक हम भूमिका है, लेकिन बदलते मौसम के कारण उनका अस्तित्व खतरे में है। क्यूंकि बढ़ता तापमान, असामान्य वर्षा, घटती बर्फबारी और फूलों के खिलने के समय में बाधा जैसी परिस्थितियां भौंरों के जीवन-चक्र को काफी हद तक बाधित कर रही हैं। हीटवेव, सूखा और तूफानों जैसी चरम मौसमी घटनाएँ उनके घोंसलों को नष्ट कर देती हैं और भोजन की तलाश को बहुत कठिन बना देती हैं।

इसके अलावा, पौधों की विविधता में बदलाव से उनके लिए पर्याप्त भोजन और सुरक्षित आवास खोजना मुश्किल हो जाता है साथ ही इस स्थिति को और भी जटिल बनाती हैं मानवीय गतिविधियाँ जिसमें शामिल है शहरीकरण और भूमि उपयोग में बदलाव जो भौंरों के आवास को असुरक्षित बना रही हैं। इन कारणों से भौंरों की आबादी पर गहरा संकट मंडरा रहा है, जो अंततः हमारे खाद्य सुरक्षा और पर्यावरणीय संतुलन पर भी असर डाल सकता है।

शोध से मिले सबक

जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा किए गए एक शोध में हिमालयी भौंरों की विविधता और उनके पौधों से संबंधों पर महत्वपूर्ण जानकारियाँ मिलीं। अध्ययन के दौरान किसानों को जागरूक करने के लिए कार्यशालाएं आयोजित की गईं, जहां उन्हें समझाया गया कि भौंरे उनकी फसलों की उपज बढ़ाने में सहायक हैं।

इस शोध ने कुछ प्रमुख पहलुओं पर रौशनी डाली जैसे की भारतीय हिमालयी क्षेत्र में स्वदेशी भोंरों के संरक्षण के लिए सबसे पहले उनके प्राकृतिक आवासों की रक्षा और पुनर्स्थापना आवश्यक है।

इसके साथ ही किसानो को भोंरों की सुरक्षा के लिए रसायन-मुक्त और मित्रवत दृष्टिकोण को अपनाना बेहद ज़रूरी है। कीटनाशक, खरपतवारनाशक और फफूंदनाशक जैसी रसायन सामग्री अक्सर मधुमक्खियों को सीधे नुकसान पहुँचाती हैं या उनके भोजन व घोंसला बनाने वाले पौधों को नष्ट कर देती हैं।

साथ ही साथ यह भी साफ तौर पर बताया गया की संरक्षण प्रयास में स्थानीय और ग्रामीण समुदायों की भागीदारी अत्यंत महत्वपूर्ण है। ग्रामीण समाज के पास परंपरागत ज्ञान और टिकाऊ खेती की पद्धतियां हैं, जो जैव विविधता की रक्षा में सहायक हो सकती हैं। समान रूप से महत्वपूर्ण पहलू है जागरूकता और जनसंपर्क।

अब तक जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश में करीब 40 से अधिक जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा चुके हैं। 400 से अधिक किसानों को बेहतर परागण प्रबंधन तकनीकों का प्रशिक्षण दिया गया है और सलाह पुस्तिकाएँ वितरित की गई हैं ताकि वे टिकाऊ पद्धतियाँ अपना सकें।

हमें क्यों सोचने की जरूरत है?

भौंरे केवल फूलों के साथी नहीं हैं, बल्कि हमारी खाद्य सुरक्षा की भी नींव हैं। अगर वे गायब हो गए, तो फसलें और जंगल दोनों प्रभावित होंगे। इसलिए उनकी सुरक्षा दरअसल हमारी अपनी सुरक्षा है।

जरूरत है कि हम पेस्टिसाइड का इस्तेमाल घटाएं, जंगल और चरागाह बचाएं। सबसे महत्वपूर्ण है लोगों को यह समझाना कि यह छोटा-सा जीव हमारी जिदगी से कितनी गहराई से जुड़ा है। इसीलिए जब अगली बार आपके घर के आँगन या पहाड़ की ढलान पर कोई भौंरा गुनगुनाए, तो उसे सिर्फ एक कीट मत समझिएगा।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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